| राजाराम सहायक आचार्य (भूगोल) महारानी श्री जया राजकीय स्नातकोतर महाविद्यालय (भरतपुर) एवं शोधार्थी खुशाल दास विश्वविद्यालय हनुमानगढ़ |
Abstract
राजस्थान का नवसृजित डीग जिला अपनी विशिष्ट जल स्थापत्य कला और ब्रज संस्कृति के लिए विख्यात है। भौगोलिक रूप से यह क्षेत्र यमुना के मैदान और अरावली पर्वतमाला का संगम स्थल है, जो इसे पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है। प्रस्तुत शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य डीग जिले की पर्यटन क्षमता का भौगोलिक मूल्यांकन करना और इसके सतत विकास हेतु रणनीतिक मॉडल प्रस्तुत करना है। इस अध्ययन में मिश्रित शोध विधि का प्रयोग किया गया है, जिसके अंतर्गत द्वितीयक आंकड़ों के साथ 470 हितधारकों (पर्यटक, स्थानीय निवासी और सेवा प्रदाता) से प्राप्त प्राथमिक आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के दौरान सांख्यिकीय तकनीकों, विशेषकर टी-टेस्ट और काई-वर्ग परीक्षण का अनुप्रयोग किया गया ताकि समस्याओं की गहनता को मापा जा सके। विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि यद्यपि यहाँ 7 विशिष्ट श्रेणियों (पुरातात्विक, ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, इको, भू-पर्यटन और शैक्षिक) के संसाधन उपलब्ध हैं, किंतु अवसंरचनात्मक ढांचे का अभाव इसके विकास में सबसे बड़ी बाधा है। टी-टेस्ट परिणामों ने सिद्ध किया है कि सड़क परिवहन सुविधाओं की स्थिति चिंताजनक है, जिसे घरेलू पर्यटकों ने 5 अंक के पैमाने पर मात्र 1.97 अंक दिए हैं। शोध का एक प्रमुख निष्कर्ष यह है कि गुणवत्तापूर्ण आवास सुविधाओं के अभाव में 85 प्रतिशत पर्यटक केवल दिन में भ्रमण करके लौट जाते हैं (डे-ट्रिपर), जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रति पर्यटक औसतन 4200 रुपये की संभावित राजस्व हानि होती है। इसके अतिरिक्त, कामां और पहाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चुनौतियां और परिक्रमा मार्ग पर अतिक्रमण को गंभीर स्थानिक समस्याओं के रूप में चिन्हित किया गया है। इन चुनौतियों के समाधान हेतु शोध पत्र में एक एकीकृत पर्यटन विकास मॉडल प्रस्तावित किया गया है। इसमें यातायात दबाव को कम करने के लिए बाईपास निर्माण, स्मारकों को जोड़ने के लिए हेरिटेज वॉक, ग्रामीण क्षेत्रों में होम-स्टे योजना और सुरक्षा हेतु पर्यटन पुलिस की तैनाती के सुझाव दिए गए हैं। निष्कर्षतः, यह अध्ययन यह स्थापित करता है कि यदि उचित स्थानिक नियोजन और प्रबंधन किया जाए, तो डीग एक वैश्विक पर्यटन गंतव्य बनने की पूर्ण क्षमता रखता है।
Keywords: डीग जिला, पर्यटन अवसंरचना, स्थानिक नियोजन, भौगोलिक विश्लेषण,सतत पर्यटन विकास, आर्थिक रिसाव, धार्मिक पर्यटन, ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा, पर्यटन परिपथ, एक-दिवसीय पर्यटक (डे-ट्रिपर), मिश्रित शोध विधि।
प्रस्तावना
