| Dr. Kumari Pamila Asst. Prof. (Political Science) A.S. College, Deoghar Jharkhand |
Abstract
यह शोध-पत्र पश्चिमी नारीवाद तथा भारतीय संदर्भ में विकसित गांधीवादी नारीवाद के बीच तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। नारीवाद को सामान्यतः एक ऐसी विचारधारा के रूप में समझा जाता है, जिसका उद्देश्य महिलाओं की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करना है (Hooks, 2000)।
विस्तृत अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि पश्चिमी नारीवाद मुख्यतः व्यक्तिगत अधिकारों, स्वतंत्रता और संस्थागत सुधारों पर आधारित है (Wollstonecraft, 1792)। इसके विपरीत, गांधीवादी नारीवाद नैतिकता, अहिंसा, आत्मबल और सामाजिक समरसता को केंद्र में रखकर स्त्री-मुक्ति की अवधारणा विकसित करता है (Gandhi, 1958)।
नारीवाद एक सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक आंदोलन है, जिसका उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों, समानता और गरिमा की स्थापना करना है। इस शोध-पत्र में गांधीवादी नारीवाद और पश्चिमी नारीवाद की अवधारणाओं का विश्लेषण किया गया है तथा उनके बीच समानताओं और भिन्नताओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। गांधीवादी नारीवाद भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, अहिंसा, सत्य और नैतिकता पर आधारित है, जबकि पश्चिमी नारीवाद मुख्यतः व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समान अधिकार और पितृसत्ता के विरोध पर केंद्रित है। इस अध्ययन में यह पाया गया कि दोनों विचारधाराएँ महिलाओं की स्थिति सुधारने का प्रयास करती हैं, किंतु उनकी पद्धति और दृष्टिकोण में मौलिक अंतर है। गांधीवादी नारीवाद सामूहिक कल्याण और नैतिक शक्ति पर बल देता है, जबकि पश्चिमी नारीवाद व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्रता को प्राथमिकता देता है। इस शोध में दोनों दृष्टिकोणों की वैचारिक पृष्ठभूमि, स्त्री-मुक्ति की अवधारणा, संघर्ष के साधनों तथा परिवार और समाज के प्रति उनके दृष्टिकोण का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के निष्कर्ष से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय परिस्थितियों में इन दोनों दृष्टिकोणों का संतुलित समन्वय अधिक व्यावहारिक और प्रभावी हो सकता है।
