| Dr. Alok Chauhan Astt. Prof. (Geography) School of Humanities & Social Sciences Vardhman Mahaveer Open University Kota (Rajasthan) | Rahul Singh Research Scholar (Geography) Vardhman Mahaveer Open University Kota (Rajasthan) |
Abstract
बारां जिले के किशनगंज एवं शाहबाद तहसीलों में निवास करने वाली सहरिया जनजाति की व्यवसायिक क्रियाओं का अध्ययन यह दर्शाता है कि आज भी यह जनजाति मुख्यतः कृषि मजदूरी, वनोपज संग्रहण तथा असंगठित श्रम कार्यों पर निर्भर है। अध्ययन में कुल 300 उत्तरदाताओं का सर्वेक्षण किया गया, जिसमें सर्वाधिक 60.6 प्रतिशत उत्तरदाता कृषि मजदूर के रूप में कार्यरत पाए गए, जबकि केवल लगभग 10 प्रतिशत परिवारों के पास सीमित कृषि भूमि उपलब्ध है। निजी क्षेत्र में रोजगार प्राप्त करने वाले उत्तरदाताओं का प्रतिशत 11.6 पाया गया, जबकि सरकारी नौकरी में केवल 3 प्रतिशत लोग कार्यरत हैं। अध्ययन से ज्ञात हुआ कि वनोपज संग्रहण सहरिया समुदाय का पारंपरिक व्यवसाय रहा है, जिसमें तेंदूपत्ता, महुआ, गोंद, शहद तथा जड़ी-बूटियों का संग्रहण प्रमुख है। किन्तु वन क्षेत्रों में कमी, सरकारी प्रतिबंधों तथा उचित मूल्य न मिलने के कारण यह व्यवसाय कमजोर होता जा रहा है। वर्तमान में केवल 4 प्रतिशत उत्तरदाता वनोपज संग्रहण से जुड़े पाए गए। पशुपालन भी इनकी आजीविका का सहायक साधन है, जिसमें बकरी पालन और मुर्गी पालन प्रमुख हैं। अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के सीमित अवसर होने के कारण सहरिया समुदाय का बड़ा भाग प्रवास के लिए विवश है। लगभग 52.4 प्रतिशत उत्तरदाता रोजगार, अधिक मजदूरी, शिक्षा एवं विवाह जैसे कारणों से अन्य क्षेत्रों में प्रवास करते हैं। गैर-कृषि मजदूरी के अंतर्गत ईंट-भट्टों, पत्थर खदानों, निर्माण कार्यों तथा औद्योगिक क्षेत्रों में श्रम कार्य प्रमुख हैं। आर्थिक स्थिति के विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि अधिकांश परिवार निम्न एवं मध्यम आय वर्ग में आते हैं। अधिकांश परिवारों की मासिक आय 6000 से 8000 रुपये तथा वार्षिक आय 20000 से 40000 रुपये के मध्य पाई गई। शिक्षा की कमी, सीमित संसाधन, भूमिहीनता, वन संसाधनों में कमी तथा रोजगार के अभाव के कारण सहरिया जनजाति की आर्थिक स्थिति अभी भी कमजोर बनी हुई है। अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया कि इस समुदाय के सामाजिक-आर्थिक विकास हेतु रोजगार सृजन, कौशल विकास, शिक्षा विस्तार तथा सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
Keywords: सहरिया जनजाति, कमजोर जनजातीय समूह (PVTG), व्यवसाय,कृषि मजदूरी, प्रवास, सामाजिक-आर्थिक, पिछड़ापन, प्राकृतिक संसाधन, जीवनशैली, आधुनिक परिवर्तन, सांस्कृतिक परंपराएँ।
- परिचय
सहरिया जनजाति प्राचीन काल से ही प्रकृति एवं वन संसाधनों पर आधारित जीवन व्यतीत करती रही हैं। इन जनजातियों की जीवनशैली, व्यवसायिक संरचना तथा सांस्कृतिक परंपराएँ उनके भौगोलिक पर्यावरण से गहराई से प्रभावित होती हैं। राजस्थान राज्य में निवास करने वाली सहरिया जनजाति एक आदिम एवं विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) है, जिसकी सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर मानी जाती है। बारां जिला राजस्थान का वह प्रमुख क्षेत्र है जहाँ सहरिया जनजाति की सर्वाधिक जनसंख्या निवास करती है। जिले की शाहाबाद एवं किशनगंज तहसीलें में राज्य की लगभग 99% सहरिया जनजाति निवास करती है। यह क्षेत्र वनाच्छादित, पठारी एवं अपेक्षाकृत अविकसित होने के कारण यहाँ के निवासियों की आजीविका मुख्यतः प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित रही है। सहरिया जनजाति का जीवन जंगल, भूमि एवं स्थानीय पर्यावरण से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है।
