सतत् विकास हेतु लैंगिक समानता में सावित्रीबाई फुले के योगदान का अध्ययन

सुश्री रेखा कुमारी
शोधार्थी
कला, शिक्षा व सामाजिक विज्ञान संकाय
जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर (राज)
अतिथि सहायक आचार्य
अर्थशास्त्र विभाग
राजकीय महाविद्यालय पिड़ावा झालावाड (राज)

Abstract

प्रस्तुत शोध पत्र में अद्भुत बहुमुखी प्रतिभा एवं विद्या की धनी देश की प्रथम शिक्षित महान् महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले के लैंगिक समानता में योगदान के विभिन्न आयामों का सतत् विकास हेतु विस्तार से विश्लेषण कर ध्यान केन्द्रित किया गया हैं। तथा साथ ही लैंगिक समानता क्या है? आखिर क्यों यह किसी भी समाज और राष्ट्र के लिए एक आवश्यक तत्व बन गया है, बदलते समाज में यह क्यों प्रासंगिक है? लैंगिक समानता का अर्थ यह नही कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक लिंग का हो, अपितु लैंगिक समानता का सीधा सा अर्थ समाज में महिला तथा पुरुष के समान अधिकार, दायित्व और रोजगार के अवसरों के परिप्रेक्ष्य में है। साथ ही आज महिला सशक्तिकरण व समाज सुधार का अभियान ओर अधिक प्रासंगिक हो गया हैं। क्योंकि हम एक नए भारत – एक भारत, श्रेष्ठ भारत का निर्माण कर रहें हैं, जिसे सावित्रीबाई फुले के दृष्टिकोण को लागु किए बिना पूरा नहीं किया जा सकता हैं। उनके महिला शिक्षा के अभियान को आगे बढ़ाते हुए भारतीय संविधान में भी समानता, न्याय, बंधुत्व और स्वतंत्रता को परिलक्षित किया गया हैं। ताकि हमारे देश का ‘ एक विकसित भारत, एक श्रेष्ठ भारत, एक नव भारत का सपना मूर्त रूप ले सकें। तथा साथ ही हमारे देश का सतत्, निरन्तर एवं सर्वागीण विकास संभव हो सकें।

Keywords: सावित्रीबाई फुले की जीवनी, सतत् विकास की अवधारणा, लैंगिक समानता की अवधारणा, सावित्रीबाई फुले का योगदान, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक समानता।

“हर बच्चा अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने का

हकदार हैं, लेकिन उनके जीवन में लैंगिक

असमानता और उनके लिए देखभाल करने

वालों के जीवन में इस वास्तविकता में बाधा हैं !!”

प्रस्तावना

अर्थात् प्रत्येक बच्चे का अधिकार हैं कि उसकी क्षमता के अनुसार उसे विकास का पूरा मौका मिले। .लेकिन लैंगिक असमानता की कुरीति की वजह से वह ठीक से फल-फूल नहीं पाते हैं, साथ ही भारत में लड़कियों और लड़कों के बीच न केवल उनके घरों में और समुदायों में बल्कि हर जगह लिंग असमानता दिखाई देती हैं। पाठ्य पुस्तकों, फिल्मों, मिडियां, इत्यादि सभी जगह उनके साथ