पर्यटन भूगोल केवल स्थानों का विवरण नहीं है, बल्कि यह संसाधनों, अवसंरचना और मानवीय आवश्यकताओं के बीच के स्थानिक संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन है। किसी भी क्षेत्र का पर्यटन विकास वहां उपलब्ध प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहरों के साथ-साथ वहां की ‘पहुंच’ और ‘सुविधाओं’ पर निर्भर करता है1। राजस्थान का पूर्वी प्रवेश द्वार कहा जाने वाला डीग जिला इस संदर्भ में एक अद्वितीय भौगोलिक इकाई है, जो ऐतिहासिक भव्यता और धार्मिक आस्था का संगम स्थल है।ऐतिहासिक रूप से, डीग 18वीं शताब्दी में शक्तिशाली जाट राजवंश की ग्रीष्मकालीन राजधानी रहा है। महाराजा बदन सिंह और महाराजा सूरजमल द्वारा निर्मित यहाँ के भव्य ‘जल महल’ और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर आधारित ‘रंगीन फव्वारा तकनीक’ स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं2। भौगोलिक दृष्टि से, यह क्षेत्र यमुना के उपजाऊ मैदान और अरावली पर्वतमाला के मिलन बिंदु पर स्थित है, जो इसे ‘ब्रज 84 कोस परिक्रमा’ का एक अभिन्न अंग बनाता है। यहाँ प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु गोवर्धन और कामां के धार्मिक स्थलों की यात्रा करते हैं।

मानचित्र मापनी आधारित नहीं है
हाल ही में राज्य सरकार द्वारा डीग को भरतपुर से अलग कर एक स्वतंत्र जिले का दर्जा प्रदान किया गया है, जिससे इसकी प्रशासनिक और पर्यटन महत्ता में वृद्धि हुई है। किंतु, वर्तमान परिदृश्य का अवलोकन करने पर यह विरोधाभास सामने आता है कि संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद डीग पर्यटन मानचित्र पर वह स्थान नहीं बना पाया है जिसका वह अधिकारी है। प्रसिद्ध पर्यटन विद्वान आर.एन. कौल का कथन है कि “पर्यटन उत्पाद का उपभोग उसके उद्गम स्थान पर ही किया जा सकता है, इसलिए वहां तक पहुंचने की सुगम व्यवस्था अनिवार्य है”3। डीग के संदर्भ में यही संपर्कता और अवसंरचनात्मक ढांचा सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
“प्रस्तुत शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य डीग जिले की पर्यटन क्षमता का भौगोलिक मूल्यांकन करना और विद्यमान अवसंरचनात्मक अंतरालों की पहचान करना है। साथ ही, यह अध्ययन इस परिकल्पना का वैज्ञानिक परीक्षण करता है कि क्या केवल ऐतिहासिक धरोहरों की उपस्थिति पर्यटन विकास के लिए पर्याप्त है, या इसके लिए सुदृढ़ नियोजन और अवसंरचना अनिवार्य है। यह शोध पत्र डीग के लिए एक स्थानिक नियोजन मॉडल प्रस्तुत करने का प्रयास है, जो इसे एक सतत गंतव्य के रूप में स्थापित कर सके।”
अध्ययन क्षेत्र एवं शोध विधि
