| डॉ. अनिल कुमार सिन्हा प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष (भूगोल) राजीव गांधी शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अंबिकापुर (छत्तीसगढ) | डॉ. राजीब जाना अतिथि व्याख्याता (भूगोल विभाग) राजीव गांधी शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अंबिकापुर (छत्तीसगढ) |
Abstract
सतत् विकास वह विकास है जो भावी पीढ़ियों को अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की योग्यता के साथ समझौता किए बिना ही वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करें। यह विकास की वह रणनीति है जो सभी प्राकृतिक, मानवीय, वित्तीय तथा भौतिक संसाधनों का संपत्ति तथा आर्थिक कल्याण में दीर्घकालिक वृद्धि करने के लिए प्रबंध करती है। भारत में स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए पिछले कुछ सालों में सतत कृषि विकास की दिशा में गंभीर प्रयास किए गए हैं परिणामस्वरूप देश में जैविक और प्राकृतिक खेती का रकबा निरंतर बढ़ रहा है।इसके लिए जैविक खेती की कृषि पद्धतियों को अपनाना होगा जो कि हमारे नैसर्गिंक संसाधनों एवं मानवीय पर्यावरण को प्रदूषित किये बगैर समस्त जनमानस को खाद्य सामग्री उपलब्ध करा सकेगी तथा हमें खुशहाल जीने की राह दिखा सकेगी।
कुंजी शब्द- सतत् विकास, फसल उत्पादकता, जैविक खेती, स्मार्ट कृषि, कुशल जल प्रबंधन।
प्रस्तावना
मानव सभ्यता के विकास की कहानी वास्तव में उसके प्रकृति अथवा पर्यावरण उपभोग की कहानी है क्योंकि आदिम अवस्था से आज तक हम पर्यावरण का उपयोग कर प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं और भविष्य की प्रगति भी इसी पर निर्भर है। विकास के प्रारंभिक दौर में मानव का पर्यावरण से सामंजस्य था, अतः निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर होता रहा। किंतु जैसे-जैसे औद्योगिक एवं तकनीकी प्रगति अधिकाधिक होती गई एक ओर प्रकृति के शोषण में वृद्धि होने लगी तो दूसरी ओर इसका दुष्प्रभाव एवं गुणवत्ता में अवनयन (Degradation) भी प्रारंभ हो गया। विकास की दौड़ में उस युग में यह सोचने का
समय संभवतः मानव को नहीं था कि अनियमित एवं अनियंत्रित पर्यावरण शोषण विकास के स्थान पर ऐसी समस्याओं को जन्म देगा जो स्वयं एवं उसके अस्तित्व के लिए संकट का कारण बन जाएगी।यदि हमने अपने प्राकृतिक संसाधनों तथा पर्यावरण की परवाह किए बिना ही आर्थिक विकास करने का प्रयास किया तो इसके भयानक परिणाम हो सकते हैं । इससे हमारे वर्तमान पीढ़ी का जीवन अभावग्रस्त हो सकता है और आने वाली पीढ़ियों का जीवन भी अंधकारमय हो सकता है। विकास से जुड़ी हुई पर्यावरण संबंधी समस्याओं ने विकास प्रक्रिया पर एक प्रश्न चिन्ह लगा दिया है जिससे सतत् विकास (Sustainable Development) की संकल्पना का जन्म हुआ है। वस्तुतःसस्टेनेबल डेवलपमेंट वह विकास है जो भावी पीढ़ियों को अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की योग्यता के साथ समझौता किए बिना ही वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करें। यह विकास की वह रणनीति है जो सभी प्राकृतिक, मानवीय, वित्तीय तथा भौतिक संसाधनों का संपत्ति तथा आर्थिक कल्याण में दीर्घकालिक वृद्धि करने के लिए प्रबंध करती है।
अध्ययन का उद्देश्य
- बढ़ती जनसंख्या के साथ-साथ भावी पीढ़ी कीकृषि आवश्यकताओं को ध्यान में रखना।
- पर्यावरणीय गुणवत्ता को बढ़ाना जिस पर कृषि अर्थव्यवस्था निर्भर करती है।
- सतत् मृदा की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के साथ-साथ रसायनों के अत्यधिक उपयोग को सीमितकरना।
- कृषि कार्यों की आर्थिक व्यवहार्यता को बनाए रखना।
- सतत्कृषि के आधुनिक प्रौद्योगिकी की समझ विकसित करना तथा सूचना तंत्र व डेटा प्रबंधन को
बढ़ावा देना - स्मार्ट कृषि के अनुप्रयोग से उच्च फसल उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ अपव्यय को कम से कमकरने का कौशल विकसित करना।
सतत् कृषि विकास संकल्पना
सतत् कृषि विकास आज के समय की मांग है। हरित क्रांति के चलते देश में उत्पादन तो बढ़ा लेकिन रासायनिक खादों के इस्तेमाल से मिटटी की गुणवत्ता कम होती गई परिणामस्वरूप आज देश में बंजर हो चुकी भूमि का प्रतिशत काफी बढ़ चुका है। भारत में स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए पिछले कुछ सालों में सतत कृषि विकास की दिशा में गंभीर प्रयास किए गए हैं परिणामस्वरूप देश में जैविक और प्राकृतिक खेती का रकबा निरंतर बढ़ रहा है। साथ ही कम जल से सिंचाई की पद्धतियों का इस्तेमाल भी दिनोदिन बढ़ रहा है।टिकाऊ कृषि एक कृषि पद्धति है जो भविष्य की पीढ़ियों की अपनी जरूरतों को पूरा करने की क्षमता को संरक्षित करते हुए वर्तमान की जरूरतों को पूरा करने का प्रयास करती है।इसमें उन तरीकों का उपयोग करना शामिल है जो पर्यावरण के अनुकूल, आर्थिक रूप से लाभप्रद और सामाजिक रूप से सही है। सतत अथवा टिकाऊ खेती मृदा स्वास्थ्य को बढ़ावा देने, जल संरक्षण,अपशिष्ट को कम करने और जैव विविधता के संरक्षण पर जोर देती है।