लिंग के आधार पर भेदभाव किया जाता हैं। भारत में लैंगिक असमानता के कारण अवसरों में भी असमानता उत्पन्न करते हैं जिसका प्रभाव दोनों लिंगों पर पड़ता है। लेकिन आंकड़ों के आधार पर देखें तो इस भेदभाव से सबसे अधिक लड़कियां अच्छे अवसरों से वंचित रह जाती हैं। दूसरी ओर लैंगिक समानता जिसे लैंगिक समानता, लैंगिक समतावाद या लिंगो की समानता के रूप में भी जाना जाता हैं, आर्थिक भागीदारी और निर्णय लेने सहित लिंग की परवाह किए बिना संसाधनो और अवसरों तक समान रूप से आसानी से पहुच की स्थिति हैं, और विभिन्न व्यवहारों, आकांशाओं एवं जरूरतों को समान रूप से महत्व देने की स्थिति हैं, लिंग की परवाह किए बिना भी। अर्थात् लैंगिक समानता एक मुख्य मानवाधिकार है जो लिंग की परवाह किए बिना सभी के लिए उचित उपचार, अवसर और स्थिति की गारंटी देता हैं। यह इस विचार का समर्थन करता हैं कि पुरुषों और महिलाओं दोनों को उनकी समानताओं और मतभेदों के लिए समान रूप से महत्व दिया जाता हैं, जो जीवन के सभी क्षेत्रों में सहयोग को प्रोत्साहित करता हैं। समानता प्राप्त करने का मतलब लिंगों क बीच के भेद को मिटाना नहीं हैं, बल्कि यह सुनिश्चित करना हैं कि जीवन में भुमिकाएं, अधिकार और अवसर इस बात से तय न हो कि कोई पुरुष है या महिला।लैंगिक समानता का तात्पर्य समान अवसरों या लिंग के आधार पर औपचारिक समानता से हो सकता है, या समान प्रतिनिधित्व या लिंग के परिणामों की समानता से भी हो सकता है, जिसे वास्तविक समानता भी कहा जाता है। [3] लैंगिक समानता लक्ष्य है, जबकि लैंगिक तटस्थता और लैंगिक समानता ऐसी प्रथाएँ और सोचने के तरीके हैं जो लक्ष्य प्राप्त करने में मदद करते हैं। लैंगिक समानता , जिसका उपयोग किसी निश्चित स्थिति में लैंगिक संतुलन को मापने के लिए किया जाता है, वास्तविक लैंगिक समानता प्राप्त करने में सहायता कर सकती है, लेकिन यह अपने आप में लक्ष्य नहीं है। लैंगिक समानता महिलाओं के अधिकारों से दृढ़ता से जुड़ी हुई है , और अक्सर इसके लिए नीतिगत बदलावों की आवश्यकता होती है।

वैश्विक स्तर पर, लैंगिक समानता हासिल करने के लिए महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हानिकारक प्रथाओं को खत्म करना भी जरूरी है, जिसमें यौन तस्करी, महिला हत्या, युद्धकालीन यौन हिंसा, लैंगिक वेतन अंतर,[4] और अन्य उत्पीड़न की रणनीतियां शामिल हैं। यूएनएफपीए ने कहा कि “अपने मानवाधिकारों की पुष्टि करने वाले कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों के बावजूद, महिलाओं के गरीब और निरक्षर होने की संभावना पुरुषों की तुलना में बहुत अधिक है। उनके पास संपत्ति के स्वामित्व, क्रेडिट, प्रशिक्षण और रोजगार तक कम पहुंच है। यह आंशिक रूप से महिलाओं के पुरातन रूढ़िवादिता से उपजा है, जिन्हें परिवार के कमाने वालों के बजाय बच्चे पैदा करने वाली और गृहिणी के रूप में लेबल किया जाता है।[5] वे पुरुषों की तुलना में राजनीतिक रूप से सक्रिय होने की संभावना कम हैं और घरेलू हिंसा का शिकार होने की संभावना कहीं अधिक है।

शोध के उद्देश्य प्रस्तुत शोध पत्र का अध्ययन करने के पश्चात आप इस योग्य हो सकेंगे कि आप :-

  1. प्रस्तुत शोध अध्ययन का सैध्दांतिक एवं व्यवहारिक रूप समझ सकेंगे।
  2. प्रस्तुत शोध अध्ययन का वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन कर सकेंगे।
  3. 3.प्रस्तुत शोध अध्ययन का वर्तमान समय की प्रासंगिकता के अनुसार तुलनात्मक अध्ययन कर सकेंगे।
  4. प्रस्तुत शोध अध्ययन से प्रेरणा लेकर आने वाले समय में हमारे देश को ओर भी ज्यादा सशक्त, सुदृढ़ व विकसित बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकेंगे।

शोध सहित्य की समीक्षा

प्रस्तुत शोध पत्र में सावित्रीबाई फुले के सतत् विकास हेतु लैंगिक समानता में योगदान के प्रमुख विषयों और अवधारणाओं की पड़ताल की गई हैं, जिसमें बताया गया हैं कि सतत् विकास, वृद्धि और मानव .विकास के लिए एक दृष्टिकोण है। जिसका उद्देश्य भविष्य की पीढ़ियों की अपनी जरूरतों को पूरा करने की क्षमता से समझोता किए बिना वतर्मान की जरूरतों को पूरा करना हैं। इसका उद्देश्य एक ऐसा समाज बनाना हैं जहां रहने की स्थितियां और संसाधन ग्रह की अखंडता

