सावित्रीबाई फुले से महात्मा गांधी तक : सतत् विकास हेतु लैंगिक समानता में योगदान का विश्लेषण

सुश्री रेखा कुमारी
शोधार्थी
कला, शिक्षा व सामाजिक विज्ञान संकाय
जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर (राज)
अतिथि सहायक आचार्य
अर्थशास्त्र विभाग
राजकीय महाविद्यालय पिड़ावा झालावाड (राज)

Abstract

प्रस्तुत शोध पत्र में देश के महान्  राष्ट्रनिर्माताओं के योगदान के अंतर्गत महान् समाजसुधारको  सावित्रीबाई फुले, सहित ज्योतिबा फुले, संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी इत्यादि के लैंगिक समानता में योगदान के विभिन्न आयामों का सतत् विकास हेतु विस्तार से विश्लेषण कर ध्यान केन्द्रित किया गया हैं। तथा इनके द्वारा किए गए प्रयासों व योगदान से प्रेरणा लेकर आने वाले समय में हमारे देश के सतत् विकास व सर्वांगीण विकास हेतु वर्तमान समय में प्रासंगिकता का तुलनात्मक अध्ययन कर सकेंगे और साथ ही  लैंगिक समानता का अर्थ यह नहीं कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक लिंग का हो, अपितु लैंगिक समानता का सीधा सा अर्थ समाज में महिला तथा पुरुष के समान अधिकार, दायित्व और रोजगार के अवसरों के प्ररिप्रेक्ष्य में हैं। जिस प्रकार तराजू में दोनों तरफ बराबर भार रखने पर वह संतुलित होता हैं। ठीक उसी तरह से किसी भी समाज व राष्ट्र में संतुलन बनाने के लिए जरूरी हैं कि वहां पुरुषों तथा स्त्रियों के मध्य लैंगिक समानता स्थापित की जानी चाहिए। आज महिलाएं विज्ञान, राजनीति, व्यापार और खेल जैसे क्षेत्रों में पुरुषों के बराबर अपनी प्रतिमा का परचम लहरा रही हैं | आज जरूरत है, हर व्यक्ति को यह समझने की कि लैंगिक समानता केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि समाज की उन्नति और देश के विकास का मार्ग हैं । ताकि हमारे देश का ‘ एक विकसित भारत, एक श्रेष्ठ भारत, एक नव भारत का सपना मूर्त रूप ले सकें। तथा साथ ही हमारे देश का सतत्, निरन्तर एवं सर्वागीण विकास संभव हो सकें।

Keywords: सावित्रीबाई फुले की जीवनी, सतत् विकास की अवधारणा,  लैंगिक समानता, सावित्रीबाई सहित ज्योतिराव फुले, डॉ.भीमराव अंबेडकर, महात्मा गांधी जी का योगदान, संवैधानिक प्रावधान, अनुच्छेद, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक समानता ।

“यंत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ।

यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वस्तत्राफला: क्रिया” ।।

प्रस्तावना

अर्थात् जहां नारी का सम्मान होता है, वहां देवता का वास होता हैं।, जहां नारी का सम्मान नहीं होता वहां सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, और वह देश और समाज तरक्की नहीं करता। इसी श्लोक से प्रेरणा पाकर देश की प्रथम शिक्षित महान् महिला सावित्रीबाई फूले ने अपने पति महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर अस्पृश्यता, आधिपत्य, जातिवादी व्यवस्था, समाज-विरोधी व यथास्थितिवादी ताकतो के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़कर महिलाओं की शिक्षा के लिए क्रांतिकारी अभियान शुरू किया। जिनकी वजह से ही आज के समाज में महिलाओं को भी शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर प्राप्त हो पाये हैं। और देश के विकास में महिलाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित हो पायी हैं, वरन् प्राचीनकाल में महिलाओं को इतनी सम्मानजनक स्थिति प्राप्त नहीं थी। जो आज के युग में महिलाओं को प्राप्त हैं। तथा सावित्रीबाई फूले  के प्रयासों से ही आज महिलाओं को चुल्हा चौका से आगे निकल कर पढ़ने का अवसर मिला हैं। उन्हें  आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता हैं।