किसी भी भौगोलिक शोध की विश्वसनीयता उसके अध्ययन क्षेत्र की स्पष्टता और अपनाई गई कार्यप्रणाली की वैज्ञानिकता पर निर्भर करती है। प्रस्तुत शोध पत्र का केंद्र बिंदु राजस्थान का नवसृजित’डीग जिला’ है। भौगोलिक रूप से यह क्षेत्र 27 डिग्री 28 मिनट उत्तरी अक्षांश और 77 डिग्री 20 मिनट पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित है4। यह जिला राजस्थान की पूर्वी सीमा पर स्थित है, जो उत्तर प्रदेश के मथुरा और हरियाणा के नूंह जिले से लगा हुआ है। भौतिक दृष्टि से यह क्षेत्र ‘यमुना के कछारी मैदान’ का विस्तार है, जिसके उत्तरी भाग (कामां और पहाड़ी तहसील) में अरावली पर्वतमाला की अवशिष्ट श्रेणियां विद्यमान हैं। रूपारेल यहाँ की प्रमुख मौसमी नदी है, जो ऐतिहासिक जल प्रबंधन प्रणाली का आधार रही है। सांस्कृतिक रूप से यह संपूर्ण क्षेत्र ‘ब्रज 84 कोस परिक्रमा’ के अंतर्गत आता है, जो इसे धार्मिक पर्यटन का केंद्र बनाता है।
प्रस्तुत शोध अध्ययन ‘मिश्रित :शोध विधि’ पर आधारित है, जिसमें गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों प्रकार के आंकड़ों का समावेश किया गया है5। शोध की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए ‘द्वितीयक आंकड़ों’ का संकलन सरकारी विभागों, जैसे- पर्यटन विभाग, नगर नियोजन विभाग (डीग मास्टर प्लान-2041) और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्टों से किया गया है।
शोध का सबसे महत्वपूर्ण भाग ‘प्राथमिक आंकड़ों’ का संकलन रहा है, जिसके लिए ‘स्तरीकृत यादृच्छिक निदर्शन’ विधि का प्रयोग किया गया। अध्ययन में कुल 470 उत्तरदाताओं (सैंपल साइज) का चयन किया गया, जिन्हें चार प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया था :
सारणी 1: अध्ययन क्षेत्र में उत्तरदाताओं की संख्या (2025) शोधार्थी द्वारा सर्वेक्षण से संकलित
| उत्तरदाता | संख्या | विशेष |
| अन्तर-राज्यीय (घरेलू पर्यटक) | 200 | विभिन्न राज्यों से आए श्रद्धालु |
| अन्तर्राष्ट्रीय (विदेशी पर्यटक) | 40 | मुख्यतः यूरोप और अमेरिका से |
| अन्तर-क्षेत्रीय (स्थानीय निवासी) | 140 | डीग, कामां, ब्रजनगर और बहज के नागरिक |
| कार्यात्मक (सेवा प्रदाता) | 90 | होटल व्यवसायी, गाइड, दुकानदार और रिक्शा चालक |
स्रोत: शोधार्थी द्वारा सर्वेक्षण से संकलित आंकड़े 2025
इन उत्तरदाताओं से जानकारी प्राप्त करने के लिए विस्तृत ‘प्रश्नावली’ और ‘अनुसूची’ का प्रयोग किया गया। प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण हेतु उन्नत सांख्यिकीय तकनीकों का अनुप्रयोग किया गया है। पर्यटकों की संतुष्टि के स्तर और सुविधाओं के बीच के अंतर (गैप) को मापने के लिए ‘टी-टेस्ट’ (टी-टेस्ट) का प्रयोग किया गया, जबकि स्थानीय समुदाय की धारणाओं और उनके व्यवसाय के बीच संबंध को समझने के लिए ‘काई-वर्ग परीक्षण’ का उपयोग किया गया है6। इसके अतिरिक्त, क्षेत्र की क्षमताओं और चुनौतियों के समग्र मूल्यांकन हेतु ‘स्वॉट विश्लेषण’ तकनीक अपनाई गई है।
पर्यटन संसाधनों का वर्गीकरण एवं विश्लेषण
किसी भी क्षेत्र का पर्यटन विकास वहां उपलब्ध संसाधनों की विविधता और गुणवत्ता पर निर्भर करता है। डीग जिले का भौगोलिक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि यहाँ पर्यटन केवल एक आयामी नहीं, बल्कि बहुआयामी है। शोध के दौरान किए गए क्षेत्रीय सर्वेक्षण और अवलोकन के आधार पर डीग के पर्यटन संसाधनों को 7 विशिष्ट श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है7, जो इसकी व्यापक क्षमता को प्रदर्शित करते हैं :

