भारत में केन्द्र राज्य सम्बन्ध – संघवाद का बदलता स्वरूप के सन्दर्भ में एक अध्ययन

कैलाश चन्द यादव
सहायक आचार्य (राजनीति विज्ञान)
राजकीय महाविद्यालय अटरू एवं
शोधार्थी राजकीय महाविद्यालय, बूंदी
कोटा विश्वविद्यालय, कोटा

शोध सारांश

यह शोध पत्र मुख्यतः भारतीय संघवाद के सैद्धान्तिक व व्यावहारिक विश्लेषण पर केन्द्रित है। शोध पत्र में संघवाद के आधारभूत सिद्धान्तों के परिप्रेक्ष्य में भारतीय संघवाद के विश्लेषण का प्रयास किया गया है। साथ ही इसके बदलते स्वरुप की व्याख्या की गई है। भारत में संघवाद केन्द्रीकृत संघवाद से लेकर सहकारी संघवाद तक के सफर के रूप में उभरा है। पिछले चार दशकों में (लगभग 90 का दशक प्रारम्भ होने से पहले तक) भारतीय संघवाद में जबरदस्त केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति देखी गई। ये बात सही है कि भारतीय संविधान आपातकाल में संघ को अत्यधिक शक्तिशाली बना देता है किन्तु सामान्य स्थिति में ऐसी कोई बात नहीं कहता है। आरम्भिक वर्षों में केन्द्र सरकार ने ऐसे कई तरीकों का प्रयोग किया जिससे राज्यों के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण हुआ। संघवाद का स्वरूप बदलता जा रहा है जिसका कारण बदलती परिस्थिति है। संघवाद के बदलते स्वरूप का आध्ययन वर्तमान परिप्रेक्ष्य के लिहाज से उपयुक्त प्रतीत होता है।

बीज शब्द- केन्द्र राज्य सम्बन्ध, संघवाद, सहकारी संघवाद, प्रतिस्पर्धी संघवाद, वित्तीय संघवाद, असममित संघवाद, नीति आयोग, लोकतंत्र।

प्रस्तावना

संघीय शासन व्यवस्था कास जन्मदाता संयुक्त राज्य अमेरिका है 13 इकाईयों ने मिलकर यूरोपिय ताकातों से लड़ने तथा अपना विकास करने के लिए संघ बनाया जिसे संयुक्त राज्य अमरिका नाम दिया आज संयुक्त राज्य अमेरिका में 50 इकाईयां है संयुक्त राज्य अमरिका का संघ साथ आकर संघ बनाने का उदाहरण है। अमेरिका की संघीय शासन व्यवस्था को नजीर मानकर दुनिया के अनेक देशों ने भी अपनी सुविधानुसार और आवश्यकतानुसार बदलाव कर संघीय व्यवस्था को अपनाया। भारत संघ साथ रहकर संघ बनाने का उदाहरण है। भारतीय संघ प्रशासिनक सुविधा के लिए बनाया गया है भारत संघ में 28 राज्य और 8 केन्द्र शासित प्रदेश है।

शोध प्रविधि

प्रस्तुत शोध कार्य में ऐतिहासिक विश्लेषणात्मक और अनुभावनात्मक अध्ययन पद्दति का प्रयोग किया गया है। सहकारी संघवाद से सम्बन्धित पुस्तकों और जर्नल का अध्ययन किया गया है। संघवाद के सन्दर्भ में विभिन्न आयोगों और समितियों की रिपोर्ट का अध्ययन किया गया है। जैसे सरकारिया आयोग, पूंछी आयोग आदि। संघवाद के बदलते रूपों के अध्ययन के लिए विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं का अध्ययन किया है। इस प्रकार ज्यादातर तथ्य द्वितीयक स्त्रोतों से एकत्रित कर विश्लेषण किया गया है।

शोध का उद्देश्य

भारत में संघवाद की पृष्ठभूमि, महत्त्व आवश्यकता और चुनौतियों का पता लगाना तथा विशेष रूप से संघवाद के बदलते स्वरूपों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करना और इस आधार पर निष्कर्ष एवं सुझाव प्रस्तुत करना। संघवाद के परिवर्तित होते सिद्धांतों ने भारतीय संघवाद को समझना, गठबंधन सरकारो के युग में संघवाद के विकास को समझना और संघवाद पर विभिन्न कारकों का पडने वाले प्रभावों को समझना।

शोध समीक्षा

1 “भारत में सहकारी संघवाद एक संवैधानिक वास्तविकता या एक मिथक”

पवन प्रिति सिंह, लेक्स फोर्टी, लीगल जर्नल, वोल्यू 1 आईएसएसएन-25822942

इस शोधपत्र में लेखक ने भारत में सहकारी संघवाद के में संविधान में क्या उपबंध है और इन उपबंधों के तहत सहकारी संघवाद किस स्तर तक स्थापित हो पाया है एवं इसके साथ ही सहकारी संघवाद का भारत में इतिहास क्या रहा है बताया गया है तथा लेखक के अनुसार भारत में सहकारी संघवाद की भावना निम्नलिखित द्वारा देखी जा सकती है।

