| वर्षा दीक्षित शोधार्थी (भूगोल विभाग) श्री खुशालदास विश्वविद्यालय हनुमानगढ़ (राजस्थान) | डॉ. जयदेव प्रसाद शर्मा सह आचार्य (भूगोल विभाग) श्री खुशालदास विश्वविद्यालय हनुमानगढ़ (राजस्थान) |
Abstract
राजस्थान की अर्थव्यवस्था का समकालीन परिदृश्य एक ऐसे संरचनात्मक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है जहाँ पारंपरिक कृषि प्रधान समाज आधुनिक सेवा और औद्योगिक अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से अग्रसर है। यह शोध पत्र वित्तीय वर्ष 2022-23 से 2024-25 की अवधि के दौरान राज्य की आर्थिक गतिशीलता, क्षेत्रीय विषमताओं और अद्वितीय भौगोलिक चुनौतियों का एक गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। राजस्थान, भारत का भौगोलिक रूप से सबसे बड़ा राज्य होने के नाते, अपनी विकास यात्रा में थार मरुस्थल की शुष्कता, अरावली की प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं के क्षरण और पानी की चरम कमी जैसी बाधाओं का सामना कर रहा है। इसके बावजूद, नवीनतम आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि राज्य ने 350 बिलियन की अर्थव्यवस्था बनने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसे प्राप्त करने के लिए इसे लगभग 14.34 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि विकास दर की आवश्यकता होगी। इस अध्ययन का उद्देश्य उन जटिल अंतर्संबंधों को उजागर करना है जो आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच विद्यमान हैं।
यह शोध यह भी स्पष्ट करता है कि राज्य की आर्थिक वृद्धि मुख्यतः सेवा क्षेत्र द्वारा संचालित है, जबकि कृषि क्षेत्र में निर्भरता अभी भी उच्च बनी हुई है, जिससे संरचनात्मक असंतुलन उत्पन्न होता है। अध्ययन में यह पाया गया है कि जल संकट, क्षेत्रीय असमानता और सीमित औद्योगिक विविधीकरण राज्य के सतत विकास के प्रमुख अवरोध हैं। साथ ही, राजकोषीय दबाव और बढ़ता ऋण भार दीर्घकालिक निवेश क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं। अध्ययन नीति-निर्माताओं के लिए यह संकेत देता है कि जल प्रबंधन, कौशल विकास, हरित ऊर्जा निवेश और क्षेत्रीय संतुलित विकास पर केंद्रित रणनीतियाँ अपनाना अत्यंत आवश्यक है। अंततः, यह शोध निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि यदि राजस्थान अपनी भौगोलिक बाधाओं को नवाचार और प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप के माध्यम से संतुलित कर सके, तो वह न केवल अपने विकास लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है, बल्कि भारत की आर्थिक प्रगति में एक अग्रणी भूमिका भी निभा सकता है।
Key words- राजस्थान की अर्थव्यवस्था, संरचनात्मक रूपांतरण, क्षेत्रीय विषमताएँ, भू-पारिस्थितिक चुनौतियाँ, थार मरुस्थल, अरावली पर्वतमाला, जल संकट, भूजल दोहन, सेवा क्षेत्र विकास, कृषि असंतुलन, औद्योगिक विविधीकरण, राजकोषीय घाटा, ऋण-से-जीएसडीपी अनुपात, अक्षय ऊर्जा, मरुस्थलीकरण।
प्रस्तावनाः-
राजस्थान की आर्थिक नियति इसकी विशिष्ट भू-आकृति द्वारा निर्धारित होती है। राज्य का पश्चिमी भाग, जो थार मरुस्थल के अंतर्गत आता है, चतुर्थांश युग की भू-वैज्ञानिक संरचनाओं से बना है, जहाँ टेथिस सागर के अवशेष खारे पानी की झीलों के रूप में आज भी मौजूद हैं। यह भौगोलिक विरासत एक ओर प्रचुर खनिज संपदा और सौर ऊर्जा की संभावना प्रदान करती है, तो दूसरी ओर कृषि के लिए अत्यंत कठिन परिस्थितियां उत्पन्न करती है। अरावली पर्वत श्रृंखला, जो प्री-कैम्ब्रियन काल की है, राज्य को दो मुख्य भागों में विभाजित करती है और उत्तर-पश्चिमी मरुस्थल के विस्तार को रोकने के लिए एक प्राकृतिक अवरोध का कार्य करती है। आर्थिक विश्लेषण इंगित करता है कि राज्य की सकल राज्य घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी अब 45 प्रतिशत से अधिक हो गई है, जो विकास के एक नए इंजन के रूप में उभरा है।