कृषि मानव सभ्यता के प्राचीनतम् उद्यमों में से एक है। यह निर्विवाद विषय कि मानव विकास के साथ कृषि का भी सतत् विकास होता गया है। घुमंतु जीवन से निकलकर मानव गाँव बसाकर भोजन एवं आहार प्राप्ति के लिए खेती के महत्व को बहुत पहले समझ लिया था। तत्कालीन समय में समूची अर्थव्यवस्था की धुरी विषेष कर ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि के इर्द-गिर्द ही घुमती थी, और वर्तमान में भी किसी न किसी रूप में अभी भी विद्यमान है। सम्पूर्ण विष्व में बढती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या है। बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग, प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्था के बीच आदान-प्रदान, मृदा व वातावरण को प्रभावित करता है, जिससे भूमि की उर्वरा षक्ति खराब हो जाती है, साथ ही वातावरण प्रदूषित होता है तथा मनुष्य के स्वास्थ्य में गिरावट आती है। प्राचीन काल में मानव स्वास्थ के अनुकूल तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी, जिससे जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र निरन्तर चलता रहता था, जिसके फलस्वरूप जल, भूमि, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता था।
भारत में फसलों की उत्पादकता में वृद्धि
आजादी के बाद से ही भारत के सामने अनेकों समस्याएं थी, इन्हीं समस्याओं में से एक समस्या थी भुखमरी। यद्यपि भारत एक कृषि प्रधान देश था पर आजादी के समय मात्र 36 करोड़ जनसंख्या को भोजन उपलब्ध करना सरकार के लिए एक गंभीर समस्या बनी हुई थी। इस गंभीर समस्या को निपटने के लिए सरकार द्वारा देश में पहली पंचवर्षीय योजना में अपने मुख्य फोकस के रूप में कृषि विकास को रखा था। इसके बावजूद दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान देश ने एक गंभीर खाद्य संकट का सामना किया,अतः सन् 1958 में भारत में खाद्य समस्या की कमी के कारणों की जांच करने वह उसे दूर करने के उपायों को सुझाव के लिए एक टीम का गठन किया। इस गठित टीम ने पूरे देश में अनेक शोध कार्य किया तथा सरकार को यह सुझाव दिया कि भारत को इस गंभीर समस्या से निपटने व खाद्यान्न उत्पादन बढाने के लिए उन क्षेत्रों में अधिक फोकस करना चाहिए जहां पर कृषि उत्पादन बढ़ाने की अधिक संभावना है। इसके परिणाम स्वरूप सरकार ने पहले से ही विकसित हुई कृषि क्षेत्रों को अधिक खाद्यान्न उत्पादन प्राप्त करने के लिए गहन खेती के रूप में चुना गया। भारत में हरित क्रांति के दौरान फसल उत्पादन में आशातीत वृद्धि होने के कारण निरंतर फसल उत्पादन मात्रा बढ़ने लगी तथा सभी प्रकार के फसलों की उत्पादकता दर भी बढ़ने लगी।
तालिका क्रमांक – 1
भारत : विभिन्न फसलों की उत्पादकता में वृद्धि
(उत्पादन- कि.ग्रा/हेक्टेयर)


चित्र क्र. 1
भारत में अनाजों एवं विभिन्न फसलों के उत्पादकता के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि स्वाधीनता के बाद वर्ष 1950- 51 में जहां उत्पादकता बहुत कम थी, हरित क्रांति के प्रभावों के कारण उत्पादकता दर में क्रमशः वृद्धि होती गई। हमारे देश के अनाजों के अंतर्गत मुख्य फसल गेहूं की उत्पादकता प्रारंभिक दौर में जहां 663 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर वर्तमान में यह बढ़कर 3559 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है।इसी तरह जीवन यापन की प्रमुख फसल चावल वर्ष 1950- 51 में 668 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की 2023- 24 में यह 2882 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है।दलहन फसलों की उत्पादकता वर्तमान में 881 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर एवं सभी तिलहनों का उत्पादकता दर 881 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर्ज है।
एक विकासशील देश के रूप में वैश्विक स्तर पर सतत् कृषि के लिए भारत महत्त्वपूर्ण है। कृषि भारत की 58% से अधिक आबादी के लिए जीवनयापन का जरिया प्रदान करती है। देश ने कृषि उत्पादन बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है लेकिन सतत् कृषि पद्धत्तियों को अमल में लाने के लिए और अधिक प्रयत्न करना बाकी है। रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और गहन कृषि पद्धतियों के अत्यधिक उपयोग के कारण मिट्टी में उर्वरता में गिरावट भारतीय किसानों के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है।भारत में सतत कृषि पद्धतियों को अपनाना कृषि क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। भारत सरकार और विभिन्न संगठनों ने सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए कई पहलें शुरू की हैं। उदाहरण के लिए सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना को कृषि पद्धतियों में सुधार करने और किसानों को वित्तीय सहायता देने के लिए शुरू किया।
