माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन के आयामों पर लिंग और आत्म-प्रभावकारिता के प्रभावों का अध्ययन

अभय वीर सिंह
शोधार्थी, शिक्षा विभाग
हि.प्र.वि.वि.
शिमला (हिमाचल प्रदेश)
प्रो. अजय कुमार अत्री
आचार्य, शिक्षा विभाग
हि.प्र.वि.वि.
शिमला (हिमाचल प्रदेश)

Abstract

प्रस्तुत अध्ययन में अध्यापकों में निष्पादन के आयामों पर लिंग और आत्म-प्रभावकारिता के प्रभावों का परीक्षण किया गया है। न्यादर्श के रूप में हिमाचल प्रदेश के सिरमौर, सोलन, बिलासपुर और कांगडा के राजकीय विद्यालयों एवं अध्यापकों का चयन यादृच्छिक न्यादर्श विधि द्वारा किया गया। जिसमें राजकीय माध्यमिक विद्यालयों की कक्षा 6 से 10 तक अध्यापन करने वाले 276 अध्यापकों को सम्मिलित किया गया। अध्ययन में प्रदत्तां के संकलन हेतु मापनी के रूप में स्वनिर्मित अध्यापक निष्पादन मापनी और सूद एवं सेन (2017) द्वारा निर्मित अध्यापक आत्म-प्रभावकारिता मापनी का प्रयोग किया गया। प्रस्तुत अध्ययन में निष्कर्ष के रूप में प्राप्त हुआ कि पुरुष व महिला माध्यमिक अध्यापक में निष्पादन आयामों ’योजना एवं क्रियांवयन, शिक्षण दक्षता, कक्षा वातावरण और व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ में एक समानता है। माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन आयामों पर आत्म-प्रभावकारिता के उच्चए मध्यमऔर निम्न स्तर का सार्थक महत्त्वपूर्ण प्रभाव है। पुरुष व महिला माध्यमिक अध्यापकों के निष्पादन आयामों ’योजना एवं क्रियांवयन, शिक्षण दक्षता, कक्षा वातावरण और व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ पर आत्म-प्रभावकारिताका अंतःक्रियात्मक प्रभाव नहीं है।

Keywords- अध्यापक, निष्पादन, लिंग, आत्म-प्रभावकारिता।

प्रस्तावना
अध्यापक हमारे सामाजिक एवं शैक्षिक जीवन की मुख्य धुरी है। शिक्षा की त्रिमुखी प्रक्रिया में अध्यापक वह कड़ी है, जो सम्पूर्ण शैक्षिक प्रक्रिया को धरातल पर उतारता हैं। महान दार्शनिक एवं विचारक अरविंद घोष ने भी अध्यापक के बारे में कहा है कि- “अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के चतुरमाली होते हैं ,जो संस्कारों की जड़ों में अपने ज्ञान का पोषण देते है और अपने श्रम से उन्हें
महाप्राण शक्तियाँ बना देते हैं।” राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् भारत सरकार (2009) के अनुसार, अध्यापक शिक्षा एक निरंतर प्रक्रिया है जो प्रारंभिक प्रशिक्षण तक सीमित न होकर आजीवन अधिगम से संबंधित है।राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारत सरकार (2020) के अनुसार, एक प्रभावी अध्यापक वह होता है जो विद्यार्थियों की विविध आवश्यकताओं को समझे और उनके अनुरूप शिक्षण विधियों का प्रयोग करे। अध्यापक शिक्षा में यही दक्षता विकसित की जाती है।इस नीति के अनुसार, अध्यापक की सामाजिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठा में वृद्धि के लिए सशक्तिकरण, प्रशिक्षण एवं प्रोत्साहन की नीति अपनाई गयी। अध्यापक शिक्षा बहुआयामी, व्यावहारिक और विषय-आधारित है। अध्यापकों की नियुक्ति, मूल्यांकन और प्रोन्नति निष्पक्ष एवं पारदर्शी प्रक्रिया से है।