राज्य की विकास रणनीति वर्तमान में ‘राइजिंग राजस्थान‘ और ‘विकसित राजस्थान 2047‘ जैसे विजन दस्तावेजों पर आधारित है, जो 2029-30 तक अर्थव्यवस्था को दोगुना करने का लक्ष्य रखते हैं। हालांकि, यह विकास पथ राजकोषीय अस्थिरता और ऋण के बढ़ते बोझ के कारण चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। 2022-23 में राज्य का ऋण-से-जीएसडीपी अनुपात 35.3 प्रतिशत दर्ज किया गया, जो मध्यम राज्यों के औसत से काफी अधिक है। यह वित्तीय दबाव राज्य की क्षमता को बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश करने से रोकता है, जिससे एक ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहाँ निजी निवेश का आकर्षण अनिवार्य हो जाता है।
शोध परिकल्पनाएं-
इस अध्ययन के विश्लेषण को दिशा प्रदान करने के लिए निम्नलिखित परिकल्पनाएं प्रस्तुत की गई हैंः
- क्षेत्रीय असंतुलन की परिकल्पनाः- राजस्थान की आर्थिक वृद्धि का बड़ा हिस्सा जयपुर, भिवाड़ी और कोटा जैसे शहरी केंद्रों तक सीमित है, जिसके परिणामस्वरूप ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों (बांसवाड़ा, डूंगरपुर) में सामाजिक-आर्थिक विषमताएं बढ़ रही हैं।
- जल-आर्थिक विरोधाभास की परिकल्पनाः- कृषि उत्पादन में वृद्धि मुख्य रूप से भूजल के अति-दोहन पर आधारित है, जो दीर्घकालिक रूप से अस्थिर है और निकट भविष्य में ग्रामीण आय में भारी गिरावट का कारण बन सकता है।
- औद्योगिक विविधीकरण की परिकल्पनाः- खनिज और पारंपरिक कपड़ा उद्योगों से हटकर रक्षा, एयरोस्पेस और अक्षय ऊर्जा जैसे सनराइज क्षेत्रों में निवेश प्रोत्साहन नीतियां (2024) राज्य की अर्थव्यवस्था को उच्च उत्पादकता वाले मार्ग पर ले जाने के लिए आवश्यक हैं।
- मानव पूंजी अंतराल की परिकल्पनाः- उच्च साक्षरता प्रयासों के बावजूद, कौशल विकास और शिक्षा की गुणवत्ता में कमी औद्योगिक मांग और उपलब्ध कार्यबल के बीच एक बड़ा अंतराल पैदा कर रही है, जो बेरोजगारी दर को प्रभावित कर रहा है।
शोध प्रश्नः-
- संरचनात्मक रूपांतरणः- नवीनतम आंकड़ों के आधार पर राजस्थान की अर्थव्यवस्था में कौन से प्रमुख संरचनात्मक परिवर्तन हो रहे हैं और क्या ये परिवर्तन समावेशी विकास की ओर संकेत करते हैं?
- भौगोलिक चुनौतियां- राज्य की विशिष्ट भौगोलिक सीमाएं और पारिस्थितिक कमजोरियां (जैसे जल की चरम कमी और मरुस्थलीकरण) इसके आर्थिक विकास को किस तरह प्रभावित कर रही हैं?
- आर्थिक वृद्धि और आयः- वित्तीय वर्ष 2022-23 से 2024-25 के दौरान सकल राज्य घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय के रुझान राज्य के आर्थिक स्वास्थ्य के बारे में क्या बताते हैं?
- क्षेत्रीय मूल्य वर्धनः- राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्रों का तुलनात्मक योगदान क्या है और कौन सा क्षेत्र विकास के प्रमुख इंजन के रूप में कार्य कर रहा है?
- राजकोषीय अनुशासनः- राज्य का बढ़ता हुआ ऋण भार और राजकोषीय घाटा राजस्थान की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता और विकास लक्ष्यों के लिए कितनी बड़ी चुनौती है?