(1) शक्तियों का वितरण (2) संविधान की सर्वोच्चता (3) एक लिखित संविधान (4) कठोरता और (5) न्यायालयों का अधिकार एवं केन्द्र राज्यों और स्थानीय स्तरो के बीच संबंध भारत की राष्ट्रीयता के भावना के केन्द्र में बताया है

2. “केन्द्रीयकृत संघवाद का विरोधाभास भारत की संघीय ढांचे की चुनौतियों का विश्लेषण”

अबर कुमार घोष, ओआरएफ जर्नल, आईएसबीएन 9788194778394, कोलकाता

इस शोधपत्र में लेखक द्वारा केन्द्रीकृत संवाद का विरोधाभास एवं इसके समक्ष चुनौतियों को बताया है भारतीय संघवाद का मॉडल दुनिया का अनोखा मॉडल है जिसकी विशेषता विरोधामास से है जिसकी शुरूआत केन्द्रीकृत संघवाद से होती है कि किस प्रकार भारतीय राजनीति की केन्द्रीकृत संवैधानिक व्यवस्था के बावजूद इनमें से प्रत्येक चरण में प्रचलित राजनीति कारकों ने भातीय संघीय विमर्श को मजबूत करने का काम किया है इस पेपर में समय के साथ विभिन्न राजनीतिक कारको द्वारा आकारित भारतीय संघ प्रतिक्रिया के विभिन्न पेटर्न पर प्रकाश डालता है और भारत के संघीय ढांचे को मजबूत करने के लिए सिफारिशे प्रदान करता है।

3. “कोविड-19 महामारी के दौरान भारत में सहकारी संघवाद”

प्रकाशचन्द्र झा. आईआईपीए, 68 (2) 245-256.2022 रिप्रिंट एण्ड परमिशन्स सेज पब्लिकेशन्स इस लेख में भारत में कोविड 19 महामारी की चुनौतियों और आर्थिक संकट एवं बड़े पैमाने पर मानव प्रवासन जैसे प्रभावों से निपटने में सहकारी संघवाद की भूमिका का परीक्षण किया गया है महामारी प्रतिक्रिया के प्रारंभिक चरणों में भारतीय संघीय ढांचे में एकात्मक झुकाव को उजागर किया है। इस संकट के बाद के चरणों में सहकारी संघवाद भी दिखाई देता है फिर भी राज्यों के मध्य सहयोग की कमी और इस उद्देश्य के लिए किसी भी अन्र्तसरकारी एजेन्सी को शामिल किए बिना क्षैतिज संघवाद को सुविधाजनक बनाने में केन्द्र की विफलता ने प्रवासी श्रमिको के जीवन को दयनीय बना दिया तथा महामारी ने भारत के जमीनी स्तर के महत्व को सामने ला दिया।

4. महेन्द्र प्रसाद सिंह “फेडरलिज्म इन इंडिया’ सेज पब्लिकेशन्स, प्राइवेट लिमिटेड, फर्स्ट एडिशन, आईएसएसएन 9789354790096,25 जनवरी 2022

इस पुस्तक में लेखक द्वारा भारत में संघवाद के वैश्विक तुलनात्मक परिपेक्ष्य के साथ भातीय संघीय व्यवस्था का एक व्यापक नवसंस्थागत विश्लेषण प्रस्तुत करता है राष्ट्रमंडल संसदीय संघीय मॉडल के एक प्रकार के रूप में शुरूआत करते हुए भारत ने अपनी अनूठी विशेषताओं को अपनाया है और साथ ही साथ ऐसा पाठ्यक्रम भी तैयार किया है जो कुछ मानको में इसे कनाडा और आस्ट्रेलिया जैसे राष्ट्रमंडल देशो से विशेष रूप से अलग करता है भारतीय संघीय प्रणाली को समझने और उसका विश्लेषण करने के लिए यह पुस्तक उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी युरोप, एशिया और अफ्रीका में सरकार के संघीय रूप की उत्पत्ति और पदचिह्नों की जांच करती है। यह इतिहास और समकालीन राजनीति में इसकी उत्पत्ति पर चर्चा करती है।

5. रेखा स्क्सेना, “न्यू डायमेन्शन इन फेडरल डिस्र्कोस इन इंडिया ४, रोटलेंड इंडिया पब्लिकेशन, आईएसबीएन 9781032045818, 21 दिसम्बर 2022

इस पुस्तक में लेखिका के द्वारा भारत में संघवाद के अध्ययन में अब अनसुलझे आयामो की पडताल की गई है। यह स्वतंत्रता और विशेष रूप से आर्थिक उदारीकरण के बाद से भारतीय संघवाद में निरन्तरता और परिवर्तन का पता लगाया है। 1990 के दशक में बहुदलीय प्रणाली, गठबंधन सरकारों के उदद्भव, न्यायिक स्वभाव में बदलाव और अर्थव्यवस्था के निजीकरण और वैश्वीकरण की शुरुआत के कारण भारत में अधिक से अधिक संघीकरण की ओर रुझान रहा है हालांकि 2014 से गठबंधन सरकार में एक दल के बहुमत के संदर्भ में भारतीय संघवाद में नए पहलू सामने आये है। यह पुस्तक संघवाद के कई पहलुओं के बारे में बताती है जैस प्रशासनिक संघवाद, पर्यावरणीय और संसाधन संघवाद, राजकोषीय संघवाद की बदलती गतिशीलता और बहुस्तरीय शासन आदि इस पुस्तक में विभिन्न राज्यों के तुलनात्मक और केशस्टडीज के साथ यह अनुच्छेद 356 और इसके सहित कई मुद्दों का विवेचन करती है।