अध्यापकों में निष्पादन
शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता का निर्धारण उसमें सेवारत अध्यापकों की दक्षता, प्रतिबद्धता, व्यावसायिक उत्तरदायित्व और उनके निष्पादन क्षमता पर करता है। अध्यापकों में निष्पादन क्षमता उनके शिक्षण कौशल, कक्षा प्रबंधन, मूल्यांकन विधियां, विद्यार्थियों के साथ संवाद एवं नवाचारों को अपनाने की क्षमता पर आधारित होता है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (2016) के अनुसार, अध्यापकों के प्रभावी निष्पादन क्षमता के बिना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती है। अध्यापक ही कक्षा में ज्ञान का संचार कर सकते हैं और विद्यार्थियों को 21 वीं सदी के लिए आवश्यक कौशल प्रदान करते हैं। Mathis and Jackson (2005) के अनुसार,निष्पादन क्षमता मूलतः वह है जो कर्मचारी करता है या नहीं करता है। कार्य के निष्पादन क्षमता में कार्य प्रक्षेपण की मात्रा, गुणवत्ता, समयबद्धता, कार्यस्थल पर उपस्थिति एवं उसकी सहयोगात्मकता सम्मिलित है। Sawchuk(2015) के अनुसार, अध्यापक के निष्पादन क्षमता का मूल्यांकन एक औपचारिक प्रक्रिया को संदर्भित करता है जिसका उपयोग विद्यालय कक्षा में अध्यापकों के निष्पादन क्षमता और प्रभावशीलता की समीक्षा और मूल्यांकन करने के लिए किया जाता है। आदर्श रूप में इन मूल्यांकन से प्राप्त निष्कर्ष, अध्यापकों के व्यावसायिक विकास का मार्गदर्शन करने में सहायक है।

लिंग
प्रस्तुत अध्ययन में लिंग से अभिप्राय पुरुष और महिला से है ।

आत्म-प्रभावकारिता
अध्यापक आत्म-प्रभावकारिता से अभिप्राय उस विश्वास से है जो एक अध्यापक अपनी शैक्षिक क्षमताओं पर ‘विशेष रूप से कठिन परिस्थितियों में भी विद्यार्थियों के अधिगम और सकारात्मक व्यवहार परिवर्तन लाने की क्षमता’ पर करता है। Bandura (1997) Social Cognitive Theory के अनुसार, आत्म-प्रभावकारिता यह निर्धारित करती है कि व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए कितना परिश्रम करेगा और चुनौतियों के सामने कितना टिकेगा? Ross (1994) के अनुसार,अध्यापकों की आत्म-प्रभावकारिता वह अपेक्षा है जिसमें अध्यापक को यह विश्वास होता है कि वह अधिगम के प्रति कम प्रेरणा वाले विद्यार्थियों के अधिगम को भी प्रभावित कर सकता है। Hoy and Spero (2005) के अनुसार,अध्यापकों की आत्म-प्रभावकारिता एक प्रेरणात्मक संरचना है जो इस बात को प्रभावित करती है कि अध्यापक क्या निर्णय लेते हैं, कितना प्रयास करते हैं और कठिनाइयों का सामना करते समय कितना दृढ़ रहते हैं।

उद्देश्य

  1. माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन के आयामों पर लिंग के परिप्रेक्ष्य में मुख्य प्रभाव का अध्ययन करना।
  2. माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन के आयामों पर आत्म-प्रभावकारिता के परिप्रेक्ष्य में मुख्य प्रभाव का अध्ययन करना।
  3. माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन के आयामों पर लिंग और आत्म-प्रभावकारिता के अंतःक्रियात्मक प्रभाव का अध्ययन करना।

शोध परिकल्पनाएँ
H01: माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन के आयामों पर लिंग के सापेक्ष कोई सार्थक अंतर नहीं है।
H02: माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन के आयामों पर आत्म-प्रभावकारिता के सापेक्ष कोई सार्थक अंतर नहीं है।
H03: माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन के आयामों पर लिंग और आत्म-प्रभावकारिता के सापेक्ष कोई सार्थक अंतःक्रियात्मक प्रभाव नहीं है।