शोध पद्धतिः-
इस शोध अध्ययन में मुख्य रूप से द्वितीयक डेटा विश्लेषण और विश्लेषणात्मक एवं वर्णनात्मक शोध विधि का प्रयोग किया गया है।
- आधिकारिक आंकड़ों का स्रोतः- यह शोध पूरी तरह से विश्वसनीय और आधिकारिक सरकारी दस्तावेजों पर आधारित है। इसमें मुख्य रूप से ‘राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2023-24‘, ‘नीति आयोग‘ के वित्तीय परिदृश्य प्रतिवेदन, भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े और राजस्थान सरकार के नवीनतम बजट (2024-25 और 2025-26) का उपयोग किया गया है।
- मात्रात्मक से गुणात्मक विश्लेषणः- अध्ययन में सांख्यिकीय आंकड़े जैसे मात्रात्मक आंकड़ों का उपयोग करके गुणात्मक निष्कर्ष निकाले गए हैं। इससे भौगोलिक कारकों, आर्थिक प्रदर्शन और सरकारी नीतियों के बीच के ‘कारण-प्रभाव‘ संबंधों को समझने में मदद मिली है।
- तुलनात्मक अध्ययनः- शोध में वित्त वर्ष 2022-23 से 2024-25 तक की अवधि के आंकड़ों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। यह विधि राज्य की अर्थव्यवस्था में हो रहे संरचनात्मक परिवर्तनों और विकास के रुझानों की पहचान करने के लिए अपनाई गई है।
- क्षेत्रीय और समस्या-आधारित दृष्टिकोणः- शोध में केवल व्यापक आर्थिक आंकड़ों पर ध्यान न देकर, सूक्ष्म स्तर की समस्याओं (जैसे जल संकट, कौशल विकास और क्षेत्रीय विषमता) के विश्लेषण के लिए ‘समस्या-समाधान दृष्टिकोण‘ का प्रयोग किया गया है।
- परिकल्पना परीक्षणः- आधिकारिक आंकड़ों और पूर्व शोध साहित्य के आधार पर निर्धारित परिकल्पनाओं का मूल्यांकन किया गया है, ताकि राज्य की आर्थिक चुनौतियों के मूल कारणों को वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट किया जा सके।
राजस्थान के आर्थिक प्रदर्शन के आंकड़ों का सांख्यिकीय विश्लेषण (2022-2025)
राजस्थान की अर्थव्यवस्था ने कोविड-19 महामारी के बाद एक मजबूत वापसी की है। 2023-24 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, स्थिर कीमतों (2011-12) पर जीएसडीपी ₹8,45,115 करोड़ दर्ज की गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में 8.03 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। 2024-25 के लिए वर्तमान कीमतों पर जीएसडीपी का अनुमान ₹17.04 लाख करोड़ है, जो 12.02 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि का संकेत देता है।
सकल राज्य घरेलू उत्पाद और प्रतिव्यक्ति आय के रुझानः-
- सकल राज्य घरेलू उत्पाद की प्रवृत्तिः-
राजस्थान की अर्थव्यवस्था ने पिछले तीन वर्षों में निरंतर विस्तार दिखाया है। प्रचलित कीमतों पर राज्य की अर्थव्यवस्था का आकार वर्ष 2022-23 के 13,58,000 करोड़ रुपये से बढ़कर वर्ष 2024-25 के अग्रिम अनुमानों में 17,04,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है। यह वृद्धि राज्य के 350 बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। यदि वृद्धि दर की बात करें, तो प्रचलित कीमतों पर यह वर्ष 2023-24 में 12.56 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर थी, जिसके वर्ष 2024-25 में 12.02 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
- वास्तविक बनाम नाममात्र विकासः-
स्थिर कीमतों 2011-12 पर आधारित जी.एस.डी.पी. जो मुद्रास्फीति के प्रभाव को हटाकर वास्तविक उत्पादन को दर्शाती है, उसमें भी ठोस सुधार देखा गया है। यह वर्ष 2022-23 के 7,82,287 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 9,06,000 करोड़ रुपये होने का अनुमान है। हालांकि, वास्तविक विकास दर में मामूली गिरावट का रुझान देखा गया है, जो 2022-23 में 8.12 प्रतिशत थी और 2024-25 तक घटकर 7.82 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह संकेत देता है कि वास्तविक उत्पादन में वृद्धि जारी है, लेकिन इसकी गति में हल्का ठहराव आया है।
- प्रतिव्यक्ति आय और जीवन स्तरः-