सावित्रीबाई फुले ने छूआ-छूत, अस्पृश्यता के कारण, सामाजिक रूप से पिछड़ी, वंचित महिलाओं का जीवन स्तर ऊपर उठाने के उद्देश्य से शिक्षा की अलख जगाई। उनके महिला शिक्षा के अभियान को आगे बढ़ाते हुए भारतीय संविधान में भी समानता, न्याय, बंधुत्व और स्वतंत्रता को परिलक्षित किया गया हैं।  डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचार व सिद्धांत भारतीय राजनीति के लिए हमेशा से प्रांसगिक रहे हैं, वे एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था चाहते थें। जिसमें राज्य सभी को समान राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक न्याय एवं अवसर दें। और धर्म,जाति, रंग, तथा लिंग इत्यादि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएं। गांधीजी के अनुसार पुरुष और स्त्री मूलतः एक हैं, इसलिए उनकी समस्याएं भी एक जैसी होनी चाहिए। दोनों की आस्था एक हैं, दोनों एक जैसा जीवन जीते हैं और दोनों की भावनाएं भी एक हैं, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। आज महिलाएं विज्ञान, राजनीति, व्यापार और खेल जैसे क्षेत्रों में पुरुषों के बराबर अपनी प्रतिमा का परचम लहरा रही हैं | आज जरूरत है, हर व्यक्ति को यह समझने की कि लैंगिक समानता केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि समाज की उन्नति और देश के विकास का मार्ग हैं ताकि हमारे देश का सतत् , निरंतर एवं सर्वागीण विकास संभव हो सकें |

शोध के उद्देश्य:-

प्रस्तुत शोध पत्र का अध्ययन करने के पश्चात आप इस योग्य हो सकेंगे कि आप :-

  1. प्रस्तुत शोध अध्ययन का सैध्दांतिक एवं व्यवहारिक रूप समझ सकेंगे ।
  2. प्रस्तुत शोध अध्ययन का वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन कर सकेंगे।
  3. प्रस्तुत शोध अध्ययन का वर्तमान समय की प्रासंगिकता के अनुसार तुलनात्मक अध्ययन कर सकेंगे।
  • प्रस्तुत शोध अध्ययन से प्रेरणा लेकर आने वाले समय में हमारे देश को ओर भी ज्यादा सशक्त, सुदृढ़ व विकसित बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकेंगे ।