भारत में संघवाद और उसका बदलता स्वरूप

संघवाद/पारम्परिक संघवाद: संघवाद शब्द एक राष्ट्र में सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच शक्तियों के विवरण को दर्शाता है। संघवाद लैटिन भाषा के शब्द फोएड्स से बना है। जिसका अर्थ है संधि या समझौता। भारत के संविधान के अग्रेजी संस्मरण फेडेरल शब्द के स्थान पर यूनियन शब्द का प्रयोग किया गया है। भारत के संविधान में संघवाद का वर्णन इन शब्दों में किया गया है।

अनुच्छेद-1

(1) भारत अर्थात इण्डिया राज्यों का संघ (यूनियन) होगा।

(2) राज्य और उनके राज्य क्षेत्र वे होगें जो पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट है। देश को प्रशासनिक सुविधा के लिए प्रान्तीय उपईकाईयों में विभाजित किया गया है। भारत में छोटी इकाईयां मिलकर राष्ट्र का निर्माण करती है। भारत के संघीय ढांचे के प्रति एक अन्र्तनिहित पूर्वाग्रह है कि भारत का संविधान पूर्ण रूप से संघीय नहीं है। संविधान निर्माताओं का मानना था कि देश को राजनीतिक रूप से सुदृद्ध बनाने के लिए संघ को राज्य की तुलना में अधिक अधिकार देने होगें। संघवाद के भारतीय मॉडल में सरकार के दो स्तर है-(1) संघ या केन्द्र सरकार (2) राज्य या प्रान्तीय सरकार

डॉ० भीमराव अम्बेडकर के अनुसार “शान्ति काल में भारतीय संविधान संधीय (फेडेरल) तथा आपात काल के दौरान एकात्मक (यूनियन) हो जाता है।”

डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने कहा है व्यक्तिगत रूप से इस बात को कोई महत्व नहीं देता कि आप इसे संधीय संविधान या एकात्मक अन्यथा किसी अन्य नाम से पुकारते हैं यदि संविधान हमारे उद्देश्यों को पूरा करता रहे तो नाम से कोई फर्क नहीं पड़ता। मोरिस जोन्स के अनुसार भारत में सौदेबाजी संघवाद है। केसी व्हीयर के अनुसार भारत मुख्यतः एकात्मक संघ है जिसमें संघीय विशेषताएं नाम मात्र की है। भारत का संविधान संघीय कम है और एकात्मक अधिक है अर्थात अर्द्ध संघात्मक है।” नार्मन डी० पामर के अनुसार ‘भारतीय संघीय व्यवस्था प्रशासनिक संघ है। क्योंकि संकट काल में केन्द्र का राज्यों पर प्रशासनिक नियत्रंण स्थापित हो जाता है।

सर आईवर जेनिग्स ने कहा है “भारत ऐसा संघ है जिसमें केन्द्रीकरण की तीव्र प्रवृति पाई जाती है।” इस प्रकार भारत में एक केन्द्रीयकृत संघवाद है। जिसमें जब भी केन्द्र व राज्यों के बीच हितों का टकराव होता है तो केन्द्र का पलड़ा भारी रहता है।

भारतीय संघ में संघात्मक व्यवस्था की विशेषताएँ:-

(1) दो सरकारे

(2) शक्तियों का विभाजन

(3) लिखित संविधान

(4) संविधान की सर्वोच्चता

(5) संविधान की कठोरता

(6) स्वतंत्र न्याय पालिका एवं न्यायिक समीक्षा

(7) संसद के दो सदन उच्च सदन राज्य सभा राज्यों का सदन

भारत में संघवाद के फायदे:-

1. विविधता का सम्मान व अखण्डता की रक्षा

2. सत्ता का विकेन्द्रीकरण

3. प्रयोग व नवाचार

4. समन्धित विकास और प्रगति

भारत में बदलती हुई परिस्थितियों के साथ पारम्परिक संघवाद का बदलता स्वरूप या आधुनिक संघवाद संघवाद के ढांचे को बरकरार रखते हुए संघवाद ने कई नई विशेषताओं को अपनाया है। भारत के संघवाद के बदलते या नवीन मॉडल इस प्रकार हैं-

(1) सहकारी संघवाद यह मॉडल केन्द्र व राज्यों के बीच सहयोग व समन्वयन पर जोर देता है।

यह मॉडल विभिन्न योजना व परियोजनाओं में सयुक्त प्रयासों को प्रोत्साहित करता है।

ग्रेनविल आस्ट्रिन ने कहा है भारत की विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संविधान सभा में विशिष्ट प्रकार के संघवाद को जन्म दिया है। यह है भारत में सहकारी संघवाद भारत नई दिल्ली नहीं है बल्कि राज्यो की राजधानियाँ भी है। राज्य केन्द्रीय सहायता के आकांक्षी है किन्तु राज्यों के सहयोग के बिना संघ बहुत दिनों तक कायम नहीं रह सकता। डाइसी का मानना है “शक्तियों का विभाजन सहकारी संघवाद का आवश्यक