राज्य के नागरिकों के औसत आर्थिक कल्याण का सूचक, प्रतिव्यक्ति आय, उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाती है। प्रचलित कीमतों पर प्रतिव्यक्ति आय वर्ष 2022-23 के 1,50,653 रुपये से बढ़कर 2024-25 में 1,85,053 रुपये होने का अग्रिम अनुमान है। इसी तरह, स्थिर कीमतों पर यह 84,931 रुपये से बढ़कर 96,638 रुपये तक पहुंच गई है। यह वृद्धि राज्य में बेहतर आर्थिक अवसरों और आय के स्तर में सुधार को इंगित करती है, हालांकि यह अभी भी राष्ट्रीय औसत से लगभग 10 प्रतिशत कम बनी हुई है।
सांख्यिकीय आंकड़ों का सूक्ष्म विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि यद्यपि नाममात्र की वृद्धि प्रभावशाली है, लेकिन वास्तविक वृद्धि (स्थिर कीमतों पर) में 2024-25 के दौरान मामूली गिरावट आने का अनुमान है। प्रतिव्यक्ति आय में 11.04 प्रतिशत की वृद्धि सराहनीय है, लेकिन यह अभी भी राष्ट्रीय औसत से लगभग 10 प्रतिशत कम बनी हुई है, जो राज्य के पिछड़ेपन को उजागर करती है।
क्षेत्रीय मूल्य वर्धन और संरचनात्मक परिवर्तनः-
सकल राज्य मूल्य वर्धित का क्षेत्रवार वितरण राजस्थान की आर्थिक प्राथमिकताओं में हो रहे बदलाव का दर्पण है। सेवा क्षेत्र, जो कभी केवल पर्यटन तक सीमित था, अब व्यापार, परिवहन और संचार जैसे उप-क्षेत्रों के कारण सबसे बड़ा योगदानकर्ता बन गया है।
सकल राज्य मूल्य वर्धित में क्षेत्रीय योगदान (2024-25)–
- सकल राज्य घरेलू उत्पाद की प्रवृत्तिः-
राजस्थान की अर्थव्यवस्था ने पिछले तीन वर्षों में निरंतर विस्तार दिखाया है। प्रचलित कीमतों पर राज्य की अर्थव्यवस्था का आकार वर्ष 2022-23 के 13,58,000 करोड़ रुपये से बढ़कर वर्ष 2024-25 के अग्रिम अनुमानों में 17,04,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है। यह वृद्धि राज्य के 350 बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। यदि वृद्धि दर की बात करें, तो प्रचलित कीमतों पर यह वर्ष 2023-24 में 12.56 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर थी, जिसके वर्ष 2024-25 में 12.02 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
- वास्तविक बनाम नाममात्र विकासः-
स्थिर कीमतों पर आधारित जी.एस.डी.पी., जो मुद्रास्फीति के प्रभाव को हटाकर वास्तविक उत्पादन को दर्शाती है, उसमें भी ठोस सुधार देखा गया है। यह वर्ष 2022-23 के 7,82,287 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 9,06,000 करोड़ रुपये होने का अनुमान है। हालांकि, वास्तविक विकास दर में मामूली गिरावट का रुझान देखा गया है, जो 2022-23 में 8.12 प्रतिशत थी और 2024-25 तक घटकर 7.82 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह संकेत देता है कि वास्तविक उत्पादन में वृद्धि जारी है, लेकिन इसकी गति में हल्का ठहराव आया है।
- प्रतिव्यक्ति आय और जीवन स्तरः-
राज्य के नागरिकों के औसत आर्थिक कल्याण का सूचक, प्रतिव्यक्ति आय, उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाती है। प्रचलित कीमतों पर प्रतिव्यक्ति आय वर्ष 2022-23 के 1,50,653 रुपये से बढ़कर 2024-25 में 1,85,053 रुपये होने का अग्रिम अनुमान है। इसी तरह, स्थिर कीमतों पर यह 84,931 रुपये से बढ़कर 96,638 रुपये तक पहुंच गई है। यह वृद्धि राज्य में बेहतर आर्थिक अवसरों और आय के स्तर में सुधार को इंगित करती है, हालांकि यह अभी भी राष्ट्रीय औसत से लगभग 10 प्रतिशत कम बनी हुई है।
यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि सेवा क्षेत्र राज्य की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। हालांकि, विडंबना यह है कि कृषि क्षेत्र अभी भी लगभग 54.8 प्रतिशत से 60 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार देता है, जबकि इसका आर्थिक योगदान लगातार घट रहा है। यह संरचनात्मक असंतुलन ग्रामीण-शहरी आय अंतर को और अधिक गहरा बना रहा है।
शोध अध्ययन के अंतर्गत चिन्हित शोध समस्याएं-
जल सुरक्षा और सिंचाई की सूक्ष्म चुनौतियां-