शोध सहित्य की समीक्षा

प्रस्तुत शोध पत्र में देश के महान् राष्ट्रनिर्माताओं के सतत् विकास हेतु लैंगिक समानता में योगदान के प्रमुख विषयों और अवधारणाओं की पड़ताल की गई हैं, जिसमें बताया गया हैं कि सतत् विकास, वृद्धि और मानव विकास के लिए एक दृष्टिकोण है। जिसका उद्देश्य भविष्य की  पीढ़ियों की अपनी जरूरतों को पूरा करने की क्षमता से समझोता किए बिना वतर्मान की जरूरतों को पूरा करना हैं । तथा लैंगिक समानता क्या हैं? आखिर क्यों यह किसी भी समाज और राष्ट्र के लिए एक आवश्यक तत्व बन गया हैं? क्या बदलते समाज में यह प्रासंगिक हैं? लैंगिक समानता का अर्थ यह नहीं कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक लिंग का हो, अपितु लैंगिक समानता का सीधा सा अर्थ समाज में महिला तथा पुरुष के समान अधिकार, दायित्व और रोजगार के अवसरों के प्ररिप्रेक्ष्य में हैं। सावित्रीबाई फुले देश की प्रथम महिला शिक्षिका थी। उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों की लड़कियों, विशेष रूप से पिछड़े, अनुसूचित जातियों और जनजातियों की लड़कियों को शिक्षा की चोखट तक पहुंचाया। सावित्रीबाई फुले ने छूआ-छूत, अस्पृश्यता के कारण, सामाजिक रूप से पिछड़ी, वंचित महिलाओं का जीवन स्तर ऊपर उठाने के उद्देश्य से शिक्षा की अलख जगाई। उनके महिला शिक्षा के अभियान को आगे बढ़ाते हुए भारतीय संविधान में भी समानता, न्याय, बंधुत्व और स्वतंत्रता को परिलक्षित किया गया हैं।  डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचार व सिद्धांत भारतीय राजनीति के लिए हमेशा से प्रांसगिक रहे हैं, वे एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था चाहते थें। जिसमें राज्य सभी को समान राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक न्याय एवं अवसर दें। और धर्म,जाति, रंग, तथा लिंग इत्यादि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएं। गांधीजी के अनुसार पुरुष और स्त्री मूलतः एक हैं, इसलिए उनकी समस्याएं भी एक जैसी होनी चाहिए। दोनों की आस्था एक हैं, दोनों एक जैसा जीवन जीते हैं और दोनों की भावनाएं भी एक हैं, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। आज महिलाएं विज्ञान, राजनीति, व्यापार और खेल जैसे क्षेत्रों में पुरुषों के बराबर अपनी प्रतिमा का परचम लहरा रही हैं | आज जरूरत है, हर व्यक्ति को यह समझने की कि लैंगिक समानता केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि समाज की उन्नति और देश के विकास का मार्ग हैं ताकि हमारे देश का सतत् ,निरंतर एवं सर्वागीण विकास संभव हो सकें |

जीवन परिचय

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। उनके पिता का नाम खंदोजी नैवेसे और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1841 में ज्योतिराव फुले से हुआ था। सावित्रीबाई फुले .भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थी। महात्मा ज्योतिराव को महाराष्ट्र और भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन में एक सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में माना जाता हैं। उनको महिलाओं और दलित जातियों को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए जाना जाता हैं। ज्योतिराव फुले, जो बाद में ज्योतिबा फुले के नाम से जाने गए। सावित्रीबाई फुले के संरक्षक, गुरु और समर्थक थे। सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया। जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाया, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति, सुरक्षा और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना इत्यादि। वे एक कवियत्री भी थी। उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता हैं।

सतत् विकास की अवधारणा-

सतत् विकास वृद्धि और मानव विकास के लिए एक दृष्टिकोण है | जिसका उद्देश्य भविष्य की पीढीयों की अपनी जरूरतों कों पूरा करने की क्षमता से समझौता किए बिना वर्तमान की जरूरतों कों पूरा करना हैं | इसका उद्देश्य एक ऐसा समाज बनाना हैं जहां रहने की स्थितियां और संसाधन ग्रह की अखंडता को कम किए बिना मानवीय आवश्यकताओं कों पूरा करते हैं | सतत् विकास का उद्देश्य अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और समाज की जरूरतों को संतुलित करना हैं | 1987 में ब्रुन्डलैंड रिपोर्ट ने सतत् विकास की अवधारणा कों बेहत्तर ढ़ंग से जानने में मदद की |

सतत् विकास स्थिरता के विचार के साथ ओवरलेप करता हैं जो एक मानव अवधारणा हैं | यूनेस्कों ने दो अवधारणाओं के बीच एक अंतर इस प्रकार तैयार किया “स्थिरता को अक्सर एक दीर्घकालिक लक्ष्य ( यानी अधिक टिकाऊ दुनिया ) के रूप में माना जाता हैं, जबकि सतत् विकास इसे प्राप्त करने के लिए कई प्रक्रियाओं और मार्गो को संदर्भित करता हैं |” रियोडिजेनेरियो में 1992 के पृथ्वी शिखर सम्मेलन से शुरू हुई रियो प्रकिया ने सतत् विकास की अवधारणा कों अन्तर्राष्ट्रीय एजेंडे पर रखा हैं | सतत् विकास, सतत् विकास लक्ष्यों की मूलभूत अवधारणा हैं | वर्ष 2030 के लिए इन वैश्विक लक्ष्यों कों 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाया गया था | वे वैश्विक चुनौतियो को सम्बोधित करते हैं, उदाहरण के लिए गरीबी, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता, हानि और शांति इत्यादि | सतत् विकास की अवधारणा के साथ कुछ समस्याएं हैं | कुछ विद्वानों का कहना हैं कि यह एक विरोधाभास हैं क्योंकि उनके अनुसार, विकास स्वाभाविक रूप से अस्थिर हैं |