चित्र 2 : उत्तरदाताओं की संख्या का आरेखीय प्रदर्शन
- पुरातात्विक पर्यटन : बहज के प्राचीन टीले और कामां के स्तंभ, जहाँ चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति के अवशेष मिले हैं।
- ऐतिहासिक पर्यटन : डीग के विश्व प्रसिद्ध जल महल, गोपाल भवन, डीग का किला और कुम्हेर-थून के दुर्ग, जो जाट स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
- धार्मिक पर्यटन : यह डीग की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इसमें ब्रज 84 कोस परिक्रमा मार्ग, पूंछरी का लौठा, कामां के चौरासी खंभे (गोकुल चंद मंदिर) और आदि बद्री धाम शामिल हैं।
- सांस्कृतिक एवं मेले : डीग का ऐतिहासिक जवाहर प्रदर्शनी मेला, ब्रज महोत्सव और कामां का भोजन थाली मेला, जो स्थानीय लोक संस्कृति का जीवंत प्रदर्शन हैं।
- इको-टूरिज्म : सामई-खेडा आर्द्रभूमि क्षेत्र, सीकरी बांध, माढैरा की रूंध (निर्माणाधीन लव-कुश वाटिका) और ‘श्याम ढाक वन’ क्षेत्र, जो जैव विविधता से परिपूर्ण हैं।
- भू-पर्यटन : कामां और पहाड़ी तहसील में स्थित अरावली पर्वतमाला की प्राचीनतम चट्टानी संरचनाएं, जो भू-वैज्ञानिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- शैक्षिक पर्यटन : महाराजा सूरजमल ब्रज विश्वविद्यालय एवं शोध केंद्र, जो इतिहास और संस्कृति के अध्ययन का केंद्र है।
अध्ययन क्षेत्र का अवसंरचनात्मक विश्लेषण एवं चुनौतियां
उपर्युक्त संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद, प्राथमिक आँकड़ों का विश्लेषण एक विरोधाभासी स्थिति को उजागर करता है। शोध में 470 उत्तरदाताओं से प्राप्त प्रतिक्रियाओं का ‘टी-टेस्ट’ (t-test) के माध्यम से विश्लेषण किया गया, जिससे अवसंरचनात्मक अंतरालों की पुष्टि हुई है।8
विश्लेषण से प्राप्त प्रमुख चुनौतियां निम्न प्रकार हैं :
- परिवहन संपर्कता का संकट : पर्यटकों की संतुष्टि के 5 अंकीय पैमाने पर ‘सड़क परिवहन’ को सबसे कम रेटिंग प्राप्त हुई है। घरेलू पर्यटकों ने इसे 1.97 और विदेशी पर्यटकों ने 1.48 का औसत स्कोर दिया है। यह सांख्यिकीय आंकड़ा सिद्ध करता है कि गोवर्धन-डीग और भरतपुर-डीग मार्ग की जर्जर स्थिति पर्यटन विकास में सबसे बड़ी भौतिक बाधा है।
- आवास एवं आर्थिक रिसाव : सर्वेक्षण में पाया गया कि 85 प्रतिशत पर्यटक ‘डे-ट्रिपर’ (बिना रात्रि विश्राम वाले) हैं। गुणवत्तापूर्ण होटलों के अभाव में वे रात्रि विश्राम के लिए मथुरा या भरतपुर चले जाते हैं। आर्थिक विश्लेषण के अनुसार, इससे डीग को प्रति पर्यटक औसतन 4200 रुपये की संभावित राजस्व हानि हो रही है, जिसे पर्यटन भूगोल में ‘आर्थिक रिसाव’ कहा जाता है9।
- स्थानिक संघर्ष : धार्मिक पर्यटन के केंद्र ‘परिक्रमा मार्ग’ पर ग्रामीणों द्वारा कृषि कार्यों (कड़वी और उपले) का अतिक्रमण एक गंभीर समस्या है। साथ ही, कामां-पहाड़ी क्षेत्र में साइबर अपराध (टटलूबाजी) की घटनाओं ने गंतव्य की सुरक्षा छवि को धूमिल किया है।
