| डॉ. सतीष कुमार सहायक प्राध्यापक (दर्शनशास्त्र) शान्ति प्रसाद जैन महाविद्यालय सासाराम, रोहतास, बिहार |
शोध सारांश
जीवन दर्शन एवं मानवीय मूल्य भारतीय परम्परा पर आधारित है। प्रथम दृष्टया ‘अर्थ’ के रूप में जिसकी व्याख्या संत और आचार्य आदि करते हैं। दूसरा मानवीय मूल्यों में जिसका विवेचन वैदिक चिन्तन में रामायण, उपनिषद्, गीता और उपनिषद् में भी किया गया। मानव एक मूल्य चेतना से स्मृद्ध प्राणी रहती है। प्रतिक्षण मूल्यों के सृजन पर आधारित है। अर्थशास्त्र में मानवीय जीवन के विकास पर आधारित जीवन मूल्यों को उपयोगी माना गया है, किन्तु मानव जीवन को नैतिक बनाने के लिए मूल्यों का योगदान आवश्यक माना जाता है। दर्शन की परम्पराओं में मूल्य को शुभ माना जाता है, ‘शुभ’ का अर्थ शुभत्व को प्राप्त करना। मानव का नैतिक आचरण सद्गुणों के अनुकूल होना चाहिए। सद्गुणों से पूर्ण आचारण को शुभ और बुरे आचरण को अशुभ कहा जाता है। शुभ को ही सत्यम् शिवम् सुन्दरम् की संज्ञा प्रदान की जाती है। भारतीय दर्शन के दृष्टिकोणों के आधार पर इन तीनों मूल्यों को मूल्य के रूप में त्रयी माना गया है। इसी प्रकार से आध्यात्मिक मूल्यों को समझने के लिए सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् का उदाहरण सर्वोच्च माना गया है। सत्य ही शिव है, शिव ही सुन्दर है, शिवम् का मतलब शुभ, कल्याणकारी, मंगलकारी माना जाता है। सद्आचरण और श्रेयस्कर जीवन मूल्यों पर आधारित है। सत्य मानव जीवन की आधारशिला है। इसके बिना मानव का कोई अस्तित्व नहीं है। इसका तात्पर्य, जो कल्याणकारी जीवन मूल्यों पर आधारित है। जीवन मूल्यों पर आधारित मानव का मूल्य है। जो आचारण की गम्भीरता को दार्शनिक दृष्टि से मूल्यों का चिन्तन किसी व्यक्ति विशेष पर आधारित है। इस तरह से बल्कि मूल्य सम्पूर्ण सृष्टि के प्राणी को मानवता की दृष्टि से खोजने का प्रयास करना चाहिए। उसी प्रकार से दर्शन उपयोगितावादी मूल्यों का अध्ययन नहीं करता है, वह तो सार्वभौमिक मूल्यों का वैचारिक चिन्तन करता है।
बीज शब्द- जीवन मूल्य, जीवन दर्शन, मानवता, क्रान्तिकारी, मंगलकारी, सार्वभौमिक, सात्विक एवं शुभत्व आदि।
शोध प्रविधि :-
इस शोध पत्र में प्राथमिक एवं द्वितीयक शोध सामाग्री के आधार पर अध्ययन किया गया है। इस शोध पत्र पर आधारित अध्ययन के लिए मूल्य मीमांस, तत्त्वमीमांसा एवं ज्ञानमीमांसा की दृष्टि से अध्ययन किया गया है। इसके साथ-साथ मूल ग्रन्थों, पत्र-पत्रिकाओं एवं विद्वानों का भी मार्गदर्शन लिया गया है।
समस्या :-
सबसे पहली समस्या मानवीयता की है। आज मानव मानवीय मूल्यों से भटकता जा रहा है। उसे जीवन के सर्वोच्च सत्व पर आधारित मूल्यों को पीछे छोड़ दिया है। समाज में आये दिन हो रही हिंसा इस बात का प्रमाण है कि सामाजिक मूल्यों में दिनोंदिन गिरावट आ रही है। लोग झूठ, लालच, हिंसा, बलात्कार आदि कार्यों में लिप्त है। इससे समाज दिनोंदिन अनेक कठिनाईयों का सामना कर रहा है। विचारों की क्रान्तिकारी परिवर्तन ने मानवता को नुकशान पहुँचा रहा है। इन विसंगतियों के परिणाम स्वरूप समाज में होने वाली अप्रिय घटनाएँ दशा और दिशा दोनों से भटकती जा रही है।
शोध पत्र समीक्षा :-
जीवन मूल्य एवं जीवन दर्शन विषय पर, जीवनमूल्य भाग-2 के लेखक प्र.ग. सहस्रबुद्धे, सुरुचि प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, ने व्यक्तित्व विकास एवं राष्ट्र के विकास के विविध आयामों को दृष्टिगत रखते हैं। इससे समग्र संसार को हमें नवजीवन देना आवश्यक है। सदाचरण और मर्यादा पालन, पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट, मथुरा, 2015, कहते है कि समाज की सुव्यवस्था मर्यादाओं पर टिकी हुई है।
उद्देश्य :-