लैंगिक समानता की अवधारणा:

“हर बच्चा अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने का

हकदार हैं, लेकिन उनके जीवन में लैंगिक

असमानता और उनके लिए देखभाल करने

वालों के जीवन में इस वास्तविकता में बांधा हैं”।

प्रत्येक बच्चे का अधिकार हैं कि उसकी क्षमता के अनुसार उसे विकास का पूरा मौका मिले। लेकिन लैंगिक असमानता की कुरीति की वजह से वह ठीक से फल-फूल नहीं पाते है, साथ ही भारत में लड़कियों और लड़कों के बीच न केवल उनके घरों में और समुदायों में बल्कि हर जगह लिंग असमानता दिखाई देती हैं। पाठ्य-पुस्तकों,फिल्मों, मिडियां इत्यादि सभी जगह उनके साथ लिंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। भारत में लैंगिक असमानता के कारण अवसरों में भी असमानता उत्पन्न करता है जिसका प्रभाव दोनों लिंगों पर पड़ता है। लेकिन आंकड़ों के आधार पर देखें तो इस भेदभाव से सबसे अधिक लड़कियां अच्छे अवसरों से वंचित रह जाती हैं।

लैंगिक समानता क्या हैं? आखिर क्यों यह किसी भी समाज और राष्ट्र के लिए एक आवश्यक तत्व बन गया हैं? क्या बदलते समाज में यह प्रासंगिक हैं? लैंगिक समानता का अर्थ यह नहीं कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक लिंग का हो, अपितु लैंगिक समानता का सीधा सा अर्थ समाज में महिला तथा पुरुष के समान अधिकार, दायित्व और रोजगार के अवसरों के प्ररिप्रेक्ष्य में हैं। जिस प्रकार तराजू में दोनों तरफ बराबर भार रखने पर वह संतुलित होता हैं। ठीक उसी तरह से किसी भी समाज व राष्ट्र में संतुलन बनाने के लिए जरूरी हैं कि वहां पुरुषों तथा स्त्रियों के मध्य लैंगिक समानता स्थापित की जानी चाहिए। आज आधुनिकता की जीवनी शैली को अपनाने के बावजूद भारतीय समाज लैंगिक समानता के मामले में इतना पिछड़ा हुआ है।सही मायनों में देखा जाएं तो लैंगिक समानता का न होना ही समाज में असंतुलन और अपराध को जन्म देता हैं। यह बहुत जरूरी हैं कि हर क्षेत्र में चाहें वह शिक्षा हो, राजनीति हो, रोजगार हों, अवसर या अधिकार हों, हर क्षेत्र में लैंगिक समानता को ध्यान में रखना चाहिए। जिस तरह एक सिक्के के दोनों पहलुओं की समानता हैं, साइकिल, बाईक, के दोनों पहिये की समानता हैं और हमारे शरीर के अंगों, दोनों आंखों, हाथों, पेरो की समानता हैं, ठीक उसी तरह समाज के लिए भी दोनों पहलुओं स्त्री तथा पुरुष के मध्य भी लैंगिक समानता होनी चाहिए।