रासायनिक उर्वरकों की खपत
देश में तीन प्रकार के उर्वरकों- नाईट्रोजन, फास्फोरस, एवं पोटेषियम (छच्ज्ञ) के खपत की प्रवृति का आंकलन किया गया है, जिसमें स्पष्ट होता है कि स्वतंत्रता के पष्चात् 1950-51 में नाईट्रोजन 58.7 हजार टन, 1960-70 में 210 हजार टन, 2000-01 में 10920.2 हजार टन का खपत हुआ। फास्फोरस उर्वरक के खपत की प्रवृति भी निरंतर बढ़ती जा रही है। वर्ष 1950-51 में जहां मात्र 6.9 हजार टन 1970-71 में बढ़कर 462 हजार टन, 2010-11 में 8049.1 हजार टन तथा 2023-24 में 8307 हजार टन की खपत हुई।


चित्र क्र. 2
देश में पोटेशियम उर्वरक की खपत की प्रवृति निरंतर बढ़ती जा रही है। 1950-51 में इसके खपत का कोई रिकार्ड दर्ज नहीं है। 1960-61 में 29.0 हजार टन, तथा 2018-19 में 2779.1 हजार टन पोटेषियम की खपत हुई। मानव षरीर पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों के कारण रासायनिक उर्वरकों के खपत में धीरे-धीरे कमी हो रही है। देष में जैव उर्वरकों के प्रयोग की प्रवृति बढ़ने लगी है। देष में प्रति हेक्टेयर उर्वरकों के खपत की प्रवृति धनात्मक रही है। वर्ष 2001-02 में यह दर 92.33 कि.ग्रा./हेक्टेयर, 2005-06 में 105.53 कि.ग्रा./हेक्टेयर, 2009-10 में 140.15 कि.ग्रा./हेक्टेयर, तथा 2018-19 में 133.12 कि.ग्रा./हेक्टेयर रही है।
जैविक खेती
मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए नितान्त आवष्यक है कि प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित न हों, षुद्ध वातावरण रहे एवं पौष्टिक आहार मिलता रहे। इसके लिए हमें जैविक खेती की कृषि पद्धतियों को अपनाना होगा जोकि हमारे नैसर्गिंक संसाधनों एवं मानवीय पर्यावरण को प्रदूषित किये बगैर समस्त जनमानस को खाद्य सामग्री उपलब्ध करा सकेगी तथा हमें खुषहाल जीने की राह दिखा सकेगी। जैविक खेती की विधि रासायनिक खेती की तुलना में बराबर या अधिक उत्पादन देती है अर्थात जैविक खेती मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में पूर्णतः सहायक है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक खेती की विधि और भी अधिक लाभदायक है।
ऑर्गेनिक खेती में नेशनल प्रोग्राम फॉर ऑर्गेनिक प्रोडक्शन (NPOP) एक सरकारी कार्यक्रम है जिसे भारत की जैविक प्रमाणीकरण प्रणाली को मजबूत करने, जैविक उत्पादन के लिए मानक स्थापित करने और घरेलू व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जैविक उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए 2001 में शुरू किया गया था। यह सुनिश्चित करता है कि जैविक के रूप में विपणन किए जाने वाले उत्पाद गुणवत्ता और सुरक्षा के मानकों को पूरा करते हैं, जिसके लिए कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) जिम्मेदार होती है। इसी तरह देश में गुणवत्ता आश्वासन पहल (Participatory Guarantee System) के अंतर्गत भी ऑर्गेनिक क्षेत्र की भी पहचान की जाती है। हमारे देश में वर्ष 2021-22 में राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम के अंतर्गत कुल 4726715 हेक्टेयर क्षेत्र एवं गुणवत्ता आश्वासन पहल के अंतर्गत 1185 700 हेक्टेयर क्षेत्र की पहचान की गई।


प्रमुख जैविक खाद एवं कीटनाषक
- जैविक खादें। 2. नाडेप।3. बायोगैस स्लरी। 4. वर्मी कम्पोस्ट। 5. हरी खाद। 6. जैव उर्वरक (कल्चर)। 7. गोबर की खाद।8. नाडेप फास्फो कम्पोस्ट। 9. पिट कम्पोस्ट। 10. मुर्गी का खाद। 11. भभूत अमृतपानी। 12. अमृत संजीवनी। 13. मटका खाद। 14. गौ-मूत्र।15. नीम-पत्ती का घोल/निबोली/खली।16. मट्ठा। 17. लकडी की राख। 18. नीम व करंज खली।
भूमि की उत्पादन क्षमता बढाने में जैव उर्वरकों का महत्व
रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से उपज में वृद्धि तो होती है परन्तु अधिक प्रयोग से मृदा की उर्वरकता तथा संरचना पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, इसलिए रासायनिक उर्वरकों के साथ जैव उर्वरकों के प्रयोग की सम्भावनाएं बढ़ रही है। जैव उर्वरकों के प्रयोग से फसल को पोषक तत्वों की आपूर्ति होने के साथ मृदा उर्वरकता भी स्थिर बनी रहती है।
जैव उर्वरक