जनसंख्या
इस अनुसंधान में अध्ययन के लिए हिमाचल प्रदेश के चार जनपद सिरमौर, सोलन, बिलासपुर और कांगडा कें विभिन्न राजकीय विद्यालयों में कक्षा 6-10 में अध्यापनरत सत्र 2024-25 के समस्त अध्यापक इस अध्ययन की जनसंख्या हैं।

न्यादर्श
इस अनुसंधान में अध्ययन के लिए हिमाचल प्रदेश सम्पूर्ण जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने के लिए न्यादर्श के रूप में चार जनपद सिरमौर, सोलन, बिलासपुर और कांगडा के विभिन्न राजकीय विद्यालयों में कक्षा 6-10 में अध्यापनरत सत्र 2024-25 के समस्त अध्यापक में से 276 अध्यापकों को यादृच्छिक न्यादर्श विधि का प्रयोग कर न्यादर्श हेतु चुना गया है।
शोध विधि
इस अनुसंधान में अध्ययन के लिए वर्णानात्मक अनुसंधान विधि के अंतर्गत सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया है।
मापनी
अध्ययन में प्रदत्तां के संकलन हेतु मापनी के रूप में स्वनिर्मित अध्यापक निष्पादन मापनी और सूद एवं सेन (2017) द्वारा निर्मित अध्यापक आत्म-प्रभावकारिता मापनी का प्रयोग किया गया।
प्रदत्तों का विश्लेषण एवं व्याख्या माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन के आयामों पर लिंग और आत्म-प्रभावकारिता के प्रभावों का अध्ययन करने हेतु 2X3 एनोवा (ANOVA) का प्रयोग किया। जिसमें लिंग के दो प्रकार (पुरुष और महिला), आत्म-प्रभावकारिता के तीन स्तर (उच्च, मध्यम एवं निम्न) हैं। माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन आयामों के मध्यमान एवं संबंधित मानक विचलन तालिका-1 में प्रस्तुत हैं।

माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन आयामों के मध्यमान अंकों पर लिंग और आत्म-प्रभावकारिता के मुख्य एवं अंतःक्रियात्मक प्रभावों (Main and Interaction Effects) के लिए ‘F’ मानों की गणना की गई। परिणाम तालिका-2 में प्रदर्शित हैं।

(I) मुख्य प्रभाव (Main Effects)

लिंग (Gender) (A)

तालिका-2 से स्पष्ट होता है कि माध्यमिक अध्यापकों के निष्पादन आयामों में ’योजना एवं क्रियांवयन, शिक्षण दक्षता, कक्षा वातावरण और व्यावसायिक उत्तरदायित्व’पर लिंग (पुरुष और महिला) के मुख्य प्रभावों के लिए ‘F’ का मान क्रमशः 0.01, 0.79, 0.69 और 0.46 प्राप्त हुए, जो सार्थकता स्तर 0.05 के स्वातंत्र्य कोटि (df) 1/270 पर ‘F’ तालिका मान 3.88 से कम है। अतः माध्यमिक अध्यापकों के निष्पादन आयामों ’योजना एवं क्रियांवयन, शिक्षण दक्षता, कक्षा वातावरण और व्यावसायिक उत्तरदायित्व’पर लिंग का कोई महत्त्वपूर्ण प्रभाव नहीं है। इसलिए हम कह सकते हैं कि पुरुष व महिला माध्यमिक अध्यापकों में ’योजना एवं क्रियांवयन, शिक्षण दक्षता, कक्षा वातावरण और व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ पर एक समान हैं।

आत्म-प्रभावकारिता (Self-Efficacy) (B)