सतत् विकास हेतु लैंगिक समानता में महान् समाजसुधारको का योगदान :- देश के सतत् व सर्वांगीण विकास में लैंगिक समानता स्थापित करने में अनेकों महान् महिलाओं व पुरुषों का अग्रणी योगदान रहा हैं। लेकिन यहां संक्षिप्त में देश के तीन महान् राष्ट्रनिर्माताओं क्रमश:1. सावित्रीबाई फुले 2. डॉ.भीमराव अम्बेडकर जी 3.महात्मा गांधी जी द्वारा किए गए सफल प्रयासों व योगदानो का उल्लेख किया जा रहा हैं जो संक्षेप में निम्न प्रकार हैं :-

[1.] सावित्रीबाई फुले का योगदान:- सावित्रीबाई फुले देश की प्रथम महिला शिक्षिका थी। उन्होंने समाज के कमजोर .वर्गों की लड़कियों, विशेष रूप से पिछड़े, अनुसूचित जातियों और जनजातियों की लड़कियों को शिक्षा की चोखट तक पहुंचाया। उनके लिए स्कूल खोले और ऐसे समय में लाखों लोगों के जीवन में शिक्षा के रूप में आशा की किरण जगाई जब स्कूलों में जाना तो दूर की बात थी, जबकि कोसों दूर तक स्कूल ही नहीं थे। वास्तव में यह भारतीय समाज में महिलाओं के समग्र सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। सावित्रीबाई फुले, जो नारी शक्ति की प्रतीक हैं और नारी सशक्तिकरण का विषय अब केन्द्र और राज्य सरकारों का मुख्य केंद्र बन गया हैं। इसका श्रेय भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले को जाता हैं। आज महिला सशक्तिकरण व समाज सुधार का अभियान और अधिक प्रासंगिक हो गया हैं क्योंकि हम एक नए भारत- “एक भारत, श्रेष्ठ भारत का निर्माण कर रहे हैं, जिसे सावित्रीबाई फुले के दृष्टिकोण को लागू किए बिना पूरा नहीं किया जा सकता हैं। गरीबों में सबसे गरीब लोगों की सेवा करने की उनकी प्रतिबद्धता थी। सावित्रीबाई फुले ने छूआ-छूत, अस्पृश्यता के कारण, सामाजिक रूप से पिछड़ी, वंचित महिलाओं का जीवन स्तर ऊपर उठाने के उद्देश्य से शिक्षा की अलख जगाई। उनके महिला शिक्षा के अभियान को आगे बढ़ाते हुए भारतीय संविधान में भी समानता, न्याय, बंधुत्व और स्वतंत्रता को परिलक्षित किया गया हैं।

[2.] डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी का योगदान:- डॉ. भीमराव अम्बेडकर को बाबासाहेब, भारतीय संविधान निर्माता, चिंतक, समाजसुधारक, भारत रत्न इत्यादि नामों से जाना जाता हैं।इनका जन्म 14 अप्रैल 1891 मध्यप्रदेश के महू जिले में हुआ था। उन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक बूराइयो जैसे- छुआछूत और जातिवाद के खिलाफ संघर्ष में लगा दिया।इस दौरान बाबासाहेब गरीबों, दलितों और शोषितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे हैं। डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचार व सिद्धांत भारतीय राजनीति के लिए हमेशा से प्रांसगिक रहे हैं, वे एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था चाहते थें। जिसमें राज्य सभी को समान राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक न्याय एवं अवसर दे | धर्म,जाति, रंग, तथा लिंग इत्यादि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएं।