जैव उर्वरक जीवाणु खाद है। खाद में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु वायुमण्डल में पहले से विद्यमान नाईट्रोजन को पकड़कर फसल को उपलब्ध कराते हैं और मिट्टी में मौजूद अघुलनषील फास्फोरस को पानी में घुलनषील बनाकर पौधों को देते है। इस प्रकार रासायनिक खाद की आवष्यकता सीमित हो जाती है। वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया जा चुका है कि जैव खाद के प्रयोग से 30 से 40 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर भूमि को प्राप्त हो जाती है तथा उपज 10 से 20 प्रतिषत तक बढ़ जाती है। अतः रासायनिक उर्वरकों को थोडा कम प्रयोग कर के बदलें में जैविक खाद का प्रयोग करके फसलो की भरपूर उपज पाई जा सकती है। फास्फाबैक्टीरिया और माइकोराइजा नामक जैव उर्वरक के प्रयोग से खेत में फास्फोरस की उपलब्धता में 20 से 30 प्रतिषत की बढोत्तरी होती है। प्रमुख जैव उर्वरक एवं प्रयोग विधि निम्न है-

जैव उर्वरकों से लाभ
1.ये अन्य रासायनिक उर्वरकों से सस्ते होते है जिससे फसल उत्पादन की लागत घटती है। 2.जैव उर्वरकों के प्रयोग से नाईट्रोजन व घुलनषील फास्फोरस की फसल के लिए उपलब्धता बढ़ती है। 3.इससे रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो जाता है जिससे भूमि की मृदा संरचना ठीक हो जाती है। 4. जैविक खाद से पौधों में वृद्धि कारक हारमोन्स उत्पन्न होते है जिनसे उनकी पैदावार पर अच्छा प्रभाव पडता है। 5. जैविक खाद से खेत में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती है।
सावधानियाँ
नाइट्रोजनी जैव उर्वरकों के साथ फास्फोबैक्टीरिया का प्रयोग अत्यन्त लाभकारी है। प्रत्येक दलहनी फसल के लिए अलग राईजोबियम कल्चर आता है अतः दलहनी फसल के अनुरूप ही राइजोबियम कल्चर प्रयोग किया जा सकता है। जैव उर्वरकों को धूप में कभी नहीं रखना चाहिए। कुछ दिन के लिए रखना हो तो मिट्टी के घडे का प्रयोग बहुत अच्छा है। फसल विषेष के अनुसार ही जैविक खाद का चुनाव होना चाहिए। लगभग 20 साल के निरंतर व गहन अनुंसंधान करने के पष्चात पहले टाटा एनर्जी रिसर्च इंस्टीट्यूट नाम से जाने वाली अनुसंधान संस्थान द्वारा माइकोराइजा को बनाने की तकनीक विकसित की गई। इसी संस्था के तीन निजी संस्थानों – कैडिला (गुजरात, 70 टन), के.सी.पी. षुगर इंडस्ट्रीज एण्ड कारपोरेशन, (वयूर, आन्ध्र प्रदेष, 250 टन) एवं मैजेस्टीक एग्रोनोमिक्स प्रा. लि. (ऊना, हिमाचल प्रदेष, 1400 टन) प्रतिवर्ष माइकोराईजा उत्पादित कर रहे हैं। इसी अनुसंधान की श्रंखला में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के वैज्ञानिकों का अनुंसधान भी महत्वपूर्ण है।
जैविक खाद का फसल उत्पादन पर प्रभाव
मूंगफली एवं सूरजमुखी को छोडकर प्रायः सभी प्रकार की फसलों पर इस जैविक खाद व जैविक फफूंदीनाषक के बहुत ही अच्छे परिणाम प्राप्त होते है। इनमें 92 प्रतिषत तक रोग से मुक्ति दिलाने की क्षमता है (गोभी एवं डैम्पीग ऑफ), 95 प्रतिषत तक की कमी उन सभी सूक्ष्म जीवाणुओं की जो जमीन में रोग पैदा करते है (फ्यू. आक्सीसपोरम मैलोनिस) और इन सभी के कारण फसल उत्पादकता 37 प्रतिषात तक बढ़ जाती है। इस तरह से यह न केवल रोगों को रोकने का एक जैविक योग है बल्कि फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए जैविक खाद भी है। आज के बदलते परिवेष में जब जैविक खेती को प्रोत्साहन दिया जाना आवष्यक है। औषधीय पौधों की खेती का क्षेत्रफल प्रति वर्ष बढ़ रहा है। अन्य जैविक खादों के साथ-साथ भारतीयवैज्ञानिकों द्वारा विकसित प्रोद्योगिकी को भारत के उद्योगपतियों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। केवल एक कम्पनी पूरे भारतवर्ष की मांग को पूरा नहीं कर सकती है। अतः बेरोजगार कृषि स्नातकों, वैज्ञानिकों और किसानों के क्लबों को आगे आना चाहिए।
स्मार्ट कृषि की प्राथमिकताएँ
खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) का अनुमान है कि वैष्विक स्तर पर भोजन एवं चारें की अपेक्षित मांगों को पूरा करने के लिए 2050 तक 60 प्रतिषत तक बढ़ाना पडे़गा। कृषि पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव तथा जलवायु परिवर्तन के आसन्न संकट के बीच यह कार्य और भी कठिन होता दिखाई दे रहा है। खाद्य सुरक्षा और कृषि विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बदलते परिदृष्य में जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन तथा प्राकृतिक संसाधन आधार को क्षति पहुंचाये बिना हासिल किया जाना चाहिए। एफ.ए.ओ ने खाद्य सुरक्षा और जलवायु चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सतत् विकास (सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरण) के तीन आयामों के रूप में जलवायु स्मार्ट कृषि (सी.एस.ए.) को परिभाषित किया है। ये तीन है-
- कृषि उत्पादकता और आय में लगातार वृद्धि।
- जलवायु परिवर्तन का अनुकूलन और उसके प्रति लचीलापन।
- जहां तक संभव हो ग्रीन हाऊस गैसों का न्यूनीकरण किया जाना या हटाना।