निष्कर्ष
प्रस्तुत शोध अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि डीग जिले में पर्यटन विकास की ‘अपार संभावनाएँ’ और ‘गंभीर चुनौतियाँ’ एक साथ विद्यमान हैं। अध्याय–5 का वर्गीकरण सिद्ध करता है कि यहाँ 7 प्रकार के दुर्लभ संसाधन उपलब्ध हैं। किंतु, परिकल्पना परीक्षण से यह स्पष्ट हुआ है कि ऐतिहासिक धरोहरों की उपस्थितिमात्र से पर्यटन का विकास संभव नहीं है, जब तक कि उसे सुदृढ़ ‘अवसंरचनात्मक ढाँचे’ का सहयोग न मिले।
वर्तमान में डीग ‘नियोजन के अभाव’ से जूझ रहा है। सड़कों की जर्जर स्थिति (रेटिंग 1.97) और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ इसके वैश्विक गंतव्य बनने की राह में सबसे बड़ी बाधाएँ हैं।10 अंततः, यह शोधपत्र अनुशंसा करता है कि यदि प्रस्तावित ‘स्थानिक नियोजन मॉडल’ को नीतिगत स्तर पर लागू किया जाए, तो डीग न केवल अपनी खोई हुई गरिमा पुनः प्राप्त कर सकेगा, बल्कि सतत विकास का एक आदर्श मॉडल भी बन सकता है।
नियोजन रणनीतियाँ एवं सुझाव
शोध के विश्लेषण से प्राप्त चुनौतियों, विशेषकर अवसंरचनात्मक अंतरालों और आर्थिक रिसाव के समाधान हेतु एक ‘एकीकृत पर्यटन विकास मॉडल’ प्रस्तावित किया जाता है।11 डीग को केवल एक ‘संक्रमणकालीन केंद्र’ से बदलकर एक ‘गंतव्य’ बनाने के लिए निम्न रणनीतियाँ/सुझाव अनिवार्य हैं :
1. स्थानिक नियोजन एवं संपर्कता :
यातायात जाम और स्मारकों को कंपन से बचाने के लिए स्वीकृत ‘डीग बाईपास परियोजना’ का प्राथमिकता के आधार पर निर्माण किया जाना आवश्यक है। नगर के भीतर पर्यटकों की सुगम आवाजाही के लिए लक्ष्मण मंदिर से जल महलों तक ‘हेरिटेज वॉक’ विकसित किया जाना चाहिए, जहाँ भारी वाहनों का प्रवेश निषिद्ध हो।
2. पर्यटन परिपथ (सर्किट) विकास :
पर्यटकों के प्रवाह को नियमित करने के लिए तीन विशिष्ट परिपथों का निर्माण प्रस्तावित है12 :
• धार्मिक परिपथ : गोवर्धन – पूंछरी – डीग – कामां – बरसाना (श्रद्धालुओं हेतु)।
• शाही विरासत परिपथ : आगरा – भरतपुर – डीग – अलवर (विदेशी पर्यटकों हेतु)।
• ग्रामीण अनुभव परिपथ : डीग – बहज – पहाड़ी (सांस्कृतिक शोध हेतु)।
3. आतिथ्य एवं आर्थिक सुदृढ़ीकरण :
‘आर्थिक रिसाव’ को रोकने के लिए बहज और कामां जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में ‘होम-स्टे’ इकाइयों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जीर्ण-शीर्ण हवेलियों का ‘अनुकूलन पुनः उपयोग’ कर उन्हें हेरिटेज होटलों में बदलना ही रात्रि पर्यटन को बढ़ावा देने का एकमात्र विकल्प है।
4. संस्थागत सुधार एवं सुरक्षा :
कामां क्षेत्र में साइबर अपराध की चुनौतियों से निपटने के लिए ‘ऑपरेशन एंटी-वायरस’ का विस्तार करते हुए प्रमुख पर्यटन स्थलों पर समर्पित ‘पर्यटन पुलिस’ की तैनाती की जानी चाहिए। साथ ही, परिक्रमा मार्ग के पारिस्थितिक संरक्षण हेतु ‘हरित पट्टिका’ का विकास अनिवार्य है।
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