वर्तमान समय में सहरिया जनजाति की अधिकांश जनसंख्या कृषि, कृषि मजदूरी, वनोपज संग्रह, पशुपालन तथा असंगठित श्रम कार्यों में संलग्न है। सीमित भूमि स्वामित्व, सिंचाई सुविधाओं का अभाव, अशिक्षा एवं निर्धनता के कारण इनकी आर्थिक स्थिति कमजोर बनी हुई है। रोजगार के स्थायी अवसरों की कमी के कारण बड़ी संख्या में सहरिया परिवार मौसमी प्रवास करने के लिए भी विवश होते हैं। यह प्रवास मुख्यतः निर्माण कार्य, ईंट-भट्टों एवं दैनिक मजदूरी से संबंधित होता है।
प्रस्तुत शोध पत्र में बारां जिले की सहरिया जनजाति की व्यवसायिक क्रियाओं का भौगोलिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। अध्ययन में कृषि, कृषि मजदूरी, वन आधारित व्यवसाय, पशुपालन, कुटीर उद्योग एवं प्रवासी श्रम जैसी आर्थिक गतिविधियों का विस्तृत अध्ययन किया गया है। साथ ही उन भौगोलिक एवं सामाजिक-आर्थिक कारकों का भी विश्लेषण किया गया है, जो इनके व्यवसायिक स्वरूप को प्रभावित करते हैं। यह अध्ययन सहरिया जनजाति की आर्थिक समस्याओं को समझने तथा उनके सतत विकास हेतु उपयुक्त सुझाव प्रस्तुत करने में सहायक सिद्ध होगा।
- साहित्य पुनरावलोकन (Review of Literature):-
एम.एल. वर्ना (1992) ने भीलों की सामाजिक व्यवस्था सम्बन्धित अध्ययन में बताया है कि भील जनजाति सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण से इतने पिछड़े होते है कि अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ही कर पाते। इन लोगों के पास जीवन जीने के लिये संसाधनों का अभाव, जैसे कृषि के लिये जमीन का न होना, पशुधन की अपर्याप्त ऐसे अनेकों कारणों से ये दयनीय जीवन व्यतीत करने के लिये विवश है। यह देखने में आया है कि इस जनजाति के अधिकतम लोगों को दैनिक मजदूरी पर कार्य मिलता है एवं भुगतान के रूप में अत्यन्त अल्प भुगतान किया जाता है तथा ठेकेदारों द्वारा इनका शोषण किया जाता है। इसके अतिरिक्त साहूकार व महाजन इन्हें धन देकर फसल पकने पर तीगुने. चौगुने आकार में राशि वसूल की जाती है जो कि इनके शोषण की उच्चतम सीमा है।
रेनू सिसोदिया (2024) के शोधग्रंथ Creating Spaces for Tribal Sahariya Youth to Improve Access to Safe water in Rural Rajasthan, India में सहरिया बाहुल्य क्षेत्र में पीने के पानी की समस्या के समाधान के लिए सरकारी योजनाओं और जन सहभागीदारी के अंतर्गत सहरिया के युवाओं की भूमिका का अध्ययन किया ।
सुनैना धनकर और निशा यादव (2023) ने अपने शोध में बारां जिले की सहरिया समुदाय के अंतर्गत सार्वजनिक वितरण प्रणाली की स्थिति का अध्ययन किया है
विभा शर्मा (2016) ने अपने शोध पत्र में “शिक्षा, नगरीकरण और विकास प्रक्रिया एवं आदिवासी संस्कृति शीर्षक के अंतर्गत अध्ययन किया और पाया कि आदिवासी समाज की अपनी शिक्षा पद्धति रही है जो सैद्धांतिक पक्ष की तुलना में अधिक व्यावहारिक रही है।
टी.बी. नायक (1994) ने ‘द सहरिया’ में सहरिया जनजाति के भौगोलिक क्षेत्र एवं ऐतिहासिक परिपेक्ष्य का वर्णन किया है तथा बताया है कि सहरिया जनजाति को स्वयं के उद्भव एवं विकास के बारे में अत्यन्त अल्प जानकारी है। यह जनजाति विकास से कोसों दूर है एवं जंगल, पहाड़, नदियों का क्षेत्र कहीं भी बस जाते है। नायक ने मुख्य रूप से सहरिया जनजाति के निवास स्थान तथा भौगोलिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया है।