इन तीन परस्पर जुड़ी हुई चुनौतियों का सामना करने के लिए उत्पादन प्रणालियों को कृषि भूमि स्तर पर अधिक कुषल और लचीला होने की आवष्यकता है। संसाधन संरक्षण ओर नूतन कार्य प्रणालियों को संसाधन उपयोग में अधिक प्रभावी होना चाहिए। अधिक खाद्यान्न उत्पादन के लिए भूमि, जल और आगतों का कम उपयोग होना चाहिए और इसे बदलाव व आघातों को छेलने के लिए अधिक लचीला होना चाहिए। इन संसाधन संरक्षण प्रौद्योगिकियों (आरसीटी) और नवीन कार्यप्रणालियों को नियत-स्तर पर सर्वाधिक सटीकता के साथ प्रयोग किया जाता है, जिससे सूचना और संचार प्रौद्योगिकी निर्णय समर्थन प्रणालियों के साथ खेत-स्तर पर प्रयुक्त सामग्री जैसे बीज, उर्वरक, कीटनाषक, सिंचाई आदि में अधिक सटीकता प्राप्त हो सके और इसे ही ’स्मार्ट कृषि’ माना जाता है।
हाल ही में कृषि उत्पादन में व्यापक नवाचार हुए है, जिससे न केवल उत्पादकता में सुधार हुआ है, बल्कि वे पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भी उतने ही महत्वपूर्ण है। उर्वरक प्रबंधन के लिए सूचना प्रौद्योगिक से संबंधित कई प्रणाली-अनुसंधान उपकरण उपलब्ध हो गए है। भौगोलिक सूचना प्रणाली (जी.आई.एस.), ग्लोबल पोजिषनिंग सिस्टम (जी.पी.एस.) और रिमोट सेसिंग (आर.एस.) की षुरूआत के साथ किसान अब प्रत्येक क्षेत्र की स्थान विषेष स्थितियों के लिए पोषक तत्वों से संबंधित सुझावों और जल प्रबंधन मॉडल को परिष्कृत कर सकते है। स्मार्ट कृषि में उत्पादन क्षमता और कृषि उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए मौजूदा कृषि तकनीक में उन्नत प्रौद्योगिकियों का एकीकरण षामिल है। स्मार्ट कृषि जिसमें उत्पादन सामग्री का (जो आवश्यक है) जब और जहां आवष्यक हो, प्रयोग होता है, आधुनिक कृषि क्रांति की तीसरी लहर बन गई है (पहली मशीनीकरण थी ओर दूसरी आनुवांषिक संषोधन के साथ हरितक्रांति), और आजकल यह बडी मात्रा में आंकड़ों की उपलब्धता के कारण कृषि जानकारी प्रणालियों की वृद्धि के साथ परिष्कृत हो रही है।
सामान्यतः स्मार्ट कृषि में सात-ई (Seven-E) का विषेष महत्व है-
(1) उत्पादन बढाना (Enhancement)
(2) आर्थिक दृष्टि से कृषि की स्वीकार्यता (Econonical)
(3) जीवाष्म इंधन (Energy) का सीमित उपयोग।
(4) प्राकृतिक संसाधनों का कुषल (Eguitable) प्रयोग।
(5) कृषि लाभों का समान वितरण (Employment)
(6) रोजगार का सृजन (Employment)
(7) पर्यावरण और पारिस्थितिकीय (Environmental)
(अ) स्वचालित सिंचाई प्रणाली- सि्ंप्रकलर, ड्रिप और उपसतह ड्रिप सिंचाई जैसी दबाव वाली सिंचाई प्रणाली पहले से ही प्रचलित सिंचाई विधियां है जो किसानों को यह नियंत्रित करने की अनुमति देती हैं कि उनके फसलों को कब और कितना जल मिलता है। नमी के स्तर और पौधों के स्वास्थ्य की निरंतर निगरानी करने के लिए इन सिंचाई प्रणालियों को तेजी से परिष्कृत इंटरनेट ऑफ थिंग्स से सुसज्जित सेंसर के साथ जोड़कर किसान केवल आवष्यकता होने पर ही हस्तक्षेप कर पाएंगे अन्यथा प्रणाली स्वायत्त रूप से संचालित होती रहेगी। हालांकि दबाव वाली सिंचाई प्रणालियां बिल्कुल रोबोटिक नहीं है लेकिन वे स्मार्ट फार्म के संदर्भ में पूरी तरह से स्वायत्त रूप से काम कर सकती है।
(ब) खेत में जलाषय (ओ.एफ.आर.) वर्षा जल संचयन और कुशल जल उपयोग भविष्य में वर्षा-आधारित कृषि को बनाए रखने के लिए अपरिहार्य विकल्प है। स्थिरता और लोगों की आजीविका में सुधार सुनिष्चित करने के लिए विभिन्न राज्यों ने ओएफआर के लिए विषेष कार्यक्रम षुरू किए है।
सतत् कृषि विकास हेतु नूतन कार्य प्रणालियाँ
(1) बीज बुवाई और रोपण – खेतों में सही स्थान और सही मात्रा में बीज बोना बहुत कठिन होता है। प्रभावी रूप से बीज बोने के लिए दो बातों पर नियंत्रण की आवष्यकता होती है। सही गहराई पर बीज बोना, और पौधों की सही वृद्धि के लिए उचित दूरी पर पौधे लगाना। हर बार इन चीजों को बेहतर करने के लिए सटीक बीजारोपण उपकरण तैयार किए गए है। जियोमैपिंग और सेंसर डाटा का संयोजन जो मिट्टी की गुणवत्ता, घनत्व, नमी और पोषक तत्वों के स्तर की जानकारी देता है, बीजारोपण प्रक्रिया में लगाए जाने वाले अनुमान को काफी घटाता है। बीज को अंकुरित होने और बढ़ने की सबसे अच्छी अवस्था मिलती है और समग्र रूप से फसल उत्तम होती है। भविष्य में मौजूद सीडर्स टै्रक्टरों और आईसीटी सक्षम प्रणाली के साथ उपलब्ध होंगे जो किसानों को फीडबैक भी देंगे। बीजरोपण और रोपण में उपयोग के लिए प्रोटोटाईप ड्रोन का निर्माण और परीक्षण भी किया जा रहा है। ये ड्रोन संपीडित हवा का उपयोग करके उर्वरक और पोषक तत्वों के साथ बीज की फली वाले कैप्सूलों को जमीन में सीधे रोंप सकेंगे।
(2) पोषक तत्व प्रबंधन में सुस्पष्टता- स्थान विषेष पोषक तत्व प्रबंधन (एसएसएनएम) एक सुनियोजित पद्धति है जो पोषक तत्वों से फसलों के पोषण पर सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करते है। जब भी विभिन्न फसल उत्पादन प्रणाली के अंतर्गत पोषक तत्वों की मांग और आपूर्ति के बीच तालमेल बनाने की आवष्यकता होती है। पोषक तत्वों की विषेष परिवर्तनषीलता और बेहतर पोषक तत्व उपयोग दक्षता के प्रबंधन का हल उपलब्ध कराता है। इसके लिए निम्न महत्वपूर्ण है –