वे कहते थें कि जब तक आर्थिक और सामाजिक विषमता समाप्त नहीं होगी, तब तक जनतंत्र की स्थापना अपने असली रूप को नहीं पा सकेंगी। जब तक सामाजिक जनतंत्र स्थापित नहीं होता हैं तब तक सामाजिक चेतना का विकास संभव नहीं हो पाता हैं। उनकी जनतांत्रिक व्यवस्था की कल्पना में ‘नैतिकता’ और ‘सामाजिकता’ दो मुख्य मूल्य रहें हैं। जिनकी प्रासंगिकता वर्तमान समय में काफी ज्यादा हैं। उन्होंने कहा था कि- “मैं ऐसे धर्म को मानता हूं, जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाएं।” अतः डॉ.भीमराव जी को हमारे देश के एक महान् व्यक्तित्व और नायक के रूप में माना जाता हैं। तथा वे लोगों के प्रेरणास्रोत हैं। उनके भारतीय संविधान में दिए गए योगदान के कारण उन्हें ‘आधुनिक मनु’ होने का गौरव प्राप्त हैं। संविधान में निहित सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर ही नहीं अपितु मौलिक अधिकारों, धर्मनिरपेक्षता, राज्य, केन्द्र संबंधी शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना आदि विभिन्न व्यवस्थाओं के निर्माण में अम्बेडकर के व्यक्तित्व का प्रभाव दिखता हैं। भारत रत्न से अलंकृत डॉ. भीमराव अम्बेडकर का अथक योगदान कभी भी भुलाया नहीं जा सकता, धन्य हैं वह भारत भूमि जिसने ऐसे महान् सपूत को जन्म दिया।

[3.] राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का योगदान:- महात्मा गांधी जी को भारत के राष्ट्रपिता के नाम से संबोधित किया जाता हैं। उनका जन्म 2अक्टूम्बर 1869 को गुजरात में पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ। वे आधुनिक भारत के महान् समाज सुधारक एवं नैतिक दार्शनिक थे। दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी ने रंगभेद कि नीति के खिलाफ काफी संघर्ष किया जिससे उनकी प्रसिद्धि न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी रहीं हैं। इस प्रकार गांधी जी का योगदान भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में काफी महत्वपूर्ण रहा। महात्मा गांधी के विचार अनेकों पुस्तकों, लेखों में स्पष्ट दिखाई देते हैं। अपनी ‘आत्मकथा’ “सत्य के साथ मेरे प्रयोग”(My Experiment with Truth) के अन्तर्गत उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को व्यक्त किया हैं।

अतः भारतीय जीवनीशैली एवं चिन्तन में गांधी जी के कई महत्वपूर्ण योगदान रहें हैं। महिला अधिकारों के विषय में उनके विचार एवं योगदान- इनमें से एक हैं। गांधी जी के सामाजिक एवं राजनीतिक चिंतन के अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता हैं कि गांधी जी एक नारीवादी विचारक थे, जिन्होने पितृसत्तात्मक मूल्यों के आधार पर लैंगिक समानता के मुद्दों का निर्माण किया और उन्हें संबोधित भी किया। उनके अनुसार-‘ रोजमर्रा की जिंदगी में गांधीजी ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के चित्रण की अपेक्षा सीता- द्रोपदी के चित्रण पर ज्यादा बल दिया हैं। महिलाओं की व्यक्तिगत शक्ति के बजाय उनके नैतिक एवं आध्यात्मिक शक्ति में गांधी की अपार आस्था रही हैं। गांधीजी महिलाओं को एक ऐसी नैतिक शक्ति के रूप में देखना चाहते थें। जिनके पास अपार नारीवादी साहस हो। गांधीजी के अनुसार पुरुष और स्त्री मूलतः एक हैं, इसलिए उनकी समस्याएं भी एक जैसी होनी चाहिए। दोनों की आस्था एक हैं, दोनों एक जैसा जीवन जीते हैं और दोनों की भावनाएं भी एक हैं, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। महिलाओं के प्रति स्मृतिग्रन्थों के दृष्टिकोण पर टिप्पणी करते हुए गांधीजी ने कहा है कि निर्दयी परंपराओं को धार्मिक स्वीकृति देना धर्म के खिलाफ हैं। “गांधीजी के व्यक्तिगत एवं सामाजिक अनुभवों ने उन्हें यह मानने पर मजबूर कर दिया कि पुरुष ने हमेशा महिला को अपनी कठपुतली के रूप में इस्तेमाल किया हैं।” अतः .