तालिका-2से स्पष्ट होता है कि माध्यमिक अध्यापकों के निष्पादन आयामों ’योजना एवं क्रियांवयन, शिक्षण दक्षता, कक्षा वातावरण और व्यावसायिक उत्तरदायित्व’पर आत्म-प्रभावकारिता के उच्च, मध्यम और निम्न स्तर के मुख्य प्रभावों के लिए ‘F’ के मान क्रमशः 16.12, 5.69, 17.70 और 22.69 प्राप्त हुए, जो सार्थकता स्तर 0.01 के स्वातंत्र्य कोटि (df) 2/270 पर F तालिका मान 4.67 से अधिक है। अतः माध्यमिक अध्यापकों के निष्पादन आयामों ’योजना एवं क्रियांवयन, शिक्षण दक्षता, कक्षा वातावरण और व्यावसायिक उत्तरदायित्व’पर आत्म-प्रभावकारिता के उच्च ए मध्यम और निम्न स्तर का सार्थक प्रभाव है। माध्यमिक अध्यापकों के निष्पादन आयामों पर आत्म-प्रभावकारिता के स्तरों के मध्य सार्थक अंतर ज्ञात करने हेतु Post Hoc प्रक्रिया के अंतर्गत t-test का प्रयोग किया गया। प्राप्त ज.मान तालिका-3 में प्रस्तुत है।

तालिका-3 से स्पष्ट होता है कि माध्यमिक अध्यापकों के निष्पादन आयाम ’योजना एवं क्रियांवयन’ पर उच्च व निम्न स्तर एवं मध्यम व निम्न स्तर के आत्म-प्रभावकारिता समूहों के मध्य में t-मान क्रमशः 4.15 एवं 5.07 सार्थकता स्तर 0.01 के स्वातंत्र्य कोटि (df) 182 पर ‘t’ तालिका मान 2.60 से अधिक है, अतः उच्च व निम्न स्तर एवं मध्यम व निम्न स्तर के आत्म-प्रभावकारितावाले माध्यमिक अध्यापकों की ’योजना एवं क्रियांवयन’ में सार्थक अंतर है। यद्यपि ’योजना एवं क्रियांवयन’ पर उच्च आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों का मध्यमान (43.34) है, जो कि निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों के मध्यमान (40.75) से अधिक है। इसलिए हम यह कह सकते हैं कि उच्च आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों की ’योजना एवं क्रियांवयन’ निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों से अच्छा है।इसके अतिरिक्त में ’योजना एवं क्रियांवयन’ पर मध्यम आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों का मध्यमान (43.68) है, जोकि निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों के मध्यमान (40.75) से अधिक है। इसलिए हम कह सकते हैं कि मध्यम आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों की ’योजना एवं क्रियांवयन’ निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों से अधिक प्रभावी है। माध्यमिक अध्यापकों में ‘योजना एवं क्रियांवयन’ पर उच्च, मध्यम और निम्न आत्म-प्रभावकारिता स्तरों के मध्यमानों के सार्थक अंतर को आरेख-1में प्रदर्शित किया गया है।

तालिका-3 से यह भी स्पष्ट होता है कि माध्यमिक अध्यापकों के निष्पादन आयाम ’शिक्षण दक्षता’ पर मध्यम व निम्न स्तर के आत्म-प्रभावकारिता समूहों में t-मान 4.22 सार्थकता स्तर 0.01 के स्वातंत्र्य कोटि (df) 182 पर t-तालिका मान 2.60 से अधिक है अतः मध्यम व निम्न स्तर की आत्म-प्रभावकारिता समूहों की शिक्षण दक्षता में मध्य सार्थक अंतर है। यद्यपि ‘शिक्षण दक्षता’ पर मध्यम आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों का मध्यमान (42.91) है, जो कि निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों के मध्यमान (39.96) से अधिक है। इसलिए हम यह कह सकते हैं कि मध्यम आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों की ’शिक्षण दक्षता’ निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों से अधिक प्रभावी है। माध्यमिक अध्यापकों में ’शिक्षण दक्षता’ पर मध्यम और निम्न आत्म-प्रभावकारिता स्तरों के मध्यमानों के सार्थक अंतर को आरेख-1में प्रदर्शित किया गया है।