लक्षण है. एक संघीय राष्ट्र जिस उद्‌देश्य से बनाया जाता है वह राष्ट्रीय सरकार पृथक राज्य के बीच सत्ता का विभाजन करता है।”*

भारत में राज्यों की सहायता के बिना केन्द्रीय सरकार अपनी योजनाओं का कियान्वयन नहीं कर सकती, दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं। गठबन्धन सरकारों ने केन्द्र व राज्यों के बीच जो खाई होती है उसे पाटने का काम किया है। सहकारी संघवाद की अवधारणा देश की एकता, अखण्डता, और बंधुत्व के लिहाजा से बहुत उपयुक्त प्रयुक्त होती है।

भारत में सहकारी संघवाद की विशेषताएँ

(1) साझेदारी व सहयोग

(2) संसाधनों का साझा उपयोग

(3) संघवाद व परामर्श

(4) समाधान उन्मुक्त दृष्टिकोण

भारत में सहकारी संघवाद के फायदे-

(1) समन्वित विकास

(2) संसाधनों का अधिकतम उपयोग

(3) नीति निर्माण में सुधार

(4) संकट प्रबंधन में सुधार

(5) प्रशासनिक दक्षता

(6) पारदर्शिता व जवाब देही

(7) नवाचार व सुधार

(8) स्थानीय आवश्यकताओं का ध्यान

(9) आर्थिक सन्तुलन

भारत में सहकारी संघवाद के समक्ष चुनौतियाँ:-

1. राजनीतिक मतभेद

2. संसाधनों का असमान वितरण

3. कार्यान्वयन में कठिनाई

इस प्रकार सहकारी संघवाद एक समन्धित प्रशासनिक व्यवस्था है। जिसमें केन्द्र राज्यों के सहयोग के द्वारा राष्ट्र का शांतिपूर्ण स्थित्तियों में समन्विल विकास होता है। भारत में 1990 के दशक से सहकारी संघवाद का प्रभावी विकास हुआ।

(2) प्रतिस्पर्धी संघवाद :-

यह संघीय शासन प्रणाली का एक आधुनिक दृष्टिकोण है। जिसमें विभिन्न संघीय इकाईयों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया जाता है। यह प्रतिस्पर्धा कई क्षेत्रों में हो सकती है। जैसे आर्थिक विकास, निवेश आकर्षित करना, बेहतर शासन प्रदान करना आदि।

प्रतिस्पर्धी संघवाद की विशेषताएँ:-

(1) स्वतंत्रता एवं नवाचार- विभिन्न प्रान्त अपने तरीके से नीति एवं कार्यक्रम को लागू करने के लिए स्वतंत्रता रखते है। यह नवाचार को बढ़ावा देती है।

(2) सम्पूर्ण विकास- प्रतिस्पर्धा के माध्यम से राज्य या प्रान्त अपने विकास के लिए अधिक प्रयास करते है। इससे सम्पूर्ण देश का विकास होता है।

(3) उत्तरदायित्व- जब राज्य या प्रान्त एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते है तो नागरिकों के प्रति उनकी जवाबदेही बढ़ जाती है और उन्हें बेहतर सेवाएँ और शासन प्रदान करना होता है।

(4) संसाधानों का कुशल उपयोग- प्रतिस्पर्धा राज्य या प्रान्तों को अपने संसाधनों का अधिक कुशल और प्रभावी उपयोग करने के लिए प्रेरित करती है।

(5) नीतिगत विविधता- विभिन्न प्रान्त अपने लिए अलग- अलग नीतियां लागू करते है। हम उनके परिणामों का अध्ययन कर सकते है। जिससे पूरे देश के लिए सर्वोत्तम नीतियों की पहचान की जा सकती है।

भारत में प्रतिस्पर्धी संघवाद का उदाहरण राज्यों के बीच विकासात्मक सूचकांकों में प्रतिस्पर्धा, नीति आयोग द्वारा राज्यों की रैंकिंग और विभिन्न केन्द्रीय योजनाओं में राज्यो को प्रदर्शन आधारित वित्तीय सहायता के रूप में देखा जा सकता है। प्रतिस्पर्धी संघवाद एक देश को अधिक प्रगतिशील, नवाचारी और उत्तरदायी संघीय ढांचे की ओर ले जाता है। जहां विभिन्न इकाईयां एक दूसरे से सीखकर और प्रतिस्पर्धा करके आगे बढ़ती है।

प्रतिस्पर्धी संघवाद के फायदे

(1) बेहतर सेवाओं का वितरण

(2) आर्थिक विकास

(3) सरकारी दक्षता में सुधार

(4) उत्तरदायित्व व पारदर्शिता

(5) नवाचार और सुधार

(6) स्थानीय जरूरतों के अनुसार नीतियों

(7) विविधता का सम्मान

(8) नागरिको की सन्तुष्टि

प्रतिस्पर्धी संघवाद के समक्ष चुनौतियाँ-

(1) कमजोर राज्यों के लिए असमानता

(2) संसाधनों का असमान वितरण

(3) राजकोषीय असन्तुलन

जैसे मारत में ईज ऑफ डुईंग बिजनेस (ease of doung beesines) और अन्य प्रतिस्पर्धात्मक पहल है।

