| सुश्री रेखा कुमारी शोधार्थी कला, शिक्षा व सामाजिक विज्ञान संकाय जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर (राज) अतिथि सहायक आचार्य अर्थशास्त्र विभाग राजकीय महाविद्यालय पिड़ावा झालावाड (राज) |
Abstract
प्रस्तुत शोध पत्र में अद्भुत बहुमुखी प्रतिभा एवं विद्या की धनी देश की प्रथम शिक्षित महान् महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले के लैंगिक समानता में योगदान के विभिन्न आयामों का सतत् विकास हेतु विस्तार से विश्लेषण कर ध्यान केन्द्रित किया गया हैं। तथा साथ ही लैंगिक समानता क्या है? आखिर क्यों यह किसी भी समाज और राष्ट्र के लिए एक आवश्यक तत्व बन गया है, बदलते समाज में यह क्यों प्रासंगिक है? लैंगिक समानता का अर्थ यह नही कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक लिंग का हो, अपितु लैंगिक समानता का सीधा सा अर्थ समाज में महिला तथा पुरुष के समान अधिकार, दायित्व और रोजगार के अवसरों के परिप्रेक्ष्य में है। साथ ही आज महिला सशक्तिकरण व समाज सुधार का अभियान ओर अधिक प्रासंगिक हो गया हैं। क्योंकि हम एक नए भारत – एक भारत, श्रेष्ठ भारत का निर्माण कर रहें हैं, जिसे सावित्रीबाई फुले के दृष्टिकोण को लागु किए बिना पूरा नहीं किया जा सकता हैं। उनके महिला शिक्षा के अभियान को आगे बढ़ाते हुए भारतीय संविधान में भी समानता, न्याय, बंधुत्व और स्वतंत्रता को परिलक्षित किया गया हैं। ताकि हमारे देश का ‘ एक विकसित भारत, एक श्रेष्ठ भारत, एक नव भारत का सपना मूर्त रूप ले सकें। तथा साथ ही हमारे देश का सतत्, निरन्तर एवं सर्वागीण विकास संभव हो सकें।