तालिका-3 से स्पष्ट होता है कि माध्यमिक अध्यापकों के निष्पादन आयाम ’कक्षा वातावरण’ पर उच्च व निम्न स्तर एवं मध्यम व निम्न स्तर के आत्म-प्रभावकारिता समूहों के मध्य में t-मान क्रमशः 4.79 एवं 5.45 सार्थकता स्तर 0.01 के स्वातंत्र्य कोटि (df) 182 पर ‘t’ तालिका मान 2.60 से अधिक है अतः उच्च व निम्न स्तर एवं मध्यम व निम्न स्तर के आत्म-प्रभावकारितावाले माध्यमिक अध्यापकों की ’कक्षा वातावरण’ में सार्थक अंतर है। यद्यपि ’कक्षा वातावरण’ पर उच्च आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों का मध्यमान (45.22) है, जोकि निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों के मध्यमान (41.05) से अधिक है। इसलिए हम यह कह सकते हैं कि उच्च आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों का ’कक्षा वातावरण’ निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों से अधिकअनुकूल है। इसके अतिरिक्त ’कक्षा वातावरण’ पर मध्यम आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों का मध्यमान (44.28) है, जोकि निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों के मध्यमान (41.05) से अधिक है। इसलिए हम कह सकते हैं कि मध्यम आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों का’कक्षा वातावरण’ निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों से अधिक अनुकूल है। माध्यमिक अध्यापकों में’कक्षा वातावरण’ पर उच्च, मध्यम और निम्न आत्म-प्रभावकारिता स्तरों के मध्यमानों के सार्थक अंतर को आरेख-1में प्रदर्शित किया गया है।

तालिका-3 से स्पष्ट होता है कि माध्यमिक अध्यापकों के निष्पादन आयाम ’व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ पर उच्च व निम्न स्तर एवं मध्यम व निम्न स्तर के आत्म-प्रभावकारिता समूहों के मध्य में t-मान क्रमशः 5.54 एवं 5.45 सार्थकता स्तर 0.01 के स्वातंत्र्य कोटि (df) 182 पर ‘t’ तालिका मान 2.60 से अधिक है, अतः उच्च व निम्न स्तर एवं मध्यम व निम्न स्तर के आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों की ’व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ में सार्थक अंतर है। यद्यपि ’व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ पर उच्च आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों का मध्यमान (45.45) है, जो कि निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों के मध्यमान (41.16) से अधिक है। इसलिए हम यह कह सकते हैं कि उच्च आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापक, निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों से अधिक व्यावसायिक उत्तरदायी हैं।इसके अतिरिक्त ’व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ पर मध्यम आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों का मध्यमान (44.51) है, जो कि निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों के मध्यमान (41.16) से अधिक है। इसलिए कह सकते हैं कि मध्यम आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापक, निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों से अधिक व्यावसायिक उत्तरदायी है। माध्यमिक अध्यापकों में’व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ पर उच्च, मध्यम और निम्न आत्म-प्रभावकारिता स्तरों के मध्यमानों के सार्थक अंतर को आरेख-1में प्रदर्शित किया गया है।

(II) अंतःक्रियात्मक प्रभाव (Interaction Effect)

लिंग X आत्म-प्रभावकारिता (AXB) अंतःक्रियात्मक प्रभाव

तालिका-2 से स्पष्ट है कि माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन आयामों ’योजना एवं क्रियांवयन, शिक्षण दक्षता, कक्षा वातावरण और व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ पर लिंग और आत्म-प्रभावकारिता का अंतःक्रियात्मक प्रभाव केे लिए ‘f’ का मान का मान क्रमशः 2.68,2.24, 2.60 और 2.21है, जो सार्थकता स्तर 0.05 के स्वातंत्र्य कोटि (df) 2/270 पर ‘f’ तालिका मान 3.03 से कम है। अतः माध्यमिक अध्यापकों के निष्पादन आयामों ’योजना एवं क्रियांवयन, शिक्षण दक्षता, कक्षा वातावरण और व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ पर लिंग और आत्म-प्रभावकारिताका अंतःक्रियात्मक प्रभाव नहीं है।