3. वित्तीय संघवाद

वित्तीय संघवाद ऐसी प्रणाली है जिसमें विभिन्न स्तरों की सरकारों के बीच वित्तीय शक्तियों एवं जिम्मेदारियों का वितरण होता है। इसका मुख्य उद्देश्य होता है कि वित्तीय संसाधनों का कुशल व न्याय संगत वितरण हो ताकि समग्र राष्ट्रीय विकास हो सके। वित्तीय संघवाद केन्द्र व राज्यों के मध्य वित्तीय राजस्व संग्रहण और न्याय के अधिकारों को स्पष्ट रूप से प्रभावित करता है। वित्तीय संसाधनों के वितरण और प्रबंधन को सन्तुलित और न्याय संगत बनाने का प्रयास करता है।

वित्तीय संघवाद की विशेषता

(1) राजस्व का विभाजन वित्तीय संघवाद में केन्द्र व राज्यों के बीच राजस्व स्त्रोतों का स्पष्ट विभाजन होता है। यह विभाजन संविधान या अन्य कानून के माध्यम से किया जाता है।

(2) वित्तीय स्वायतता राज्य सरकारों को वित्तीय स्वायतता दी जाती है ताकि वे अपने आर्थिक संसाधनो का प्रबंधन कर सके और अपनी आवश्यकतानुसार व्यय कर सके।

(3) अनुदान व वित्तीय सहायता केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को विभिन्न विकासात्मकयोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता और अनुदान प्रदान करती है।

(4) वित्त आयोग वित्तीय संघवाद के प्रभावी संचालन के लिए वित्त आयोग का गठन किया जाता है। जो केन्द्र राज्यों के मध्य वित्तीय संसाधनों का वित्तरण, उपयोग की समीक्षा और वित्तीय सन्तुलन का कार्य करता है।

भारत में वित्तीय संघवाद का संचालन संविधान द्वारा निर्धारित प्रावधानों पर आधारित होता है। हर पांच साल में वित आयोग का गठन किया जाता है। जो केन्द्र व राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के वितरण की सिफारिश करता है। इसके अलावा नीति आयोग भी केन्द्र राज्यों के मध्य वित्तीय समन्यय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

वित्तीय संघवाद के लाभ

(1) न्याय संगत संसाधन वितरण

(2) वित्तीय उत्तरदायित्व

(3) समन्धित विकास

(4) स्थानीय आवश्यकताओं का समाधान

(5) आर्थिक स्थिरता

वित्तीय संघवाद के समक्ष चुनौतिया :-

(1) वित्तीय असमानता

(2) केन्द्र-राज्य विवाद

(3) राजस्व संग्रहण में कठिनाई

(4) वित्तीय प्रबंधन की कमी

4. असममित संघवाद

इन तीनों प्रकारों के अलावा असममित संघवाद और होता है जिसमें विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों को उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर अलग-2 स्तर की स्वायतता प्रदान करते है। राज्यों को संवैधानिक प्रावधानों के तहत विशिष्ट अधिकार व शक्तियां प्रदान की जाती है। इसमें क्षेत्रीय असमानता दूर होती है। राज्यों की विशिष्ट आवश्यकताओं का समाधान हो जाता है। संवेदनशील क्षेत्र में स्थिरता व सन्तुलन स्थापित होता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत् जम्मू कश्मीर को विशेष स्वायत्तता प्रदान की गई जिसे 2019 में समाप्त भी कर दिया और अनुच्छेद 371 के तहत् पूर्वोत्तर के राज्यों को विशेष अधिकार प्रदान किए गए। इसके अलावा दिल्ली पुडुचेरी संघशासित प्रदेशों को विशेष अधिकार प्रदान किये। इस प्रकार की व्यवस्था से राज्यों के बीच असमानता की भावना राजनीतिक व प्रशासनिक जटिलता तथा संवैधानिक विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

संघवाद के बदलते स्वरूप के कारण-

संघवाद एक गतिशील प्रणाली है जो समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। संघवाद के स्वरूप में बदलाव के कई कारण हो सकते है जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और कानूनी कारकों पर निर्भर करते हैं।

आर्थिक कारक आर्थिक सुधार, उदारीकरण और वैश्वीकरण के कारण संघवाद के स्वरूप में बदलाव आया है। विकास और प्रतिस्पर्धा ने भी संघवाद को परिवर्तित किया है। आज राज्य अपने विकास के लिए केन्द्र के साथ मिलकर कार्य कर रहे है। 2014 में भाजपा के गठबंधन में भी पूर्ण बहुमत के साथ आने के बाद नरेन्द्र मोदी ने सहयोग आधारित संघवाद को राज्यों के सशक्तीकरण के लिए आवश्यक बताया था। नरेन्द्र मोदी ने इस दिशा में सकारात्मक प्रयास भी किये। राज्यों के सशक्तिकण हेतु केन्द्रीकरण पर आधारित योजना आयोग के स्थान पर 2015 में नीति आयोग बनाया। वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू किया गया जिसके माध्यम से अप्रत्यक्ष करों के बटवारे में केन्द्र व राज्य की समान भागीदारी हो सके। केन्द्र सरकार ने 14 वें वित आयोग की सिफारिश स्वीकार कर केन्द्रीय पूल में से राज्यों को 32 प्रतिशत के स्थान पर 42 प्रतिशत हिस्सा दिया।

