| Dharm Raj Nayak (Assistant Professor) Keshav Mahavidyalay Atru (Baran) Rajasthan |
Abstract
मीराबाई की साहित्य साधना भारतीय भक्तिकालीन साहित्य की अमूल्य धरोहर है। उनके पदों में प्रेम, विरह, समर्पण और लोक-लाज के त्याग का अद्भुत संगम मिलता है। मीरा ने कृष्ण को अपना प्रियतम मानकर आत्मा और परमात्मा के मिलन की साधना की। उनके काव्य में विरह का यथार्थ और मिलन का स्वप्न निरंतर द्वंद्व के रूप में उपस्थित है, जो उनकी भक्ति को गहन और मार्मिक बनाता है। मध्यकालीन समाज में नारी की स्थिति अत्यंत दयनीय थी, किंतु मीरा ने लोक-लाज का त्याग कर भक्ति का मार्ग अपनाया। यह कदम न केवल व्यक्तिगत साहस था, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति का प्रतीक भी था। उनके पद शिष्ट समाज से लेकर भील समुदाय तक लोकप्रिय हुए, जिससे उनकी भक्ति जन-संस्कृति का हिस्सा बन गई।
मीरा के काव्य पर निर्गुण और सगुण दोनों साधनाओं का प्रभाव है। उन्होंने कृष्ण को सगुण रूप में प्रियतम माना, किंतु निराकार ईश्वर की अनुभूति भी उनके पदों में मिलती है। नाथ मत और रामकथा का भी प्रभाव उनके काव्य में दिखाई देता है। समग्र रूप से, मीराबाई का काव्य भक्ति, प्रेम और नारी स्वतंत्रता का अद्वितीय संगम है। यह आज भी प्रासंगिक है और समाज को भक्ति, प्रेम तथा आत्मनिर्भरता की प्रेरणा देता है।