- राजस्थान में प्रतिव्यक्ति जल उपलब्धता 2001 के 1867 घनमीटर से गिरकर 1000 घनमीटर से नीचे आ गई है, जो इसे ‘जल-तनाव’ की श्रेणी में खड़ा करती है।
- कुल 302 भूजल ब्लॉकों में से 214 अति-दोहित श्रेणी में हैं, जहाँ पुनर्भरण की तुलना में निकासी बहुत अधिक है।
- जैसलमेर जैसे शुष्क क्षेत्रों में निकासी दर पुनर्भरण की तुलना में 150 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जिससे ‘भूजल खनन’ की स्थिति उत्पन्न हो गई है।
- सिंचाई के लिए भूजल पर 80 प्रतिशत निर्भरता के कारण जल स्तर सालाना 1-3 मीटर गिर रहा है।
- नहर आधारित सिंचाई क्षेत्रों (जैसे गंगानगर-हनुमानगढ़) में अत्यधिक सिंचाई और जल निकासी की कमी से ‘सेम’ या जल भराव की समस्या।
- भूजल में फ्लोराइड और नाइट्रेट का उच्च स्तर स्वास्थ्य संकट पैदा कर रहा है, जिससे लगभग 24.52 लाख लोग प्रभावित हैं।
कृषि और ग्रामीण आजीविका के संकटः-
- सीमांत और लघु जोतों का बढ़ता विखंडन, जो मशीनीकरण और आर्थिक व्यवहार्यता को कठिन बनाता है।
- मानसून पर अत्यधिक निर्भरता व सूखे के वर्षों में कृषि उत्पादन में 20 प्रतिशत तक की भारी गिरावट।
- कृषि उत्पादों के लिए कोल्ड स्टोरेज और वेयरहाउसिंग की कमी, जिससे फसल कटाई के बाद 15-20 प्रतिशत नुकसान।
- रासायनिक उर्वरकों का असंतुलित उपयोग, जिससे मिट्टी के पोषक तत्वों में कमी और उर्वरता का ह्रास।
- पशुधन क्षेत्र में चारे की कमी और उन्नत नस्ल सुधार कार्यक्रमों की सीमित पहुंच।
- सरसों और बाजरा उत्पादन में प्रथम होने के बावजूद प्रसंस्करण इकाइयों का राज्य से बाहर होना।
औद्योगिक और निवेश संबंधी बाधाएं
- राजस्थान में औद्योगिक बिजली दरें पड़ोसी राज्यों की तुलना में अधिक हैं, जो विनिर्माण की प्रतिस्पर्धात्मकता को कम करती हैं।
- ‘सिंगल विंडो’ प्रणाली के बावजूद भूमि आवंटन और पर्यावरणीय मंजूरी में नौकरशाही देरी।
- खनिज संपदा के मामले में ‘खनिजों का संग्रहालय’ होने के बावजूद उन्नत उत्खनन प्रौद्योगिकियों का अभाव।
- औद्योगिक क्षेत्रों में जल निकासी और अपशिष्ट प्रबंधन के बुनियादी ढांचे का कमजोर होना।
- निजी क्षेत्र द्वारा अनुसंधान और विकास में नगण्य निवेश, जिससे नवाचार की कमी।
- एमएसएमई इकाइयों के लिए कार्यशील पूंजी प्राप्त करने में वित्तीय संस्थानों की कठोर शर्तें।
पर्यावरण और मरुस्थलीकरण की चुनौतियां-
- अरावली पहाड़ियों का गायब होना; पिछले 50 वर्षों में 31 में से 128 पहाड़ियां खनन के कारण नष्ट हो गई हैं।
- थार मरुस्थल का उत्तर-पूर्व की ओर विस्तार, जिसे ‘मरुस्थल ड्रिफ्ट’ कहा जाता है।
- जैव विविधता का ह्रास व गोडावण जैसी प्रजातियों का विलुप्ति के कगार पर होना।
- शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण के स्तर में खतरनाक वृद्धि, विशेष रूप से भिवाड़ी और जयपुर में।
- उद्योगों द्वारा अनुपचारित अपशिष्ट को नदियों (लूनी, बांडी) में बहाने से जल प्रदूषण।
- ई-अपशिष्ट और प्लास्टिक कचरे के निपटान के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन इकाइयों का अभाव।
शिक्षा और मानव विकास के अंतरालः-
- महिला साक्षरता दर (52.12 प्रतिशत) का राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे होना।
- सरकारी स्कूलों में 86000 से अधिक कक्षाओं का जर्जर होना, जिससे छात्रों की सुरक्षा को खतरा।
- उच्च शिक्षा में नामांकन के बावजूद छात्रों में उद्योग-अनुकूल कौशल का अभाव।
- ग्रामीण और शहरी साक्षरता के बीच 18 प्रतिशत से अधिक का अंतर।
- सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के रिक्त पद और युक्तिकरण की दोषपूर्ण नीति।
स्वास्थ्य और पोषण संबंधी चुनौतियां
- प्रजनन आयु की महिलाओं में एनीमिया (54.4 प्रतिशत) की व्यापकता में वृद्धि।
- बच्चों में कुपोषण के स्तर का चिंताजनक होना।
- ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी।
- शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर का अभी भी राष्ट्रीय औसत से अधिक होना।
- मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति सामाजिक वर्जना और सुविधाओं का अभाव।
आर्थिक डेटा का गहन विश्लेषण और क्षेत्रीय रुझानः-
राजस्थान की अर्थव्यवस्था का विस्तार केवल कुल आंकड़ों में नहीं, बल्कि इसकी क्षेत्रीय संरचना में निहित है। स्थिर कीमतों (2011-12) पर जीएसडीपी का विश्लेषण वास्तविक उत्पादन वृद्धि को दर्शाता है, जबकि वर्तमान कीमतें मुद्रास्फीति के प्रभावों को समाहित करती हैं।
राजस्थान के सकल राज्य मूल्य वर्धित का विस्तृत तुलनात्मक विश्लेषणः-
राजस्थान का कुल सकल राज्य मूल्य वर्धन (बुनियादी कीमतों पर) वर्ष 2023-24 के ₹14,28,385 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2024-25 में ₹15,65,000 करोड़ होने का अनुमान है। यह 9.56 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर को दर्शाता है, जो राज्य की आर्थिक स्थिरता और उत्पादन क्षमता में निरंतर सुधार का संकेत है।
सेवा क्षेत्रः- विकास का प्राथमिक चालक
सेवा क्षेत्र (जिसमें पर्यटन, आईटी और व्यापार शामिल हैं) ₹7,15,400 करोड़ के अनुमानित योगदान के साथ राज्य का सबसे बड़ा और सबसे तेजी से बढ़ने वाला खंड बना हुआ है।
11.23 प्रतिशत की इसकी उच्च वृद्धि दर यह स्पष्ट करती है कि राजस्थान का आर्थिक रूपांतरण ‘सेवा-उन्मुख’ अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ रहा है, जहाँ पर्यटन और डिजिटल सेवाओं का महत्व बढ़ रहा है।
कृषि क्षेत्र में लचीलापन और सुधार
कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन क्षेत्र में 10.74 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो ₹4,23,500 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। यह वृद्धि मुख्य रूप से खाद्यान्न उत्पादन में अपेक्षित 10.67 प्रतिशत की बढ़ोतरी और अनुकूल मानसूनी परिस्थितियों के कारण संभव हुई है। यह आंकड़ा सिद्ध करता है कि आधुनिक तकनीकों और सरकारी योजनाओं (जैसे मुख्यमंत्री बीज स्वावलंबन योजना) के माध्यम से कृषि क्षेत्र अभी भी राज्य की आय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
औद्योगिक क्षेत्रः- मध्यम वृद्धि और भविष्य की संभावनाएं
उद्योग क्षेत्र (खनन, विनिर्माण और ऊर्जा) की वार्षिक वृद्धि दर 5.77 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यद्यपि यह वृद्धि अन्य क्षेत्रों की तुलना में धीमी है, लेकिन ‘राइजिंग राजस्थान’ जैसे निवेश शिखर सम्मेलनों और नई औद्योगिक नीतियों (2024) के माध्यम से इस क्षेत्र में विविधीकरण की प्रक्रिया जारी है। 350 बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए विनिर्माण और खनन क्षेत्र की उत्पादकता को और बढ़ाना राज्य के लिए एक अनिवार्य रणनीतिक आवश्यकता है।
आंकड़ों से पता चलता है कि सेवा क्षेत्र न केवल सबसे बड़ा योगदानकर्ता है, बल्कि सबसे तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र भी है। उद्योग क्षेत्र की विकास दर (5.77 प्रतिशत) चिंता का विषय है, क्योंकि 350 बिलियन डॉलर के लक्ष्य के लिए विनिर्माण में दोहरे अंकों की वृद्धि की आवश्यकता है। कृषि क्षेत्र की 10.74 प्रतिशत की वृद्धि दर अच्छी वर्षा के कारण है, लेकिन यह उत्पादन में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील है।
राजकोषीय स्वास्थ्य और ऋण स्थिरताः-
राजस्थान की ऋण स्थिति एक गंभीर विश्लेषणात्मक बिंदु है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान का ऋण-से-जीएसडीपी अनुपात भारत के अधिकांश राज्यों की तुलना में अधिक है।
राजस्थान के राजकोषीय घाटे और ऋण के रुझान
राजकोषीय घाटा और वित्तीय समेकनः-
राजस्थान का राजकोषीय घाटा वर्ष 2021-22 के 3.8 प्रतिशत से बढ़कर 2022-23 में 4.3 प्रतिशत तक पहुँच गया था, जो औसत राज्यों की तुलना में काफी अधिक दर्ज किया गया। हालांकि, 2024-25 के बजट अनुमानों में इसे घटाकर 3.93 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखा गया है। यह दर्शाता है कि सरकार राजकोषीय अनुशासन की ओर बढ़ने और घाटे को जीएसडीपी की तुलना में नियंत्रित करने का प्रयास कर रही है।