सामाजिक और सास्कृतिक बदलाव

सामाजिक आन्दोलन व नागरिक संगठनों की भूमिका ने भी संघवाद के स्वरूप में बदलाव किया है। ये संगठन सामाजिक न्याय, समानता और अधिकारों की मांग करते हैं। सांस्कृतिक व भाषायी विविधता मी संघवाद के स्वरूप को प्रभावित करती है जैसे पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक भाषाई विविधता के कारण उनको विशेष अधिकार प्रदान किये गये।

राजनीतिक और संवैधानिक विकास

संवैधानिक संशोधन, राजनीतिक दलों की भूमिका व प्रभाव, गठबंधन सरकार व पूर्ण बहुमत्त की सरकार आदि भी संघवाद के स्वरूप को प्रभावित करते हैं। भारत में संवैधानिक संशोधन तथा गठबंधन सरकारों के युग में संघवाद ज्यादा मजबूत हुआ है। साथ में भाजपा ने भी बहुत से विपक्षी, दलों को राष्ट्रीय हित के नाम पर अपने नीतिगत निर्णयों जैसे विमुद्रीकरण, अनु० 370 की समाप्ति आदि के लिये सहमत कर लिया है। विपक्षी दली के इस रवैये ने भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय संघवाद की शुरूआत की है।

कानून और न्यायिक प्रभाव

उच्चतम व उच्च न्यायालय के निर्णयों ने भी संघवाद के स्वरूप के बदलाव में भूमिका निभाई है। संवैधानिक मुद्दों ने केन्द्र राज्य सबन्धों को प्रभावित किया है। कानूनी सुधार व नये कानूनों के द्वारा विभिन्न सरकारी स्तरों के अधिकारों व कर्तव्यों को परिभाषित किया है।

वैश्वीकरण व अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव

वैश्वीकरण, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार ने भी केन्द्र राज्य सम्बन्धों को प्रभावित किया है। वर्तमान केन्द्र व राज्य सरकारे वैश्विक परिवर्तित परिदृश्य के अनुरूप अपनी नीतियां बदलती है। अन्तर्राष्ट्रीय संधि व संगठनों का प्रभाव भी संघवाद पर पड़ता है केन्द्र व राज्य सरकारे अन्तर्राष्ट्रीय मानकों और समझौतों के अनुसार अपनी नीतियों को समायोजित करती है।

प्रौद्योगिकी और सूचना

तकनीकि प्रगति, डिजिटल गवर्नेन्स व ई गवर्नेन्स और सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग से प्रशासनिक प्रक्रियाओं में परिवर्तन हुआ है। सूचना व मीडिया विशेष रूप से सोशल मिडिया के प्रसार ने नागरिकों की जागरूकता बढ़ाई हैं जिससे सरकारों पर अधिक पारदर्शिता व जवाबदेही के लिए दबाव बढ़ता है इससे संघवाद का स्वरूप प्रभावित होता है।

अन्य कारक

कोविड 19 जैसी महामारी ने भी संघवाद के स्वरूप को प्रभावित किया है। महामारी से निपटने के लिए राज्य सरकारों ने ग्राउण्ड लेवल पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालाकि स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है फिर भी केन्द्र सरकार ने स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने में एक समन्वयक की तरह कार्य किया। केन्द्र-राज्य सरकारो के मिले-जुले प्रयासों से कोविड-19 जैसी महामारी से लड़ने में सफल रहे।

शोध समस्या –

वर्तमान में संघयाद एक जटिल दौर से गुजर रहा है। अलग- अलग राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकार, केन्द्र में कमी बहुमत कभी गठबंधन की सरकार होने के कारण केन्द्र राज्यों में सहयोग नहीं हो पता जिससे संघवाद कमजोर होता प्रतीत होता है। संघवाद के सामने अनेक समस्याएँ हैं।