जीवन दर्शन एवं जीवन मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए मानव को मूल्योंन्मुखी आचरण अपनाने की आवश्यकता है। इसके बिना समाज के किसी भी मूल्यों की कल्पना नहीं की जा सकती है। जीवन मूल्यों को बनाये रखने के लिए अहिंसक सिद्धान्त को अपनाने की आवश्यकता है। समाज में मूल्यों के लिए ईमानदारी पूर्ण जीवनचर्या का निर्माण करना है।
समाधान :-
मानव के जीवन में जीव, मन और आत्म में समाज की परिकल्पना को सुख, आनन्द और व्यवहार के आधार पर चिन्तन द्वारा सिद्ध करने के लिए तर्क का प्रयोग किया जाता है। दार्शनिक ज्ञान की अवस्था को तर्क की कसौटी में कभी बाधक नहीं बनाया जा सकता है। एक ओर मानव का सामाजिक जीवन, दूसरी ओर जन्मगत जातिव्यवस्था, यह कठिन रूढ़ियों से बाधित होता है। किसी भी जाति में व्यक्ति जन्म लिया हो, किन्तु वह बौद्धिक चिन्तन के आधार पर ज्ञानात्मक प्रणाली के आधार पर किसी भी समुदाय और सम्प्रदाय की समीक्षा कर सकता है। इसीलिए बुद्धि को जीवन मूल्यों का नैतिक आधार प्रदान करता है।10 यही भारतीय जीवन मूल्यों की बौद्धिकता का एक संयमित प्रमाण माना जा सकता है। जहाँ ब्रह्म विद्या ही नहीं, बल्कि तर्कशास्त्र, व्याकरण, ज्योतिष, भाषा शास्त्र आदि मानव के बौद्धिक मूल्यों के जीवन मूल्यों के लिए सृजनशीलता के प्रमाण है। यह भारतीय ज्ञान परम्परा का नैतिक एवं मौलिक स्रोत माना जाता है।
भारतीय जीवन मूल्यों पर आधार यह राष्ट्रीय मूल्यों में सांस्कृतिक एकता और अखण्डता से समझाने का अथक प्रयास किया जा सकता है। भारतीय संस्कृति किसी भी समाज का उच्चतम मानवीय मूल्यों की संरचना करती है। मानव मूल्यों का आचरण पक्ष भी भारतीय संस्कृति में अन्तर्निहित जीवन दृश्यों पर आधारित है। भारतीय संस्कृति के भव्य स्वरूप में सृष्टि जगत् के सभी प्राणी मानवीय मूल्यों के लिए आज भी नतमस्तक प्रतीत होता है। भारतीय संस्कृति मानवीय मूल्यों के साथ में ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः’ की सार्थकता की कल्पना की गई हैं। इस सृष्टि में निवास करने वाले सभी प्राणियों को सुखी रहने की कल्पना की जाती है। जीवन दर्शन एवं मानवीय मूल्य भारतीय संस्कृति का उद्घोष रहता है। जबकि सांस्कृतिक मूल्यों को मुख्य रूप से बृहद् रूप से आधारित किया जा सकता है। मानव की आन्तरिक और बाह्य मूल्यों के सुसंस्कृत समूह को संस्कृतिक प्रणाली पर आधारित किया गया है। भारतीय संस्कृति जीवन दर्शन एवं जीवन मूल्यों के अर्थ मानव के आन्तरिक विकास और उसके आचरण की उन्नति पर आधारित किया जाता है। मानव एक-दूसरे के सद्आचरण को समझने की शक्ति समाज के मानवीय मूल्यों पर आश्रित रहते हैं। किसी भी जाति अथवा राष्ट्र के शिष्टाचारी मानव के विचार, वाणी एवं क्रिया का जो रूप व्याप्त रहने के लिए कारगर कार्य कहा जाता है। जीवन मूल्यों और जीवन दर्शन यही राष्ट्रीय मूल्यों की सबसे बड़ी पहचान के रूप में कार्य करता है। इसी कारण व्यवहार में कर्म का क्षेत्र अहंकार मूलक है। ये भोग वासनात्मक होता है। ज्ञान प्रधान कर्म निजी अहंकार और भोग से कोई सम्बन्ध नहीं रखता है। इसके साथ-साथ सात्विक व्यवहार का एक अंग माना जा सकता है। ज्ञान और कर्म दोनों मूल्य है। कर्म और ज्ञान दोनों व्यवहार में ही निहित है। व्यावहारिक मूल्यों के दो भेद हैं, ज्ञान प्रधान, दूसरा कर्म प्रधान है।
जीवन दर्शन और जीवन मूल्यों के सुख और दुःख :-
प्रकृति ने मानव को सुख की अच्छा और दुःख को द्वेष के रूप में प्रदान किया है। ये सहज रूप में व्यावहारिक तत्व का साक्षात्कार करता है। जो हमारी ज्ञान की सम्पूर्ण क्रियाओं को प्रभावित करता है। यह विषय अच्छे जीवन मूल्यों या बुरे जीवन मूल्यों के रूप में सुख या दुःख के सम्बन्धित होता है। जीवन मूल्य और दर्शन के लिए नैतिक मूल्यों को मानव सदाचार की दिशाओं को प्रदर्शित करता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि धर्म के आध्यात्मिक पक्ष को मूल्यों के माध्यम से अत्यधिक महत्व प्रदान किया गया है।