(i) स्मार्ट उर्वरकः स्मार्ट उर्वरक नए प्रकार के उर्वरक है जो सूक्ष्मजीवों और नैनो पदार्थों के आधार पर तैयार किए जाते है। नियंत्रित निर्गमन और वितरण प्रणाली पर बल देने के साथ नैनो प्रौद्योगिकी आधारित स्मार्ट उर्वरक विकास पौधों की मांगों के अनुरूप पोषक तत्वों की उपलब्धता को संतुलित करते हैं, जिससे पोषक तत्वों की क्षति कम होती है। पोषक तत्व उपयोग क्षमता में वृद्धि से फासफोरस की मात्रा आधी से एक चौथाई हो जाती है और पैदावार 10 प्रतिषत बढ जाती है। स्मार्ट उर्वरक से सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा में 90 प्रतिषत तक की कमी होती है। कम निवेष के कारण किसानों की आय 15-20 प्रतिषत तक बढ़ सकती है। बायोस्टिमुलंट्स पौधों के हारमोनों को उद्दीप्त करते हैं जो जडों के विकास, जडों की कार्यक्षमता, पोषक तत्वों का उद्ग्रहण और गुणों को प्रभावित करते है और यह रासायनिक से जैविक खाद व्यवस्था में स्थानांतरित करने में फायदेमंद होते है। दूसरी और बायोफर्टिलाइजर स्वयं पोषक तत्वों की आपूर्ति किए बिना पोषक तत्वों की उपलब्धता पर अप्रत्यक्ष प्रभाव देता है। वे सजीव सूक्ष्मजीव फॉर्मूलेषन है जो पोषक तत्वों की उपलब्धता और उद्ग्रहण में सहायता करते है।
(ii) लीफ कलर चार्टः-लीफ कलर पौधे की नाइट्रोजन स्थिति का एक अच्छा संकेतक है। पत्ती की क्लोरोफिल मात्रा और पत्ती के रंग में परिवर्तन के माध्यम से फसल की आवष्यकतानुसार नाइट्रोजन की आपूर्ति का मिलान करके इसके उपयोग को अनुकूलित किया जा सकता है। फिलीपींस स्थित अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित लीफ कलर चार्ट किसानों की मदद कर सकता है क्योंकि पत्ती के रंग की गहनता चावल के पौधे में नाइट्रोजन की स्थिति से संबंधित है। लीफ कलर चार्ट का उपयोग करके पत्ती के रंग की निगरानी नाइट्रोजन के प्रयोग के सही समय के निर्धारण में मदद करती है। सभी परिस्थितियों में लीफ कलर चार्ट का उपयोग सरल, आसान और किफायती है। अध्ययनों से पता चलता है कि लीफ कलर चार्ट का उपयोग करके नाइट्रोजन को 10-15 प्रतिषत बचाया जा सकता है।
(iii) नोरमलाइज्ड़ डिफरेंस वेजीटेषन इंडेक्स (एनडीवीआई) सेंसर्सः गेहूं और चावल की फसलों में अध्ययनों से पता चला है कि रिमोट सेंसिंग आधारित नोरमलाइज्ड डिफरेंस वेजीटेषन इंडेक्स (एनडीवीआई) सेंसर्स का उपयोग करके आवष्यकतानुसार नाईट्रोजन के प्रयोग से बिना किसी उपज क्षति के 15-20 प्रतिषत नाइट्रोजन बचाई जा सकती है जिससे किसानों की लाभ सीमा को बढाया जा सकता है।
(iv) सॉयल प्लांट एनालिसिस डेवलपमेंट (एसपीएडी)– पत्ती मेंनाइट्रोजन की स्थिति की निगरानी और चावल में नाइट्रोजन टॉपड्रेसिंग के समय में सुधार के लिए एक सरल, त्वरित और पोर्टेबल नैदानिक उपकरण है। एसपीएडी कम लागत वाला क्लोरोफिल मीटर है और किसानों के लिए किफायती है। एसपीएडी थ्रेषहोल्ड का उपयोग करके पत्ती में नाइट्रोजन की स्थिति की निगरानी करना और सिंचित धान पर नाइट्रोजन की स्थिति की निगरानी करना संभव होगा।
(v) पोषक विषेषज्ञ (एनई)ः फसल की पैदावार, पर्यावरण गुणवत्ता और समग्र कृषि स्थिरता में सुधार के लिए निर्णय समर्थन प्रणाली सॉफ्टवेयर द्वारा निर्देषित हाल ही में विकसित सटीक पोषक तत्व प्रबंधन टेक्नोलॉजी है। सीआईएमएमवाईटी के सहयोग से इंटरनेषनल प्लांट न्यूट्रीषन इंस्टीट्यूट ने पोषक विषेषज्ञ (एनई) टेक्नोलॉजी विकसित की है यह एक पोषक तत्व निर्णय समर्थन प्रणाली है जो स्थान विषेष पोषक तत्व प्रबंधन (एसएसएनएम) नियमों पर आधारित है। एनई उपज के अनुसार और लक्षित कृषि संबंधी क्षमताओं के साथ-साथ देषी स्रोतों से पोषक तत्वों की भरपाई को देखते हुए निर्धारित उर्वरक मात्रा सुझाता है। देष के प्रमुख मक्का उगाने वाले कृषि पारिस्थितिकी क्षेत्रों में उर्वरक की मात्रा सुझाने के लिए एनई का उपयोग सफलतापूर्वक किया गया है जिससे मौजूदा उर्वरक सुझावों की वानिस्पतिक उपज और कृषि लाभप्रदता में वृद्धि हुई है।
(vi) यूरिया डीप प्लेसमेंट (यूडीपी)- अंतर्राष्ट्रीय उर्वरक विकास केन्द्र (आईएफडीसी) द्वारा विकसित यूडीपी तकनीक चावल प्रणालियों के लिए जलवायु स्मार्ट समाधान का एक अच्छा उदाहरण है। चावल के लिए मुख्य नाइट्रोजन उर्वरक यूरिया के प्रयोग की आम तकनीक ब्रॉडकास्ट एप्लीकेषन है जो एक बहुत ही अप्रभावी तरीका है, जिसमें 60-70 प्रतिषत नाइट्रोजन की क्षति होती है और जो गैस उत्सर्जन और जल प्रदूषण को बढ़ाता है। यूडीपी तकनीक में यूरिया के 1-3 ग्राम के ’’बिक्रेट’’ बनाए जाते है जिन्हे धान की रोपाई के बाद मिट्टी में 7 से 10 से.मी. की गहराई पर रखा जाता है। इस तकनीक से नाइट्रोजन की कमी 40 प्रतिषत तक कम हो जाती है और यूरिया प्रभाविता 50 प्रतिषत तक बढ़ जाती है। यूरिया के उपयोग में औसतन 25 प्रतिषत की कमी के साथ इसकी पैदावार 25 प्रतिषत तक बढ़ जाती है।