  1. अति केन्द्रीकरण भारत संघ सरकार के हाथों में राज्यों की अपेक्षा अधिक शक्तियाँ देता है। केन्द्र के कई नियम व योजनायें राज्यों को भेदभावपूर्ण लगते हैं। राज्य और केन्द्र के बीच टकराव उत्पन्न होता है।
  2. क्षेत्रवाद भारत एक विविधतापूर्ण देश है जहाँ अनेक संस्कृतियां, बोलियाँ एवं परम्पराएं है, जो क्षेत्रवाद को मजबूत करती है, जिससे क्षेत्रवाद की भावना प्रबल होती है और यह ही अलगाववाद को जन्म देती है” आर्थिक स्त्रोत कम है और मांगो में निरंतर वृद्धि हो रही है मांग और उत्पादन में अंतर का एक प्रमाव यह है कि व्यक्तित्व समुदाय, वर्ग और क्षेत्र सभी स्तरों पर प्रतिस्पर्धा होती है।”*
  3. राष्ट्रपति शासन केन्द्र व राज्यों के बीच टकराव का एक कारण राष्ट्रपति शासन भी है। केन्द्र द्वारा अपने विपक्षी दल की सरकार वाले राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाकर केन्द्र द्वारा राज्य सरकार को भंग करने और सत्ता को अपने हाथों में लेने के लिए राष्ट्रपति शासन के तहत शक्तियों का दुरुपयोग करने की कोशिश की जाती है।
  4. कराधान वित्त हमेशा से ही राज्य और केन्द्र के बीच विवादास्पद मुद्दा रहा है। केन्द्र द्वारा भेदभावपूर्ण नीति इसका कारण है।
  5. एक समान दृष्टिकोण– केन्द्र नीतियां बनाते समय भारत की विविधता को ध्यान में रखने में विफल रहता है भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एक समान नीतियों इतनी प्रभावशाली नहीं होती।
  6. राज्यपाल की भूमिका– केन्द्र राज्य संबंधो में राज्यपाल की अहम भूमिका होती है लेकिन राज्यपाल के पदावधि, योग्यता एवं नियुक्ति के संबंध में संविधान में कुछ उपबंध न होने के कारण केन्द्र सरकार द्वारा राज्यपाल को एक मोहरे के रूप में प्रयोग किया जाता है जो केन्द्र राज्य संबंध को प्रभावित करता हैं। सरकारिया आयोग ने राज्यपाल के निश्चित कार्यकाल, योग्यता एवं नियुक्ति के संदर्भ में संविधान में उपबंध करने की सिफारिश की थीं
  7. नदी जल विवाद– केन्द्र राज्य संबंधो में नदी जल को लेकर भी समस्याएँ उत्पन्न होती है जिसके कारण केन्द्र का हस्तक्षेप स्वाभाविक हो जाता है इससे केन्द्र राज्य संबंध प्रभावित होते है।
  8. अलगाववाद की समस्या– केन्द्र राज्य संम्बधों में अलगाववाद भी एक समस्या है जैसे इन्दिरा गांधी के समय में पंजाब में उठी समस्या एवं अभी हाल में कुछ राज्यों में नए राज्य बनाने की मांग एवं क्षेत्रीयता की बढ़ती भावना केन्द्र राज्य संम्बंधों को प्रभावित करती है।

संघवाद के सुदृढीकरण हेतु कारक-

  1. अन्तर्राज्य परिषद् अनुच्छेद 263 के अनुसार इस परिषद् की स्थापना की गई जिससे राज्यों के मध्य आपसी सहयोग बढ़ सके।
  2. क्षेत्रीय परिषदें-
  3. राष्ट्रीय एकता परिषद्-
  4. नीति आयोग स्थापना 1 जनवरी 2015, आयोग की एक गवर्निंग कौंसिल है जिसमें सभी राज्यों प संघ के मुख्यमंत्री तथा उपराज्यपाल है। आयोग सहकारी संघवाद को बढावा देगा। आयोग पॉलिसी थिंक टैंक का कार्य करेगा। इसमें विभिन्न क्षेत्र के विशेषज्ञ होगें, जो राष्ट्र के सामाजिक व आर्थिक विकास के लिए राज्यों के साथ मिलकर नीतियां बनाएंगें। नीति आयोग राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय महत्व के विभिन्न नीतिगत्त मुद्दों पर केन्द्र व राज्य सरकारों को राजनीतिक तकनीकि परामर्श देगा। नीति आयोग योजना आयोग के विपरित टॉप टू बॉटम की बजाय बॉटम टू टॉप के तरीके पर कार्य करेगा।
  5. वित्तीय सहयोग की राजनीति राज्य अपना प्रशासन एवं योजनाओं के क्रियान्ययन के वित्त के लिए केन्द्र सरकार द्वारा मिलने वाले अनुदान एवं सहायता पर निर्भर है। इन सभी कारकों से सहकारी संघवाद की कल्पना की जाती है। आमतौर पर एक ही समय में संघवाद के सभी आयामों को देखा जा सकता है। जैसे कि केन्द्र में भाजपा की सरकार है और कई राज्यों में भी भाजपा की सरकार है ऐसे में भाजपा शासित राज्यों और भाजपा शासित केन्द्र के साथ स्वाभाविक रूप से सहयोग दिखता है। केन्द्र की योजनाओं, नीतियों व आदेश आदि का इन राज्यों में अच्छे से पालन किया जाता है। इसी तरह केन्द्र भी इन राज्यों की सुनती है और बहुत सारी चीजों में इन राज्यों को प्राथमिकता भी मिलती है। कुल मिलाकर यह सहकारी संघवाद का एक बढ़िया उदाहरण पेश करता है वहीं अगर उन राज्यों को देखते हैं जिसमें भाजपा की सरकार नहीं हैं तो वहां पर एक प्रतिस्पर्धी संघवाद का रूप दिख सकता है। उदाहरण के लिए जीएसटी आने से पहले की स्थिति को देखा जा सकता है जहां राज्यों को अपने हिसाब से चीजों पर कर लगाने का अधिकार था और उन्हें पूरी छूट थी कि वो अपने राज्य में किसी खास वस्तु पर जितना चाहे उतना कर लगा सकती थी, पर एन.डी.ए. सरकार आने के बद जीएसटी लाया गया। इस व्यवस्था को लाने के पीछे सहकारी संघवाद मी एक कारण था, जिसमें सभी राज्यों के सहभागिता पर जोर दिया गया तथा कर एकत्रीकरण में एकरूपता करने का प्रयास किया गया।