राजस्व घाटा में सुधारः-
राजस्व घाटा, जो सरकार के दैनिक खर्चों और आय के बीच के अंतर को दर्शाता है, वर्ष 2022-23 के 2.3 प्रतिशत से घटाकर 2024-25 के बजट अनुमान में 1.4 प्रतिशत (₹25,758 करोड़) पर लाने का प्रस्ताव है। यह कमी राजस्व प्राप्तियों में सुधार और अनावश्यक प्रशासनिक व्यय पर नियंत्रण का संकेत देती है, जो पूंजीगत परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए अधिक धन उपलब्ध करा सकती है।
बढ़ता ऋण भारः-
राज्य का कुल बकाया ऋण एक गंभीर चिंता का विषय है। यह वर्ष 2021-22 के ₹4.58 लाख करोड़ से बढ़कर 2022-23 में ₹5.37 लाख करोड़ हो गया। 2024-25 के अग्रिम अनुमानों के अनुसार, यह ऋण बढ़कर ₹6.20 लाख करोड़ तक पहुँच सकता है। ऋण-से-जीएसडीपी अनुपात का 35.3 प्रतिशत (2022-23 में) के उच्च स्तर पर होना यह दर्शाता है कि राज्य की वित्तीय स्थिरता पर दबाव बढ़ रहा है और राजस्व का एक बड़ा हिस्सा ऋण के ब्याज भुगतान में खर्च हो रहा है।
विश्लेषणात्मक निष्कर्षः-
आंकड़ों का यह रुझान ‘‘राजकोषीय दुविधा‘‘ की स्थिति पैदा करता है। जहाँ एक ओर राज्य को 350 बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए बुनियादी ढांचे में भारी निवेश की आवश्यकता है, वहीं उच्च ऋण स्तर और घाटे की स्थिति इसे सीमित कर देती है। दीर्घकालिक स्थिरता के लिए राज्य को अपनी राजस्व आय बढ़ानी होगी और ऋण प्रबंधन के लिए ठोस रणनीति अपनानी होगी।
राजकोषीय घाटे में 2022-23 में 4.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी, जिसे 2024-25 में घटाकर 3.93 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, यह अभी भी 3 प्रतिशत की आदर्श सीमा से ऊपर है। ऋण स्थिरता विश्लेषण के अनुसार, यदि विकास दर में गिरावट आती है और प्राथमिक घाटा बना रहता है, तो ऋण का बोझ असहनीय हो सकता है।
प्रमुख क्षेत्रों का गहराई से विश्लेषण
कृषिः- पारंपरिक शक्ति और आधुनिक चुनौतियां
राजस्थान कृषि में राष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी है, विशेष रूप से मोटे अनाज और तिलहन में। 2024-25 में कुल खाद्यान्न उत्पादन 267.67 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 10.67 प्रतिशत अधिक है।
तिलहन उत्पादनः-
राज्य 96.17 लाख मीट्रिक टन तिलहन उत्पादन के साथ भारत का ‘तेल कटोरा‘ बना हुआ है, हालांकि सरसों के उत्पादन में प्रतिकूल मौसम के कारण 4.99 प्रतिशत की मामूली गिरावट देखी गई है।
पशुपालन और डेयरीः-
राजस्थान भारत के कुल दूध उत्पादन का 14.4 प्रतिशत और ऊन का 48 प्रतिशत उत्पादन करता है। बीकानेर जिला सहकारी डेयरी विकास में अग्रणी है।
सिंचाई की रणनीतिः-
मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान 2.0 के तहत ₹11,200 करोड़ की लागत से 5 लाख जल संचयन संरचनाएं बनाने का लक्ष्य है।
ऊर्जा क्षेत्रः अक्षय ऊर्जा क्रांति
राजस्थान अपनी भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए भारत के सौर ऊर्जा पावरहाउस के रूप में उभर रहा है। राज्य की कुल स्थापित क्षमता 26,325 मेगावाट तक पहुँच गई है।
सौर ऊर्जाः-
5,482 मेगावाट से अधिक की सौर क्षमता स्थापित है, और 1,25,000 मेगावाट का विशाल लक्ष्य निर्धारित किया गया है। पोंगल (बीकानेर) और बोडाना (जैसलमेर) में 50,000 मेगावाट के नए सौर पार्क स्थापित किए जा रहे हैं।
पवन ऊर्जाः-
अरावली के पश्चिमी ढलानों पर 4,414 मेगावाट पवन ऊर्जा का दोहन किया जा रहा है।
पीएम सूर्य घर योजनाः-
प्रत्येक जिले में ‘आदर्श सौर ग्राम‘ विकसित करने का प्रस्ताव है, जहाँ 2 किलोवाट तक के संयंत्रों के लिए 40 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा।
सामाजिक बुनियादी ढांचा: स्वास्थ्य और शिक्षा का परिदृश्य
स्वास्थ्य के क्षेत्र में राजस्थान ने ‘मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना‘ के तहत ₹25 लाख तक का कैशलेस उपचार प्रदान कर राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा प्राप्त की है।
