| वर्षा दीक्षित शोधार्थी (भूगोल विभाग) श्री खुशालदास विश्वविद्यालय हनुमानगढ़ (राजस्थान) | डॉ. जयदेव प्रसाद शर्मा सह आचार्य (भूगोल विभाग) श्री खुशालदास विश्वविद्यालय हनुमानगढ़ (राजस्थान) |
Abstract
राजस्थान की अर्थव्यवस्था का समकालीन परिदृश्य एक ऐसे संरचनात्मक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है जहाँ पारंपरिक कृषि प्रधान समाज आधुनिक सेवा और औद्योगिक अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से अग्रसर है। यह शोध पत्र वित्तीय वर्ष 2022-23 से 2024-25 की अवधि के दौरान राज्य की आर्थिक गतिशीलता, क्षेत्रीय विषमताओं और अद्वितीय भौगोलिक चुनौतियों का एक गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। राजस्थान, भारत का भौगोलिक रूप से सबसे बड़ा राज्य होने के नाते, अपनी विकास यात्रा में थार मरुस्थल की शुष्कता, अरावली की प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं के क्षरण और पानी की चरम कमी जैसी बाधाओं का सामना कर रहा है। इसके बावजूद, नवीनतम आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि राज्य ने 350 बिलियन की अर्थव्यवस्था बनने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसे प्राप्त करने के लिए इसे लगभग 14.34 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि विकास दर की आवश्यकता होगी। इस अध्ययन का उद्देश्य उन जटिल अंतर्संबंधों को उजागर करना है जो आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच विद्यमान हैं।
यह शोध यह भी स्पष्ट करता है कि राज्य की आर्थिक वृद्धि मुख्यतः सेवा क्षेत्र द्वारा संचालित है, जबकि कृषि क्षेत्र में निर्भरता अभी भी उच्च बनी हुई है, जिससे संरचनात्मक असंतुलन उत्पन्न होता है। अध्ययन में यह पाया गया है कि जल संकट, क्षेत्रीय असमानता और सीमित औद्योगिक विविधीकरण राज्य के सतत विकास के प्रमुख अवरोध हैं। साथ ही, राजकोषीय दबाव और बढ़ता ऋण भार दीर्घकालिक निवेश क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं। अध्ययन नीति-निर्माताओं के लिए यह संकेत देता है कि जल प्रबंधन, कौशल विकास, हरित ऊर्जा निवेश और क्षेत्रीय संतुलित विकास पर केंद्रित रणनीतियाँ अपनाना अत्यंत आवश्यक है। अंततः, यह शोध निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि यदि राजस्थान अपनी भौगोलिक बाधाओं को नवाचार और प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप के माध्यम से संतुलित कर सके, तो वह न केवल अपने विकास लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है, बल्कि भारत की आर्थिक प्रगति में एक अग्रणी भूमिका भी निभा सकता है।