गांधीजी ऐसे समाज के हिमायती थे। जो शोषण मुक्त हो और जहां सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और लैंगिक समानता हो। तथा गांधीजी ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए जो प्रयास किए थे। उनका महत्व कभी भी कम नहीं हो सकता। उनके द्वारा किए गए कार्यों व प्रयासों ने ही आज भारत में महिलाओं को एक नई दिशा दिखाईं। हमें उसी दिशा में चलकर, उनका अनुसरण करते हुए, बदलते समय में उनके विचारों को नए प्रकाश में देखना और समझना होगा। जिससे कि हमारा देश सतत् विकास में सफल हो सकें।

संवैधानिक प्रावधान:- भारतीय संविधान समानता के सिद्धान्त (संविधान की प्रस्तावना और भाग- III में समानता का सिद्धांत) की बात करता हैं। जिसके आधार पर महिलाओं को लिंग के आधार पर होने वाले किसी भी भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा हासिल हैं। इस प्रकार संविधान में वर्णित सभी अधिकार और स्वतंत्रताएं जितनी पुरुषों पर लागू होती हैं, उतनी ही महिलाओं पर भी लागू होती हैं। भारतीय संविधान यह सुनिश्चित करता हैं कि महिला एवं पुरुष दोनों के साथ समान बर्ताव किया जाए। अनुच्छेद 14 :- “राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता व कानून के तहत् समान संरक्षण से वंचित नहीं कर सकता।”

अनुच्छेद 15(1): – “कहता है कि राज्य को किसी भी नागरिक के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म के स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए।”

अनुच्छेद 16(1) एवं (2):- “सामान्य तौर पर भेदभाव को रोकता हैं और व्यवसाय में तथा राज्य के अधीन काम करने वाले लोगों के बीच लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकता हैं।” इत्यादि अनेक संवैधानिक प्रावधान भारतीय संविधान में लैंगिक समानता तथा समान अधिकारों से संबंधित हैं। जिनका पालन कर हम देश के सतत् व सर्वांगीण विकास में अपनी अहम् भूमिका अदा कर सकते हैं।

शोध परिकल्पना :- प्रस्तुत शोध पत्र के अध्ययन हेतु कई परिकल्पनाएं परिलक्षित हैं जिनमें से संक्षिप्त क्रमश निम्न हैं:-

1.  सावित्रीबाई फुले, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, महात्मा गांधी जी ने लैंगिक समानता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं।

2. सतत् विकास हेतु लैंगिक समानता में देश के राष्ट्रनिर्माताओं का योगदान वतर्मान समय में प्रासंगिक एवं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

3. देश के विकास में देश के राष्ट्रनिर्माताओं के योगदान का अद्भूत, अस्मरणीय, चिरस्थाई, एवं सकारात्मक प्रभाव दृष्टिगत होता हैं।

शोध की विधि एवं आंकड़ों का संग्रह :- प्रस्तुत शोध पत्र में गुणात्मक एवं ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति का उपयोग किया गया हैं। जिसमें प्राथमिक और द्वितीयक स्त्रोतों का महत्वपूर्ण विश्लेषण शामिल हैं। प्राथमिक स्त्रोतों में  देश के राष्ट्रनिर्माताओं के स्वयं के लेख, पत्र और भाषण इत्यादि शामिल हैं। जबकि द्वितीयक स्त्रोतों में लेखकों द्वारा सतत् विकास हेतु लैंगिक समानता में देश के राष्ट्रनिर्माताओं के योगदान और महत्वपूर्ण कार्यों पर आधारित विद्वतापूर्ण लेखों, पुस्तकों, शोध पत्रों, समाचार पत्रों, पत्रिकाओ, फोटो और इंटरनेट वेबसाइटों इत्यादि के माध्यमों से प्राप्त प्रासंगिक साहित्य शामिल हैं।