रश्मि श्रीवास्तव (2012) ने अपनी पुस्तक ‘सहरिया जनजाति साहित्य एवं संस्कृति में सहरिया जनजाति की सामाजिक-आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थिति की विशद् चर्चा की है। इसके अन्तर्गत सहरिया जनजाति का ऐतिहासिक स्वरूप, भौगोलिक स्वरूप, सांस्कृतिक रीतिरिवाज, लोककलाएं आदि को स्पष्ट करते हुये बताया है कि वर्तमान आधुनिक परिपेक्ष्य में भी अपनी परम्परागत संस्कृति को बनाये हुये है।
संजय पाण्डेय (1993) “दक्षिण पश्चिम मध्यप्रदेश के आदिवासियों का सामाजिक आर्थिक शोषण सम्बन्धी अध्ययन में जनजातियों के आर्थिक जीवन के स्वरूपों का अध्ययन विश्लेषण किया है तथा अपने अध्ययन में बताया है कि यह जनजातीय लोग 70 प्रतिशत से अधिक ऋण व्यवसाय के स्वामी तथा महाजनों से ही लेना पसन्द करते हैं। यह ऋण परिवार की मूलभूत आवश्यकताओं के साथ-साथ मांगलिक कार्यक्रमों, उत्सवों तथा अन्य धार्मिक कार्यों के लिये जाते हैं।
उद्देश्य – राजस्थान के बारां जिले में सहरिया जनजाति की व्यवसायिक क्रियाओं में हुए आधुनिक परिवर्तन का मूल्यांकन करना
- डेटा बेस और शोध विधितंत्र (Data Base and Research Methodology):-
डेटा संग्रह– वर्तमान अध्ययन बारां जिले में निवासरत सहरिया जनजाति की सांस्कृतिक विरासत पर आधुनिक विकास के प्रभाव का विश्लेषण हेतु उपयोग किए गए आंकड़े दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया — प्राथमिक एवं द्वितीयक आंकड़े।
§ द्वितीयक आंकड़े
द्वितीयक आंकड़ों का संग्रह बारां जिले की जिला जनगणना पुस्तिका, राजस्थान की विभिन्न जनगणना श्रृंखलाओं, राज्य सरकार द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं एवं दस्तावेजों, तथा जिला मुख्यालय से प्राप्त अन्य महत्त्वपूर्ण जानकारी से किया गया है। इन आंकड़ों में सहरिया जनजाति की जनसंख्या, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएँ, आवास, और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता से संबंधित तथ्य शामिल हैं।
- प्राथमिक आंकड़े
प्राथमिक आंकड़ों के संग्रह हेतु मई से जुलाई 2025 के मध्य गहन क्षेत्रीय सर्वेक्षण (Intensive Field Work) किया गया। इस सर्वेक्षण में सहरिया समुदाय के व्यक्तियों से प्रत्यक्ष साक्षात्कार, प्रश्नावली, पर्यवेक्षण एवं चर्चाओं के माध्यम से जानकारी प्राप्त की गई। अध्ययन में सांस्कृतिक प्रथाओं, बोली-भाषा, त्योहारों, पारंपरिक वेशभूषा, आजीविका, सामाजिक ढांचे तथा आधुनिकता के प्रभाव से आए परिवर्तनों को विशेष रूप से दर्ज किया गया।
4.1 प्रतिचयन / निदर्शन (Sampling)- संसाधनों की कमी (समय और जनशक्ति दोनों की दृष्टि से) तथा अध्ययन क्षेत्र के बड़े आकार होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचना संभव नहीं था। बारां जिले की किशनगंज और शाहाबाद तहसील में राजस्थान की लगभग 98% सहरिया जनजाति के लोग निवास करते है, परिणामस्वरूप, प्राथमिक आंकड़ों के संकलन के लिए किशनगंज और शाहबाद तहसील के 5-5 गांवों का चयन किया गया l शोधार्थी द्वरा गांवों का चयन करने के लिए इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है की इन गांवों की कुल जनसंख्या में से सहरियाओं की कुल जनसंख्या लगभग 75% से अधिक हो । इसके पश्चात प्रत्येक गांव में से 30 -30 परिवारों का चयन दैव यादृच्छिक प्रतिचयन विधि (Simple Random Sampling Techniques) के माध्यम से किया गया।
- अध्ययन क्षेत्र-
| तहसील का नाम | क्षेत्रफल (KM SQ.) | गाँव की संख्या | जनसँख्या | ||||||