मूल्यों को जीवन में आत्मसात करना आवश्यक प्रतीत होता है। इससे आध्यात्मिक मूल्यों को मानवीय मूल्यों के साथ जोड़कर मानव के व्यक्तित्व और चरित्र का निर्माण कर सकता है। इस प्रकार से सामाजिक मूल्यों को लेकर आध्यात्मिक मूल्य, बौद्धिक मूल्य, और भावनात्मक मूल्यों के आधार पर आधारित है। इन मूल्यों को मानव के सम्पूर्ण जीवन व्यक्तित्व को संतुष्ट करने का प्रयास करता है। इस प्रकार से आन्तरिक मूल्यों की आधारशिला के रूप में देखा जा सकता है। इस प्रकार से मानव बुद्धि आन्तरिक साध्य मूल्यों को समझने में असमर्थ है। बुद्धि के आधार पर मूल्यों को तात्विक एकता के रूप अध्ययन करना, ताकि उनका दृष्टिकोण ज्ञानात्मक दृष्टि, भावनात्मक दृष्टिकोण पर आधारित संकल्पनात्मक दृष्टि के पक्ष में मूल्यों को समझना अति आवश्यक प्रतीत होता है। ज्ञानात्मक, भावनात्मक और संकल्पनात्मक इनकों पृथक करना असम्भव ही है। संकल्पनात्मक मूल्य आदर्श और शुभ व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं। शुभ का बोध मानव में ज्ञानात्मक दृष्टि से होती है। इसी कारण मानव में नैतिक मूल्यों की बाध्यता की अनुभूति का प्रश्न उत्पन्न होता है। यह नैतिक बाध्यता, सत्य के बोध में पाई जाती है। यथार्थ रूप में शिष्टाचार ही जीवित शास्त्र रहा है। समाज में शास्त्र के द्वारा ही एक नहीं, अनेक ग्रन्थ लिपि बद्ध होने के कगार में है। अधिकांशतः नैतिक मूल्यों की चर्चा विस्तृत रूप से की जाती है। नैतिक मूल्यों का तीन प्रकार से विभाजन किया गया है। आर्थिक, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक इन्हीं ही भारतीय जीवन दर्शन में मूल्यों को अर्थ और काम के रूप में सम्बोधित किया गया है। इसी दृष्टि से नैतिक मूल्य मानव जीवन की रक्षा एवं व्यक्तित्व का समन्वित विकास करता है, जिससे मानव ऊर्जा की इच्छाओं की पूर्ति करने में सफल हो सकता है। भारतीय दर्शन में सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्यों को अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।
निष्कर्ष :-
जीवन दर्शन एवं जीवन मूल्यों सामाजिक एकता का सूत्रधार रहा है। इसके लिए मानवीय जीवन के लिए व्यवहारिक जीवन ही यथार्थ और बौद्धिक आधार पर आधारित ठोस जीवन जीने की कला का निर्माण करता है। इसी में व्यक्ति समाज की ऐतिहासिकता का जीवन जीना आवश्यक प्रतीत होता है। देहाभिमानी मानव के लिए शरीर रक्षा के लिए जीवन मूल्य बनते हैं। इसमें अनेक आवश्यकताओं के मूल्यों को व्यक्त करने का प्रयास किया जाता है। भोजन वस्त्र, अच्छादन, के आधार पर श्रम विभाजन, उत्पादन, उपभोग, उपकरण व्यवस्था आदि पर आधारित है। इसी में शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति व्यावहारिक मूल्यों के द्वारा निगमित होती है। जीवन में सम्पूर्ण मानवीय मूल्य नित्य जीवन में मिलते है। कर्म, के अच्छादन की इच्छा, ज्ञान भोग और संस्कार आदि व्यवहारिक मूल्यों के क्रम चक्र में जन्म से मृत्यु पर्यन्त तक निरन्तर चलते रहते हैं।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची-
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- प्रसाद, डॉ. मणिशंकर, कौटिल्य के राजनीतिक एवं सामाजिक विचार, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, संस्करण, प्रथम, 1998, पृष्ठ 35
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- प्रसाद, महादेव महात्मा गांधी का समाज दर्शन, हरियाणा ग्रन्थ अकादमी, पंचकूल, छठा संस्करण, 2012, पृष्ठ 26
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