निष्कर्ष

इस शोध पत्र में माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन के आयामों पर लिंग और आत्म-प्रभावकारिता के प्रभावों का अध्ययन किया गया है। इस शोध अध्ययन में पाया गया है कि पुरुष व महिला माध्यमिक अध्यापक में निष्पादन आयामों ’योजना एवं क्रियांवयन, शिक्षण दक्षता, कक्षा वातावरण और व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ में एक समानता है। माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन आयामों पर आत्म-प्रभावकारिता के उच्च, मध्यम और निम्न स्तर का सार्थक महत्त्वपूर्ण प्रभाव है।
उच्च आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन आयामों ’योजना एवं क्रियांवयन’ ’कक्षा वातावरण’ ’व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों से अधिक है। मध्यम आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन आयामों ’योजना एवं क्रियांवयन’ ’शिक्षण दक्षता’ ’कक्षा वातावरण’ ’व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ निम्न आत्म-प्रभावकारिता वाले माध्यमिक अध्यापकों से अधिक है।
पुरुष व महिला माध्यमिक अध्यापकों के निष्पादन आयामों ’योजना एवं क्रियांवयन, शिक्षण दक्षता, कक्षा वातावरण और व्यावसायिक उत्तरदायित्व’ पर आत्म-प्रभावकारिताका अंतःक्रियात्मक प्रभाव नहीं है।

शैक्षिक निहितार्थ
इस अध्ययन के परिणाम माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन और आत्म-प्रभावकारिता से संबंधित है जिनके आधार पर वर्तमान माध्यमिक अध्यापकों को निम्न प्रकार से प्रभावशाली बनाया जा सकता है-

नीति-नियंताओं के लिए- इस अध्ययन के परिणामों के आधार पर नीति-नियंताओं को शिक्षा के क्षेत्र में प्रभावी नीतियाँ बनाने में सहायता मिलेगी, जिसके द्वारा शोध एवं नवाचारों को प्रोत्साहित किया जा सकेगा। देश एवं समाज की आवश्यकताओं को पूर्ण करने वाले पाठ्यक्रम का विकास हो सकेगा, गुणवान अध्यापकों का चयन हो सकेगा, शैक्षिक संस्थाओं को आवश्यक संसाधनयुक्त बनाया जा सकेगा। इस प्रकार माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन और आत्म-प्रभावकारिता को प्रभावपूर्ण बनाया जा सकता है।
शैक्षणिक प्रशासकों के लिए- इस अध्ययन के परिणामों के आधार पर शैक्षणिक प्रशासक, माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन और आत्म-प्रभावकारिता को प्रभावी बनाने के लिए चिकित्सीय अवकाश, कार्यशाला व संगोष्ठियों के लिए कर्तव्यनिष्ठ अवकाश, भौतिक संसाधनों की पूर्ति एवं अनुकूल कार्य संस्कृति के विकास पर ध्यान देंगे, जिससे शैक्षणिक संस्थानों में अनुकूल संगठनात्मक वातावरण का विकास हो सकेगा।
शैक्षिक प्रबंधकों के लिए- इस अध्ययन के परिणामों के आधार पर शैक्षिक प्रबंधकों को इस बात के लिए प्रोत्साहित जा सकेगा कि वे माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन और आत्म-प्रभावकारिता को प्रभावित करने वाले कारकों, जैसे-वेतन, अवकाश स्वीकृति, अत्यधिक कार्य एवं अन्य शैक्षणिक आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान देंगे। शैक्षिक प्रबंधक शिक्षण संस्थाओं के वातावरण को अनुकूलित बनाने के लिए उपयुक्त संसाधनों को उपलब्ध करायेंगे।
माध्यमिक अध्यापकों के लिए- इस अध्ययन के परिणामों के आधार पर माध्यमिक अध्यापकों में निष्पादन और आत्म-प्रभावकारिता के मध्य महत्त्वपूर्ण सार्थक प्रभाव पाया गया है। अतः इस परिणाम के आधार पर अध्यापक अपने निष्पादन और आत्म-प्रभावकारिता में वृद्धि करके शैक्षणिक कार्यों को प्रभावशाली बना सकेंगे।
शोधार्थियों के लिए- इस अध्ययन के परिणामों के आधार पर शोधार्थियों को इस क्षेत्र मेें शोध कार्य करने के लिए प्रेरणा मिलेगी जिससे वे परिवर्तित जनसंख्या एवं न्यादर्श पर अनुसंधान करने के लिए प्रोत्साहित होंगे।

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