| कुल जनसंख्या | अनुसूचित जनजाति (ST) | अनुसूचित जनजाति का कुल जनसँख्या में से प्रतिशत (ST) | सहरिया जनसँख्या | कुल जनसँख्या में से सहरिया की संख्या का प्रतिशत | |||||
| 1 | मांगरोल | 440 | 118 | 1,06,963 | 23,683 | 22.14 | 3154 | 2.94 | |
| 2 | अंता | 543.2 | 82 | 1,20,038 | 10,952 | 9.12 | 4189 | 3.48 | |
| 3 | बारां | 340.8 | 148 | 2,13,555 | 26223 | 12.27 | 5316 | 2.5 | |
| 4 | अटरू | 833.5 | 151 | 1,49,959 | 27826 | 18.55 | 5294 | 3.53 | |
| 5 | किशनगंज | 1451 | 203 | 1,66,864 | 60316 | 36.15 | 39308 | 23.56 | |
| 6 | शाहबाद | 1460 | 236 | 1,42,061 | 41808 | 39.49 | 34687 | 32.76 | |
| 7 | छबड़ा | 799.9 | 196 | 1,52,429 | 29970 | 19.66 | 4279 | 2.8 | |
| 8 | छीपाबड़ौद | 850.2 | 187 | 1,70,886 | 43074 | 25.2 | 5897 | 3.45 | |
| — | कुल | 6718.6 | 1321 | 12,22,755 | 263,852 | 21.57 | 102124 | 8.35 | |
- अवस्थिति (Location):-
बारां जिला 24°24′ से 25°26′ उत्तरी अक्षांश और 76°12′ से 72°26′ पूर्वी देशान्तर पर राजस्थान के दक्षिण- पूर्व भाग में अवस्थित है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई-262 मीटर है। बारां जिला पूर्वी, दक्षिणी और, दक्षिण-पूर्वी दिशा में मध्यप्रदेश राज्य से तथा उत्तर-पश्चिम दिशा में कोटा जिले से और दक्षिण-पश्चिम में झालावाड़ जिले से घिरा हुआ है। बारां जिले का उत्तर से दक्षिण की ओर विस्तार लगभग 110 किमी. और पश्चिम से पूर्व की ओर विस्तार लगभग 120 किमी. है। बारां जिला राजस्थान राज्य के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित है और इसका भौगोलिक विस्तार 24˚24′ से 25˚26’ उत्तरी अक्षांश तथा 76˚12′ से 77˚26’ पूर्वी देशांतर के बीच फैला हुआ है। इस प्रकार यह जिला उत्तर-दक्षिण दिशा में लगभग 110 किलोमीटर और पूर्व-पश्चिम दिशा में लगभग 120 किलोमीटर तक विस्तृत है। पूर्व, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व दिशा में यह जिला मध्य प्रदेश राज्य से घिरा हुआ है। विशेष रूप से यह गुना, शिवपुरी और राजगढ़ जिलों की सीमाओं से जुड़ा है। जबकि उत्तर दिशा में बारां की सीमा कोटा जिले से मिलती है, जो राजस्थान का एक प्रमुख औद्योगिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र है और पश्चिम दिशा में इसकी सीमा झालावाड़ जिले से मिलती है, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस प्रकार, बारां जिला क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान के मध्यम आकार के जिलों में आता है, लेकिन इसकी प्राकृतिक, भौगोलिक और सामाजिक विशेषताएं इसे विशेष स्थान प्रदान करती हैं।

Fig. 1.1

Fig. 1.2
- उत्तरदाताओं का वर्तमान व्यवसाय
प्रस्तुत अध्याय शोधार्थी द्वारा बारां जिले के किशनगंज और शाहबाद तहसील की सहरिया जनजाति के वर्तमान व्यवसाय के संबध उत्तरदाताओं से अनेक प्रश्न पूछे गये और यह समझने का प्रयास किया गया की बदलते आर्थिक युग में यह जनजाति अपने परम्परागत आर्थिक क्रियाकलापों से कितना जुड़े हुए हैं? प्राप्त आंकड़ों का विवरण निम्न तालिका में किया गया है,
तालिका क्रमांक
| क्र. स. | उत्तरदाताओं के वर्तमान व्यवसाय | किशनगंज | शाहबाद | महायोग | |||
| उत्तरदाताओं की संख्या | प्रतिशत | उत्तरदाताओं की संख्या | प्रतिशत | उत्तरदाताओं की संख्या | प्रतिशत | ||
| 1 | कृषि | 18 | 12 | 14 | 9.3 | 32 | 10.6 |
| 2 | कृषि मजदूर | 90 | 60 | 92 | 61.3 | 182 | 60.6 |
| 3 | वनोपज संग्रहण | 8 | 5.3 | 6 | 4 | 14 | 4.6 |
| 4 | लकड़ी काटना एवं बेचना | 5 | 3.3 | 4 | 2.6 | 9 | 3 |