(3) कुशल जल प्रबंधन – मानव उत्तरजीविता और सतत विकास के लिए जल सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है क्योंकि इसकी उपलब्धता दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। सिंचाई क्षेत्र के लिए जल की कुल अनुमानित मांग मौजूदा-स्तर से अधिक होगी इसलिए तीन प्रमुख चुनौतियां होंगी (अ) सिंचित क्षेत्रों में उपलब्ध जल संसाधनों के कुषल और उत्पादक उपयोग से ’’जल की प्रति बूंद अधिक फसल’’ (ब) कम उत्पादन वाले पारिस्थितिकी तंत्रों जैसे वर्षा-आधारित और जलमग्न क्षेत्रों की उत्पादकता में वृद्धि और (स) कृषि उत्पादन के लिए अपषिष्ट जल का उपयोग करना। यह प्रभावी सिंचाई प्रबंधन के माध्यम से ही संभव है।
(स) सीमित सिंचाई आपूर्ति सीमित जल उपलब्धता की स्थिति में जल के अधिक प्रभावी और उचित उपयोग के लिए आंषिक फसल जल की आवष्यकताओं को पूरा करने के आधार पर सिंचाई कार्यनीतियों को अपनाया जाना चाहिए। विनियमित सीमित सिंचाई और नियंत्रित लेट-सीज़न सीमित सिंचाई जैसी सिंचाई प्रणालियां अपनाना जल संरक्षण और फसल उत्पादन के लिए उपयोग किए जाने वाले जल संरक्षण और फसल उत्पादन के लिए उपयोग किए जाने वाले जल की मात्रा को घटाने के लिए एक स्वीकृत कार्यनीति बनाया जाना प्रस्तावित है।
(4) खरपतवार और कीट प्रबंधन –
- नई प्रकार की खरपतवार नाषकः- हाल ही में खरपतवार उगने के बाद (पोस्ट एमरजेंस) प्रयोग की जाने वाली कुछ नई पीढी की खरपतवार नाषक बाजार में उपलब्ध है जो खेत की फसलों में खरपतवारों के चयनात्मक प्रभावी नियंत्रण की गारटी देते है। बहुत कम मात्रा में इन खरपतवारनाषकों की आवष्यकता होती है और ये रखरखाव और लाने ले-जाने में बहुत आसान है।
- खरपतवार नाषक प्रतिरोधी फसलें :- खरपतवार नाषक प्रतिरोधी फसलें आनुवांषिक रूप से संषोधित (जीएम) फसल होती है जो विषेष ब्रॉड-स्पेक्ट्रम खरपतवार नाषक का प्रतिरोध करने के लिए संरक्षित की जाती है। ये आसपास के खरपतवारों को मारती है, लेकिन उगी फसल को सुरक्षित रखती है।
वर्तमान में फसल छिडकाव अनुप्रयोगों के लिए ड्रोन उपलब्ध है जो एक और श्रम-गहन कार्य को स्वचालित करने का अवसर प्रदान करते है। जीपीएस, लेजर मापन और अल्ट्रासोनिक स्थिति संयोजन का उपयोग करते हुए फसल पर छिडकाव करने वाले ड्रोन ऊंचाई और स्थान को आसानी से अनुकूलित कर सकते है और हवा की गति, स्थलाकृति और भौगोलिक स्थिति जैसे कारको ंका समायोजन कर सकते हैं। ड्रोन फसलों पर अधिक प्रभावी ढंग से अधिक सटीकता और कम क्षति के साथ खरपतवारनाषकों, उर्वरकों और कीटनाषकों के छिडकाव में सक्षम बनाता है। निराई के लिए डिज़ाइन किए गए रोबोट उसी मूल मषीन के साथ कीटों की पहचान और कीटनाषकों के इस्तेमाल करने के लिए सेंसर, कैमरा और स्प्रेयर से लैस हो सकते है। ये रोबोट और उनके जैसे अन्य आने वाले समय में खेतों पर अलग-अलग काम नहीं करेंगे। इन्हें ट्रैक्टरों और इंटरनेट ऑफ थिंग्स से जोडा जाएगा जिससे समस्त कार्य स्वतः स्वयं ही संपन्न होगा।
सतत कृषि विकास में आने वाली बाधाएं
लोकसभा की वेबसाइट के अनुसार भारत में 2010 से 2039 के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण प्रमुख फसलों की उत्पादकता 09% तक कम हो सकती है, और यह समय के साथ बढ़ती जाएगी। अलग-अलग जगहों और जलवायु की परिस्थितियों के मुताबिक यह कमी धान के लिए 35%, गेहूं के लिए 20%, ज्वार के लिए 50%, जौ में 13% और मक्के में 60% तक हो सकती है। तापमान में वृद्धि, वर्षा की अनिश्चितता और सिंचाई के पानी में कमी के कारण 2100 तक अधिकतर फसलों की उत्पादकता में 10-40% तक की कमी आने की संभावना है। वर्ष 2018 के भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण में यह अनुमान लगाया गया था कि सिर्फ जलवायु परिवर्तन के कारण देश को साल भर में 9-10 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। भारत में कृषि क्षेत्र की दीर्घकालिक लाभप्रदता के लिए सतत कृषि विकास पद्धतियों को अपनाना महत्वपूर्ण है। देश में सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने में आने वाली कई कमियों को चिह्नित किया गया है। कुछ अहम बाधाएं निम्नलिखित हैंः- - जागरूकता और जानकारी का अभाव रू सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने में आने वाली मुख्य बाधाओं में से एक है किसानों में जागरूकता और जानकारी का अभाव। किसानों को सतत कृषि पद्धतियों के लाभों या उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करने के तरीके की जानकारी होनी चाहिए।