निष्कर्ष एवं सुझाव :- उपरोक्त वर्णित विवरणों से स्पष्ट है कि जिस प्रकार हमारे देश के विकास में उपरोक्त वर्णित राष्ट्र के महान्  राष्ट्रनिर्माताओं ने अपने प्रयासों, आदर्शों, सिद्धांतों, योजनाबद्ध तरीकों से देश के विकास में अपना अमूल्य योगदान दिया हैं उसी तरह हम सब भी मिलकर सरकार द्वारा चलायी जा रही हजारों अनेकों नीतियों, समितियों, आयोगों, योजनाओं एवं कार्यक्रमों जैसे:-1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति, राष्टीय महिला सशक्तिकरण नीति (2011), विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (1948-49) राष्टीय स्त्री शिक्षा समिति (1958), , महिला समाख्या, , बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना, सर्वशिक्षा अभियान, जेंडर बजटिंग पहल, उड़ान योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, विधवा पेंशन योजना, सामाजिक एवं आर्थिक विकास कल्याण योजनाएं इत्यादि में अपना योगदान देकर इस समाज में फैली हुई अनेकों सामाजिक कुरीतियो जैस – लैंगिक असमानता,, दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, महिलाओं सहित घटित अनेकों अकृत्य घटनाओं, शोषणो इत्यादि को समाप्त कर समाज के हर एक वर्ग को जागरूक कर उन्हें पहले से भी ज्यादा जागरूक ओर सतर्क करने की तथा साथ ही अभी भी सरकार द्वारा सतत् विकास हेतु लैंगिक समानता के स्तर को ऊंचा उठाने हेतु कई योजनाएं लागू की जा रही है किन्तु फिर भी भारत इस मामले में पिछड़ा हुआ हैं। अब आवश्यकता है समाज के बुनियादी ढांचे को बदलकर दकियानूसी सोच को खत्म करने की। ताकि महिलाओं को भी पुरुषों के समान उचित अधिकार, सम्मान व समान अवसर मिल सके। क्योंकि महिला ही इस सृष्टि का आधार हैं। साथ ही जिस तरह स्त्री और पुरुष दोनों एक-दूसरे के पूरक व सहयोगी होते हैं, एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं है। ठीक उसी तरह एक अकेला राष्ट्र, देश, समाज, परिवार, इंसान अकेले कुछ नहीं कर सकता हैं। अतः हम सभी को मिलकर इस देश के सतत् व सर्वांगीण विकास में अपनी अपनी अहम् भागीदारी सुनिश्चित कर और जनजागृति कर इस देश को पहले से भी ज्यादा सशक्त, सुदृढ़ बनाने में अपनी अहम् भूमिका निभानी चाहिए। ताकि हमारा देश पहले से भी ज्यादा सशक्त, सुदृढ़, शक्तिशाली और विकसित बन सकें।

सन्दर्भ ग्रंथ सूची

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  16. सुश्री संतोष यादव सहित समस्त अध्यक्ष बोर्ड व सदस्य समिति “जेण्डर, विद्यालय तथा समाज” प्रकाशक उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी 2017.[
  17. श्री बंगारु दत्तात्रेय के अनुसार- “सावित्रीबाई फुले महिला शिक्षा व महिला सशक्तिकरण की महान् प्रेरणा” शोध पत्र 2021.
  18. प्रा.रुपाली ए. इंगोले के अनुसार- “लैंगिक असमानता और भारतीय समाज” शोध पत्र www.researchgate.net/publication/35217943 January 2020.
  19. श्रीमती नीलम के अनुसार- ” डॉ.भीमराव अंबेडकर जी का योगदान” शोध पत्र ( IJCRT) 6 June 2023.
  20. डॉ. नीलम के अनुसार- “महात्मा गांधी: महिलाओं के संदर्भ में विचार” शोध पत्र (GJRA) 4 April 2015.
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  28. www.gandionwoman.com
  29. गूगल ब्राउज़र इत्यादि।
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