| 5 | शिकार करना | 1 | 0.67 | 2 | 1.3 | 3 | 1 |
| 6 | सरकारी क्षेत्र नौकरी | 3 | 2 | 6 | 4 | 9 | 3 |
| 7 | निजी क्षेत्र में नौकरी | 18 | 12 | 17 | 11.3 | 35 | 11.6 |
| 8 | स्वयं का व्यवसाय | 7 | 4.6 | 9 | 6 | 16 | 5.3 |
| योग | 150 | 100 | 150 | 100 | 300 | 100 | |
व्यक्तिगत सर्वेक्षण-2024
उपरोक्त तालिका में शोधकर्ता द्वारा सहरिया जनजाति के वर्तमान व्यवसाय का विवरण प्रस्तुत किया गया है। तालिका में दिए गए आंकड़ों की विश्लेषण से यह ज्ञात हुआ की कुल 300 उत्तरदाताओं में सर्वाधिक 60.6 प्रतिशत उत्तरदाता कृषि मजदूरी कर अपनी आजीविका चलाते हैं। तालिका के अनुसार कुल उत्तरदाताओं में 11.6% उत्तरदाता निजी क्षेत्र में रोजगार प्राप्त कर अपनी आजीविका चलाते हैं, । गहराई से प्रश्न पूछने पर यह ज्ञात हुआ की कंपनियों द्वारा उनके चयन हेतु केवल उनकी शैक्षणिक योग्यताओं का ही ध्यान रखा जाता है, अन्य किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता है। क्षेत्र सर्वेक्षण के दौरान यह ज्ञात हुआ की मात्र 3% उत्तरदाता सरकारी नौकरी में भी है, हालांकि उच्च पद पर एक भी उत्तरदाता नहीं पाया गया । यह स्वभाव से बहुत भोल होते हैं, अतः आधुनिक समाज की चमक-दमक और दिखावे की संस्कृति से दूर रहना इनका स्वभाव बन गया है। कुल उत्तरदाताओं में 5.3% उत्तरदाताओं के पास स्वयं का व्यवसाय है जिसमें चाय की थड़ी, छोटी-छोटी सी दुकानें जिसमें रोजमर्रा की वस्तुएं मिलती है, कुछ टायर रिपेयर और दीवारों और घरों में पेंटिंग का काम भी करते हैं। 10 प्रतिशत उत्तरदाताओं के पास कृषि की भूमि है जिनका क्षेत्र 01 हेक्टर से भी कम है। दुखद बात यह है कि इस छोटी सी कृषि भूमि में भी वर्ष भर पानी भरा रहता है जिस वजह से इस भूमि में कृषि कार्य भी नहीं हो पाता । सरकारी प्रतिबंधों के चलते शिकार करना और लकड़ी काटना एवं बेचना अब बहुत कम हो गया है, मात्र 1% और 3% क्रमश: उत्तरदाता ये कार्य करते हैं। वनोपज संग्रहण इनका पारम्परिक कार्य था और वर्तमान में भी ये लोग आस-पास के जंगलों से तेंदूपत्ता ,गोंद, महुआ के फल, मधुमक्खियों के छत्तों से शहद, जड़ी–बूटियां ,लाख इत्यादि का संग्रहण करते हैं, ऐसा करने वाले उत्तरदाताओं का प्रतिशत 4% पाया गया है। वनोपज संग्रहण में अधिकतर महिलाओं शामिल होती है। यह कार्य परिवार के लिए अतिरिक्त आय का भी काम करती है।

आरेख क्रमांक 4.21
- कृषि मजदूरी
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है की सर्वेक्षित कुल सहरिया परिवारों में केवल 11.0 प्रतिशत परिवारों का प्रमुख कार्य/व्यवसाय कृषि जबकि 61.0 प्रतिशत परिवारों का प्रमुख कार्य खेतिहर अथवा कृषि मजदूरी है। कृषि मजदूरी की दर समय व स्थान के अनुसार परिवर्तनीय भी है। अध्ययन क्षेत्र में कृषि मजदूरी की दर पुरुषों के लिये 400 से 600 रुपये प्रतिदिन है, वहीं महिलाओं के लिये 300 से 500 रुपये प्रतिदिन है। 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों की दर कहीं महिलाओं की मजदूरी दर के बराबर तो कहीं उससे कम है। सहरिया परिवारों का रोजगार हेतु प्रवास सहरियाओं को वर्ष भर नियमित एवं निश्चित रोजगार न मिलने के कारण उन्हें प्रवास के लिए विवश होना पड़ता है। यह प्रवास प्रायः अल्पकालीन होता है जो कि 2 से 4 माह के लिए होता है। सर्वेक्षित परिवारों के प्रवास की स्थिति को तालिका से स्पष्ट किया गया है-
तालिका क्रमांक 4.23
| क्र.स. | प्रवास करते हैं | उत्तरदाताओं की संख्या | प्रतिशत |
| 1 | हाँ | 157 | 52.4 |
| 2 | नहीं | 143 | 47.6 |