- वित्त तक सीमित पहुँच रू सतत कृषि पद्धतियों के लिए अक्सर महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी निवेश की आवश्यकता होती है लेकिन कई छोटे और सीमांत किसानों को इन निवेशों के लिए वित्त तक अधिक पहुँच की आवश्यकता है।
- अपर्याप्त नीति और नियामक ढांचाः सतत् कृषि पद्धतियों को अपनाने में भारत की नीति हमेशा मददगार नहीं होती है और नियामक व्यवस्था हमेशा सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने की पक्षधर नहीं होती है। उदाहरण के लिए किसानों को सतत् पद्धतियों को अपनाने के लिए अधिक प्रोत्साहन की आवश्यकता हो सकती है या विनियम कुछ सतत् पद्धतियों को प्रतिबंधित कर सकते हैं। सतत् कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन को कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के बजट का केवल 0.8ः प्राप्त होता है जो सतत् कृषि को और अधिक प्रोत्साहन देने के महत्वपूर्ण मिशन में लगा हुआ है।
- सीमित अनुसंधान और विकासः सतत् कृषि पद्धतियों में और अधिक अनुसंधान एवं विकास की आवश्यकता है जो भारतीय परिवेश के लिए उपयुक्त हों। किसानों को इन पद्धतियों को अपनाने में मदद करने के लिए अनुसंधान परिणामों के प्रसार और विस्तार सेवाओं को विकसित करने में अधिक निवेश की भी आवश्यकता है।
- बुनियादी ढांचे और तकनीकी सहायता का अभावः सतत् कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए अक्सर विशेष बुनियादी ढांचे और तकनीकी सहायता की आवश्यकता होती है। खासकर दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में अनेक किसानों को इन संसाधनों तक पहुँच की जरूरत है ।
- कम उत्पादकता – भारत में कृषि कम उत्पादकत्ता के लिए जानी जाती है जो इसकी वृद्धि और विकास में एक बड़ी बाधा है। भारत में अधिकांश फसलों के लिए प्रति हेक्टेयर उपज वैश्विक औसत से काफी कम है और इसके कई कारण हैं, जैसे मशीनीकरण का निम्न स्तर, अपर्याप्त सिंचाई सुविधाएं और मिट्टी की खराब स्थिति ।
- खंडित भूमि जोत रू भारत में औसत जोत का आकार छोटा है जिसके कारण किसानों के लिए आधुनिक कृषि तकनीकों और प्रौद्योगिकियों को अपनाना मुश्किल हो जाता है । खंडित भूमि जोत भी किसानों के लिए ऋण और अन्य सहायता सेवाओं तक पहुँच को कठिन बनाते हैं।
- बाजार तक पहुँच की कमी – भारत में छोटे और सीमांत किसानों के लिए बाजारों तक पहुँच की कमी एक महत्वपूर्ण चुनौती है। कई किसानों को अपनी उपज बिचौलियों को कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर किया जाता है, क्योंकि वे सीधे बाजारों तक नहीं पहुँच पाते हैं। परिणामस्वरूप किसानों की आय कम होती है और उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थों की अधिक कीमत चुकानी पड़ती है।
- अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा – अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा जैसे कि ग्रामीण सड़कें, भंडारण सुविधाएं और कोल्डचेन भारत में कृषि क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती हैं। इनमें कमियों के कारण किसानों के लिए अपनी उपज को बाजारों तक ले जाना, सुरक्षित ढंग से भंडारण करना और बाद में बेचना मुश्किल हो जाता है।
- जलवायु परिवर्तन – जलवायु परिवर्तन भारत में कृषि क्षेत्र के लिए विशेष रूप से जल की उपलब्धता, कीट और रोग प्रबंधन और फसल की पैदावार के परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण चुनौतियां उत्पन्न करता है। मौसम के बदलते स्वरूप जैसे अनियमित वर्षा और बढ़ता तापमान फसल की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं और किसानों में असुरक्षा का भाव पैदा करते हैं ।
विश्व में ग्लोबल वार्मिंग के प्रति बढ़ती चिंता और बढ़ती जनसंख्या ने सतत कृषि विकास की आवश्यकता की तरफ पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। इसी के मद्देनजर 2015 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने पर्यावरण और विश्व भर में मानव जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए 17 सतत विकास लक्ष्य निर्धारित किए जिन्हें 2030 तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया है। संयुक्त राष्ट्र एसडीजी लक्ष्य 2 भुखमरी समाप्त करने, खाद्य सुरक्षा और बेहतर पोषण और सतत कृषि को बढ़ावा देने से समबद्ध है जिसमें 2030 तक सतत खाद्य उत्पादन प्रणाली पद्धतियों को लागू करने पर जोर दिया गया है जो उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ पारिस्थितिकी तंत्र बढ़ावा देने से सम्बद्ध है जिसमें 2030 तक सतत खाद्य उत्पादन प्रणाली सुनिश्चित करने और लचीली कृषि को बनाए रखने में मदद करें। सतत कृषि प्रणालियां जलवायु परिवर्तन, चरम मौसम, सूखा, बाढ़ और अन्य आपदाओ के प्रति अनुकूलन की क्षमता को मजबूत करती हैं और जो भूमि और मिट्टी की गुणवत्ता में उत्तरोत्तर सुधार करती है।
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