अगर उन राज्यों को देखे जिसमें भाजपा की सरकार नहीं तो यहाँ पर कई मुद्दो पर केन्द्र के साथ एक संघर्ष/विवाद की स्थिति दिख सकती है। जैसे कि केन्द्र ने सीएए पारित किया लेकिन कई राज्यों ने उसे मानने से इंकार कर दिया और बाकायदा उसके लिए अपने विधानसभा में प्रस्ताव भी पारित किया। हालांकि राज्यों के ऐसे रवैये से कुछ होना नहीं है, फिर भी दोनों के संबंध में एक प्रकार की कडवाहट दिखती है और कम से कम सहयोग की भावना तो ऐसे मुद्दो पर बिल्कुल नहीं दिखती। इस तरह की स्थिति को संघर्षात्मक संघवाद कहा जाता है। कई बार स्थिति इतनी बिगड जाती है कि केन्द्र और राज्य आपस में मारा-मारी पर उतर आते है। राज्य सरकार व केन्द्र सरकार के दलों के बीच कभी-कभी हिंसा भी हो जाती है। इस तरह की स्थिति को आक्रामक संघवाद कहा जाता है।

विश्लेषण :-

भारत क्षेत्रफल व विविधता की दृष्टि से बहुत बडा देश है। किसी बहुसांस्कृतिक देश में हर वर्ग और क्षेत्र अपनी स्वायत्तता बनाये रखना चाहते है। राज्य अधिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं। राज्य सत्ता का ज्यादा से ज्यादा विकेन्द्रीकरण कराना चाहते है। भारत संघ की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए संविधान निर्माताओं ने संघ सूची व राज्य सूची का निर्माण किया एवं 73 वे तथा 74 वे संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज व्यवस्था व नगरीय व्यवस्था के द्वारा राज्यों को कुछ हद तक ओर स्वायतता प्रदान की गई।भारत में केन्द्र राज्य विवाद होने की स्थिति में न्यायालय द्वारा विवाद हल किया जाता है। इसलिए न्यायालय को स्वतंत्र एवं संघवाद का रक्षक बनाया गया। 1967 तक संघ व राज्य में समान दल का प्रभुत्व रहा जिसे एक दलीय प्रभुत्य व्यवस्था कहा जाता है। इस व्यवस्था में केन्द्र राज्य आपसी सहयोग द्वारा विकास करते रहे। 1967-77 तक अनेक दल अस्तित्व में आने के बाद केन्द्र और राज्यों में अलग-2 सरकारें बनी। दलों में आपसी प्रतिस्पर्धा और ऊंच नीच की भावना के कारण संघ व राज्यों में आपसी सहयोग में कमी दिखाई देने लगी।

1977-89 तक वापस एक दलीय प्रमुत्य व्यवस्था आई। 1989-2014 तक का युग गठबंधन सरकारों का युग रहा। इस युग में राज्य स्तरीय छोटे दलों का महत्व बढा। राज्य सरकारें ज्यादा मजबूत हुई। और अपने विकास के लिए समझौता तथा सौदेबाजी करती हुई प्रतीत रही। अलग रे के अनुसार, “संघवाद की नवीन धारणा के अन्तर्गत संघीय व्यवस्था में दो तरह की सत्ताओं को राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति में सहयोगी बनाया जाता है। तथा एकीकृत समाज का निर्माण किया जाता है।”

सुझाव

संघवाद के विकास के लिए यह परम आवश्यक है कि केन्द्र राज्य आपसी सहयोग से मिल जुल के कार्य करें। जब राज्यो की खुशहाली व प्रगति होगी तो देश स्वतः ही प्रगति करेगा। राज्यों को एक सीमा तक अपने मामलो में स्वतंत्र कार्य करने दिया जाना चाहिए। केन्द्र का अनुचित हस्तक्षेप विवाद की स्थिति उत्पन्न करता है। केन्द्र द्वारा बनाई गई योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए राज्यों की अहम भूमिका होती है। अतः केन्द्र द्वारा योजना निर्माण और कियान्वयन से पूर्व राज्यों से सलाह मशविरा करना चाहिए। जिस भावना से संविधान निर्माताओं ने संविधान रचा उसी भावना के अनुरूप शासन संचालित होना चाहिए। देश की एकता को बनाये रखने के लिए संघवाद एक राम बाण औषधि की तरह है। जिसका हमें नियम कायदो में रहते हुए सेवन करना चाहिए।

निष्कर्ष

संघवाद एक इन्द्रधनुष की तरह है। जिसमें अलग- अलग रंग का अलग-अलग अस्तित्व है। सभी रंग मिलकर एक सुन्दर दृश्य बनाते है। कोई भी कानूनी फार्मूला व्यावहारिक संचालन पर निर्भर करता है। संघवाद पारस्परिक विश्वास, सहनशीलता और सहयोग की भावना पर आधारित विकास चाहता है। संघवाद एकता व अनेकता दोनों का आदर करता है। अनेकता व विविधता को बनाये रखते हुए राष्ट्रीय एकता के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है। विविधता और स्वायत्तता, मांगो के प्रति संवेदनशीलता संघवाद को जींवत बनाती है। मनुष्य की तरह संघवाद को भी परिस्थिति अनुरूप ढाला जाना चाहिए। आज विश्व के बडे राष्ट्र और महाशक्तियों संघीय शासन व्यवस्था के द्वारा ही अपना विकास-प्रगति और दबदबा बनाये हुए है।

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