| कुल | 300 | 100 | |
| यदि हाँ तो प्रवास का कारण | |||
| क्र.स. | प्रवास का कारण | उत्तरदाताओं की संख्या | प्रतिशत |
| 1 | रोजगार के लिए | 74 | 47 |
| 2 | अधिक मजदूरी प्राप्ति हेतू | 32 | 20 |
| 3 | शिक्षा के लिए | 13 | 8 |
| 4 | उच्च जीवन स्तर के लिए | 7 | 4.4 |
| 5 | विवाह के लिए | 22 | 14 |
| 6 | अन्य कारण | 9 | 5.7 |
| कुल | 157 | 100 | |
व्यक्तिगत सर्वेक्षण-2024

आरेख क्रमांक 4.23
उपरोक्त तालिका के अनुसार सहरिया समुदाय के 52.4 प्रतिशत उत्तरदाता यह मानते हैं की सहरिया जनजाति के लोग विभिन्न कारणों से प्रवास करते हैं, जिनमें से सर्वाधिक 47 प्रतिशत लोग रोज़गार के लिए नगरों की ओर प्रवास करते हैं, 20 प्रतिशत लोग अधिक मजदूरी की चाह में दूर-दराज़ के इलाकों में जाते हैं। 14 प्रतिशत सहरिया समुदाय के लोग विवाह के लिए नगरों की ओर रुख अपनाते हैं, उच्च जीवन स्तर की लालसा के लिए मात्र 4.4 प्रतिशत प्रवास करते हैं। नये युवक-युवतियाँ में शिक्षा के लिए शहरों की ओर जाने की प्रवृत्ति बढती जा रही है, ऐसे उत्तरदाता लगभग 8 प्रतिशत हैं। हालाँकि इस समुदाय के लोग शर्मिले स्वभाव के होते हैं लेकिन आधुनिकता के प्रभाव के कारण अब यह समुदाय प्रवास करने लगा हैं।
- वनोपज संग्रहण
सहरिया जनजाति का जीवन प्राचीन काल से जंगल एवं वनोपजों पर आधारित रहा है। अधिकांश सहरिया बस्तियाँ वनों के निकट स्थित हैं तथा उनकी आजीविका मुख्यतः जड़ी-बूटियों, शहद, गोंद, तेंदूपत्ता, महुआ एवं जलाऊ लकड़ी के संग्रहण पर निर्भर रही है। 1894 की वन नीति के लागू होने के बाद जंगलों में प्रवेश एवं वनोपज संग्रहण पर प्रतिबंध लगने से उनके पारंपरिक व्यवसाय प्रभावित हुए। वर्तमान में वन अधिकार अधिनियम, 2006 के बाद उन्हें पुनः कुछ अधिकार प्राप्त हुए हैं, किन्तु घटते वन क्षेत्र, वनोपजों की कमी तथा उचित मूल्य न मिलने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर बनी हुई है। वर्तमान समय में सहरिया जनजाति कृषि, कृषि मजदूरी, वनोपज संग्रहण, पशुपालन एवं असंगठित श्रम कार्यों में संलग्न है। स्थानीय स्तर पर रोजगार के सीमित अवसर होने के कारण बड़ी संख्या में सहरिया मजदूरी हेतु अन्य क्षेत्रों में प्रवास भी करते हैं। भौगोलिक परिस्थितियाँ, वन संसाधन, भूमि की प्रकृति एवं सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन इनके व्यवसायिक स्वरूप को प्रभावित करते हैं। प्रस्तुत अध्ययन में बारां जिले की सहरिया जनजाति की व्यवसायिक क्रियाओं का भौगोलिक विश्लेषण किया गया है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति एवं आजीविका संबंधी समस्याओं को समझा जा सके। अध्ययंगत उत्तरदाताओं से यह ज्ञात करने का प्रयास किया गया की संग्रहित वनोपज कहाँ बेचते हैं, जिसका विवरण तालिका क्रमांक में किया गया है-
तालिका क्रमांक 4.24
| क्र.स. | विक्रय केंद्र | उत्तरदाताओं की संख्या | प्रतिशत |
| 1 | सेठ-साहूकारों के पास | 5 | 31.25 |
| 2 | गाँव के बाज़ार में | 4 | 25 |
| 3 | ठेकेदारों के पास | 7 | 43.75 |
| योग | 16 | 100 | |
व्यक्तिगत सर्वेक्षण-2024
संग्रहित वनोपज कहाँ बेचने संबधी तालिका से ज्ञात होता है की अधिकतम 43.75 प्रतिशत उत्तरदाता संग्रहित वनोपज ठेकेदारों के पास, 31 प्रतिशत सेठ-साहूकारों के पास तथा 25 प्रतिशत गाँव के बाज़ार में बेचते हैं।
- पशुपालन
सहरिया जनजाति मुख्य रूप से कृषि और मजदूरी के साथ-साथ पशुपालन को भी अपनी आजीविका का एक महत्त्वपूर्ण आधार मानती है। पशुपालन से इन्हें दूध, घी, अंडे आदि से पोषण मिलता है तथा पशुओं की बिक्री से अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। खेती में बैल खेत जोतने का प्रमुख साधन हैं, जिससे सीमांत सहरिया किसान लाभान्वित होते हैं।