स्वास्थ्य संकेतकः-
शिशु मृत्यु दर गिरकर 30.3 प्रति 1000 जीवित जन्मों पर आ गई है, और कुल प्रजनन दर 2.0 के स्तर पर पहुँच गई है, जो जनसंख्या स्थिरीकरण का संकेत है।
शिक्षा सुधारः-
स्कूल स्वास्थ्य स्क्रीनिंग कार्यक्रम ने 75 लाख छात्रों का डेटाबेस तैयार किया है। हालांकि, उच्च शिक्षा में ‘जेंडर पैरिटी इंडेक्स‘ अभी भी सुधार की प्रतीक्षा में है।
निष्कर्ष और नीतिगत सिफारिशें-
यह शोध विश्लेषण स्पष्ट करता है कि राजस्थान एक ‘‘दोहरी अर्थव्यवस्था‘‘ की चुनौती का सामना कर रहा हैः- एक ओर यह अत्याधुनिक सौर पार्क और आईटी हब बना रहा है, तो दूसरी ओर इसकी बहुसंख्यक आबादी जल-अभाव वाली कृषि में फंसी हुई है। 350 बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित रणनीतिक कदम अनिवार्य हैं—
- जल-तटस्थ औद्योगिक नीतिः- भविष्य के निवेश केवल उन्हीं क्षेत्रों में होने चाहिए जो ‘शून्य जल अपशिष्ट‘ मानकों का पालन करें। भूजल दोहन पर सख्त कानूनी नियंत्रण और ‘वाटर क्रेडिट‘ प्रणाली को लागू करना आवश्यक है।
- पूंजीगत व्यय में वृद्धिः- राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करते हुए, राज्य को राजस्व व्यय से हटकर पूंजीगत निर्माण (सड़कें, बांध, ऊर्जा भंडारण) की ओर निवेश मोड़ना होगा। विशेष रूप से ग्रामीण बुनियादी ढांचे में 2.1 प्रतिशत से बढ़ाकर 4 प्रतिशत तक पूंजीगत व्यय का लक्ष्य रखना चाहिए।
- कौशल और नवाचार पर केंद्रित शिक्षाः- ‘राइजिंग राजस्थान‘ के तहत हस्ताक्षरित एमओयू को वास्तविकता में बदलने के लिए स्थानीय कार्यबल को सेमीकंडक्टर, हरित हाइड्रोजन और एआई में प्रशिक्षित करना होगा।
- क्षेत्रीय समानता का मॉडलः- विकास को केवल जयपुर-भिवाड़ी बेल्ट तक सीमित न रखकर, आदिवासी और मरुस्थलीय क्षेत्रों में कृषि-प्रसंस्करण और पर्यटन आधारित लघु उद्योगों को भारी प्रोत्साहन देना होगा।
- अरावली और पर्यावरण संरक्षणः- अरावली की पहाड़ियों को ‘पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र‘ घोषित कर वहां हर प्रकार के खनन पर स्थायी रोक लगाना राज्य की जल सुरक्षा और जलवायु लचीलेपन के लिए अनिवार्य है।
राजस्थान की विकास यात्रा अब केवल ‘अस्तित्व‘ की लड़ाई नहीं है, बल्कि ‘उत्कृष्टता‘ की ओर एक छलांग है। यदि राज्य अपनी जल की बाधाओं और राजकोषीय दबावों को नवाचार और राजनीतिक इच्छाशक्ति के माध्यम से प्रबंधित कर लेता है, तो यह आने वाले दशक में भारत की विकास गाथा का सबसे चमकता सितारा बन सकता है।
संदर्भ ग्रंथ सूची-
- आर्थिक समीक्षा 2024-25 आर्थिक एवं सांख्यिकी निदेशालय, आयोजना विभाग, राजस्थान सरकार।
- राजस्थान राज्य बजट 2024-25- वित्त विभाग, राजस्थान सरकार
- नीति आयोग रिपोर्ट – राजस्थान का व्यापक आर्थिक परिदृश्य (2025)
- जल सुरक्षा और शासन सुधार प्रतिवेदन 2024-25- जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (च्भ्म्क्), राजस्थान सरकार।
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षणः- स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार।
- डॉ. लक्ष्मी नारायण नाथूरामका, ‘‘राजस्थान की अर्थव्यवस्था‘‘ च्यवन प्रकाशन, जयपुर, ३५वां संशोधित संस्करण (2025-26)।
- प्रो. वी.सी. मिश्रा, ‘‘राजस्थान का भूगोल‘‘ नेशनल बुक ट्रस्ट।
- औद्योगिक और संस्थागत शोध शोध ब्यूरो, ‘‘राइजिंग राजस्थानः अगले विकास पथ की ओर‘‘
- राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना (2024) मार्गदर्शिका
- राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना (2024) मार्गदर्शिकाः उद्योग और वाणिज्य विभाग, राजस्थान सरकार।
- पर्यावरण और सतत विकास
- राजस्थान पर्यावरण नीति और जलवायु परिवर्तन कार्ययोजनाः पर्यावरण और वन विभाग, राजस्थान सरकार।
- केंद्रीय भूजल बोर्ड वार्षिक रिपोर्ट 2024-25- जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार।
