| Dr. Alok Chauhan Astt. Prof. (Geography) School of Humanities & Social Sciences Vardhman Mahaveer Open University Kota (Rajasthan) | Rahul Singh Research Scholar (Geography) Vardhman Mahaveer Open University Kota (Rajasthan) |
Abstract
बारां जिले के किशनगंज एवं शाहबाद तहसीलों में निवास करने वाली सहरिया जनजाति की व्यवसायिक क्रियाओं का अध्ययन यह दर्शाता है कि आज भी यह जनजाति मुख्यतः कृषि मजदूरी, वनोपज संग्रहण तथा असंगठित श्रम कार्यों पर निर्भर है। अध्ययन में कुल 300 उत्तरदाताओं का सर्वेक्षण किया गया, जिसमें सर्वाधिक 60.6 प्रतिशत उत्तरदाता कृषि मजदूर के रूप में कार्यरत पाए गए, जबकि केवल लगभग 10 प्रतिशत परिवारों के पास सीमित कृषि भूमि उपलब्ध है। निजी क्षेत्र में रोजगार प्राप्त करने वाले उत्तरदाताओं का प्रतिशत 11.6 पाया गया, जबकि सरकारी नौकरी में केवल 3 प्रतिशत लोग कार्यरत हैं। अध्ययन से ज्ञात हुआ कि वनोपज संग्रहण सहरिया समुदाय का पारंपरिक व्यवसाय रहा है, जिसमें तेंदूपत्ता, महुआ, गोंद, शहद तथा जड़ी-बूटियों का संग्रहण प्रमुख है। किन्तु वन क्षेत्रों में कमी, सरकारी प्रतिबंधों तथा उचित मूल्य न मिलने के कारण यह व्यवसाय कमजोर होता जा रहा है। वर्तमान में केवल 4 प्रतिशत उत्तरदाता वनोपज संग्रहण से जुड़े पाए गए। पशुपालन भी इनकी आजीविका का सहायक साधन है, जिसमें बकरी पालन और मुर्गी पालन प्रमुख हैं। अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के सीमित अवसर होने के कारण सहरिया समुदाय का बड़ा भाग प्रवास के लिए विवश है। लगभग 52.4 प्रतिशत उत्तरदाता रोजगार, अधिक मजदूरी, शिक्षा एवं विवाह जैसे कारणों से अन्य क्षेत्रों में प्रवास करते हैं। गैर-कृषि मजदूरी के अंतर्गत ईंट-भट्टों, पत्थर खदानों, निर्माण कार्यों तथा औद्योगिक क्षेत्रों में श्रम कार्य प्रमुख हैं। आर्थिक स्थिति के विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि अधिकांश परिवार निम्न एवं मध्यम आय वर्ग में आते हैं। अधिकांश परिवारों की मासिक आय 6000 से 8000 रुपये तथा वार्षिक आय 20000 से 40000 रुपये के मध्य पाई गई। शिक्षा की कमी, सीमित संसाधन, भूमिहीनता, वन संसाधनों में कमी तथा रोजगार के अभाव के कारण सहरिया जनजाति की आर्थिक स्थिति अभी भी कमजोर बनी हुई है। अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया कि इस समुदाय के सामाजिक-आर्थिक विकास हेतु रोजगार सृजन, कौशल विकास, शिक्षा विस्तार तथा सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