तालिका क्रमांक 4.25
| क्र.स. | पशुपालन करते हैं अथवा नहीं | उत्तरदाताओं की संख्या | प्रतिशत |
| 1 | हाँ | 88 | 29.3 |
| 2 | नहीं | 212 | 70.6 |
| कुल | 300 | 100 | |
| यदि करते हैं तो उसका विवरण | |||
| क्र.स. | पशु का नाम | उत्तरदाताओं की संख्या | प्रतिशत |
| 1 | गाय | 6 | 6.8 |
| 2 | भैंस | 3 | 3.4 |
| 3 | बैल | 7 | 7.9 |
| 4 | बकरा-बकरी | 33 | 37.5 |
| 5 | मुर्गा-मुर्गी | 39 | 44.3 |
| योग | 88 | 100 | |
व्यक्तिगत सर्वेक्षण-2024


तालिका क्रमांक 4.24
सर्वेक्षित कुल 29.3 प्रतिशत सहरिया परिवार विभिन्न पशु पालते है। सर्वेक्षण में यह पाया गया की केवल तीन उत्तरदाताओं के पास भैंस पायी गई। 15% सहरिया परिवार गाय एवं बैल पालते है। गाय का दूध घरेलू उपयोग के लिए लेते है। अध्ययन क्षेत्र के 6.8 प्रतिशत परिवार गाय एवं 7.9 प्रतिशत परिवार बैल पालते है।37.5 प्रतिशत सहरिया परिवार बकरा-बकरी पालते हैं। है। किन्तु यह कार्य व्यवसायिक आधार पर कम परिवार ही करते हैं। कुछ सहरिया परिवार मुर्गे-मुर्गियाँ भी पालते है। इस प्रकार पशुपालन भी सहरियाओ की आर्थिक संरचना का एक महत्वपूर्ण अंग है।
- कुटीर उद्योग धंधे
उपरोक्त व्यवसायों/ कार्यों के अतिरिक्त सहरिया परंपरागत धंधे के रूप में कुटीर उद्यम को अपनाये हुए है। महरिया सियाडी बेल से टाकनियाँ बनाते है । खजूर के पत्तों से कलात्मक चकोटी (रोटी रखने की टोकनी), चटाई, झाडू, बिजना, दूल्हे का मुकुट आदि बनाते है। पलाश के पत्तों से दोना-पत्तल, पलाश की जड़ से रस्सी, काडई (सिर पर कलश रखने का चक्र), का निर्माण भी करते है। जंगल से लकड़ी लाकर खाट, हल, चटुवा (लकड़ी का चम्मच) पटा, मूसल, बच्चों के खिलौने, कुल्हाड़ी व फावडे की बेहटे एवं किवाड़ भी बना लेते है। इसी प्रकार पत्थर से रोटी बनाने का चकला, सिललोढा, चकिया, दलचा ओखली तथा मृतक स्मृति चिन्ह आदि का निर्माण किया जाता है। विक्रय कर आर्थिक लाभ प्राप्त करने योग्य गुणवत्ता की एवं अधिक मात्रा में इनका निर्माण नहीं किया जाता है।
- सहरिया जनजाति की आय
तालिका क्रमांक 4.26 परिवार की मासिक आय
| परिवार की मासिक आय | |||||||||||||||
| तहसील- किशनगंज | तहसील- शाहबाद | महायोग | |||||||||||||
| मासिक आय | पुरुष | महिला | पुरुष | महिला | पुरुष | महिला | कुल | ||||||||
| संख्या (I) | प्रतिशत (II) | संख्या (III) | प्रतिशत (IV) | संख्या (V) | प्रतिशत (VI) | संख्या (VII) | प्रतिशत (VIII) | संख्या (I+V=XI) | प्रतिशत | संख्या (III+VII=X) | प्रतिशत | संख्या (XI+X) | प्रतिशत | ||
| 2000रु से कम | 5 | 6.6 | 18 | 24 | 6 | 8 | 12 | 16 | 11 | 7.3 | 30 | 20 | 41 | 13.6 | |
| 2000रु से 4000रु | 8 | 10.6 | 22 | 29.3 | 10 | 13.3 | 28 | 37.3 | 18 | 12 | 50 | 33.3 | 68 | 22.6 | |
| 4000रु से 6000रु | 20 | 26.6 | 12 | 16 | 28 | 37.3 | 16 | 21.3 | 48 | 32 | 28 | 18.6 | 76 | 25.3 | |
| 6000रु से 8000रु | 32 | 42.6 | 18 | 24 | 26 | 34.6 | 15 | 20 | 58 | 38.6 | 33 | 22 | 91 | 30.3 | |
| 8000रु से अधिक | 10 | 13.3 | 5 | 6.6 | 5 | 6.6 | 4 | 5.3 | 15 | 10 | 9 | 6 | 24 | 8 | |
| योग | 75 | 100 | 75 | 100 | 75 | 100 | 75 | 100 | 150 | 100 | 150 | 100 | 300 | 100 | |
व्यक्तिगत सर्वेक्षण-2024

अध्ययन क्षेत्र में परिवारों की मासिक आय का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि अधिकांश परिवारों की आय 6000 से 8000 रुपये प्रतिमाह के मध्य है। इस आय वर्ग में कुल 91 उत्तरदाता (30.3 प्रतिशत) सम्मिलित हैं। इसके पश्चात 4000 से 6000 रुपये आय वर्ग में 76 उत्तरदाता (25.3 प्रतिशत) तथा 2000 से 4000 रुपये आय वर्ग में 68 उत्तरदाता (22.6 प्रतिशत) पाए गए। 2000 रुपये से कम आय वाले परिवारों की संख्या 41 (13.6 प्रतिशत) है, जबकि 8000 रुपये से अधिक आय प्राप्त करने वाले परिवार केवल 24 (8 प्रतिशत) हैं।तहसीलवार अध्ययन से स्पष्ट होता है कि किशनगंज तहसील में पुरुष उत्तरदाताओं का सर्वाधिक प्रतिशत 6000 से 8000 रुपये आय वर्ग में (42.6 प्रतिशत) है, जबकि महिलाओं में 2000 से 4000 रुपये आय वर्ग (29.3 प्रतिशत) प्रमुख है। दूसरी ओर शाहबाद तहसील में पुरुषों का सर्वाधिक प्रतिशत 4000 से 6000 रुपये आय वर्ग (37.3 प्रतिशत) तथा महिलाओं का 2000 से 4000 रुपये आय वर्ग (37.3 प्रतिशत) में पाया गया। समग्र रूप से अध्ययन क्षेत्र में निम्न एवं मध्यम आय वर्ग के परिवारों की प्रधानता परिलक्षित होती है।
सहरिया जनजाति की वार्षिक आय
| वार्षिक आय | तहसील- किशनगंज | तहसील- शाहबाद | महायोग | |||||||||||||
| पुरुष | महिला | पुरुष | महिला | पुरुष | महिला | कुल | ||||||||||
| संख्या (I) | प्रतिशत | संख्या (II) | प्रतिशत | संख्या (III) | प्रतिशत | संख्या (IV) | प्रतिशत | संख्या (I+III) | प्रतिशत | संख्या (II+IV) | प्रतिशत | संख्या (पु.+म.) | प्रतिशत | |||
| 10000रु से कम | 4 | 5.3 | 26 | 34.6 | 6 | 8 | 16 | 21.3 | 10 | 6.6 | 42 | 28 | 52 | 17.3 | ||
| 10000रु से 20000रु | 8 | 10.6 | 26 | 34.6 | 16 | 21.3 | 28 | 37.3 | 24 | 16 | 54 | 36 | 78 | 26 | ||
| 20000रु से 40000रु तक | 18 | 24 | 14 | 18 | 28 | 37.3 | 20 | 26.6 | 46 | 30.6 | 34 | 22.6 | 80 | 26.6 | ||
| 40000रु से 50000रु तक | 30 | 40 | 6 | 8 | 22 | 29.3 | 9 | 12 | 52 | 34.6 | 15 | 10 | 67 | 22.3 | ||
| 50000रु से अधिक | 15 | 20 | 3 | 4 | 3 | 4 | 2 | 2.7 | 18 | 12 | 5 | 3.3 | 23 | 7.6 | ||
| योग | 75 | 100 | 75 | 100 | 75 | 100 | 75 | 100 | 150 | 100 | 150 | 100 | 300 | 100 | ||
तालिका क्रमांक 4.27 परिवार की वार्षिक आय

आरेख क्रमांक 4.25
अध्ययन क्षेत्र में परिवारों की वार्षिक आय के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि सर्वाधिक उत्तरदाता 20000 से 40000 रुपये वार्षिक आय वर्ग में आते हैं। इस वर्ग में कुल 80 उत्तरदाता (26.6 प्रतिशत) सम्मिलित हैं। इसके निकट 10000 से 20000 रुपये आय वर्ग में 78 उत्तरदाता (26 प्रतिशत) तथा 40000 से 50000 रुपये आय वर्ग में 67 उत्तरदाता (22.3 प्रतिशत) पाए गए। 10000 रुपये से कम वार्षिक आय वाले परिवारों की संख्या 52 (17.3 प्रतिशत) है, जबकि 50000 रुपये से अधिक आय वाले परिवार केवल 23 (7.6 प्रतिशत) हैं तहसीलवार अध्ययन से स्पष्ट होता है कि किशनगंज तहसील में पुरुष उत्तरदाताओं का सर्वाधिक प्रतिशत 40000 से 50000 रुपये आय वर्ग (40 प्रतिशत) में है, जबकि महिलाओं का सर्वाधिक प्रतिशत 10000 रुपये से कम तथा 10000 से 20000 रुपये आय वर्ग (दोनों 34.6 प्रतिशत) में पाया गया। दूसरी ओर शाहबाद तहसील में पुरुषों का सर्वाधिक प्रतिशत 20000 से 40000 रुपये आय वर्ग (37.3 प्रतिशत) तथा महिलाओं का 10000 से 20000 रुपये आय वर्ग (37.3 प्रतिशत) में है। समग्र रूप से अध्ययन क्षेत्र में निम्न एवं मध्यम वार्षिक आय वर्ग के परिवारों की अधिकता दिखाई देती है।
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