को कम किए बिना मानवीय आवश्यकताओं कों पूरा करते हैं। सतत् विकास का उद्देश्य अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और समाज की जरूरतों को संतुलित करना हैं। सतत् विकास की अवधारणा के साथ कुछ समस्याएं हैं। कुछ विद्वानों का कहना है कि यह एक विरोधाभास हैं क्योंकि उनके अनुसार विकास स्वाभाविक रूप से अस्थिर। पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए, स्थानीय की आवश्यकता की पूर्ति सतत् विकास हैं। साथ ही लैंगिक समानता क्या हैं? आखिर क्यों यह किसी भी समाज और राष्ट्र के लिए एक आवश्यक तत्व बन गया हैं, बदलते समाज में यह प्रासंगिक हैं? लैंगिक समानता का अर्थ यह नहीं कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक लिंग का हो, अपितु लैंगिक समानता का सीधा सा अर्थ समाज में महिला तथा पुरुष के समान अधिकार, दायित्व और रोजगार के अवसरों के प्ररिप्रेक्ष्य में हैं। तथा सावित्रीबाई फुले ने छुआछूत, लैंगिक समानता, अस्पृश्यता के कारण, सामाजिक रूप से पिछड़ी वंचित महिलाओं का जीवन स्तर ऊपर उठाने के उद्देश्य से शिक्षा की अलख जगाई। उनके अनुसार शिक्षा के अभियान को आगे बढ़ाते हुए भारतीय संविधान में भी समानता, न्याय, बंधुत्व और स्वतंत्रता को परिलक्षित किया गया हैं।

जीवन परिचय

देश की प्रथम शिक्षित महान् महिला सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831को हुआ था। उनके पिता का नाम खंदोजी नैवेसे और .माता का नाम लक्ष्मीबाई था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1841 में ज्योतिबा फुले से हुआ था। सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले .किसान स्कूल की संस्थापक थी। महात्मा ज्योतिबा को महाराष्ट्र और भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन में एक सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में जाना जाता हैं। ज्योतिराव फुले, जो बाद में ज्योतिबा फुले के नाम से जाने गए। सावित्रीबाई फुले के संरक्षक, गुरु और समर्थक थे। सावित्रीबाई फुले ने अपने

जीवन को एक मिशन की तरह जिया। जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाया, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति, सुरक्षा और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना इत्यादि। वे एक कवियत्री भी थी। उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता हैं। उन्होंने देश के विकास में अपना अमूल्य योगदान दिया है जिस कभी भी भूलाया नहीं जा सकता है।

सतत् विकास की अवधारणा

सतत् विकास वृद्धि और मानव विकास के लिए एक दृष्टिकोण है। जिसका उद्देश्य भविष्य की पीढीयों की अपनी जरूरतों कों पूरा करने की क्षमता से समझौता किए बिना वर्तमान की जरूरतों कों पूरा करना हैं। इसका उद्देश्य एक ऐसा समाज बनाना हैं जहां रहने की स्थितियां और संसाधन ग्रह की अखंडता को कम किए बिना मानवीय आवश्यकताओं कों पूरा करते हैं। सतत् विकास का उद्देश्य अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और समाज की जरूरतों को संतुलित करना हैं। 1987 में ब्रुन्डलैंड रिपोर्ट ने सतत् विकास की अवधारणा कों बेहत्तर ढ़ंग से जानने में मदद की। सतत् विकास स्थिरता के विचार के साथ ओवरलेप करता हैं जो एक मानव अवधारणा हैं। यूनेस्कों ने दो अवधारणाओं के बीच एक अंतर इस प्रकार तैयार किया “स्थिरता को अक्सर एक दीर्घकालिक लक्ष्य (यानी अधिक टिकाऊ दुनिया) के रूप में माना जाता हैं, जबकि सतत् विकास इसे प्राप्त करने के लिए कई प्रक्रियाओं और मार्गो को संदर्भित करता हैं।” रियोडिजेनेरियो में 1992 के पृथ्वी शिखर सम्मेलन से शुरू हुई रियो प्रकिया ने सतत् विकास की अवधारणा कों अन्तर्राष्ट्रीय एजेंडे पर रखा हैं। सतत् विकास, सतत् विकास लक्ष्यों की मूलभूत अवधारणा हैं। वर्ष 2030 के लिए इन वैश्विक लक्ष्यों कों 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाया गया था। वे वैश्विक चुनौतियो को सम्बोधित करते हैं, उदाहरण के लिए गरीबी, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता, हानि और शांति इत्यादि। सतत् विकास की अवधारणा के साथ कुछ समस्याएं हैं। कुछ विद्वानों का कहना हैं कि यह एक विरोधाभास हैं क्योंकि उनके अनुसार, विकास स्वाभाविक रूप से अस्थिर हैं। पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए, स्थानीय की आवश्यकताओं की पूर्ति सतत् विकास हैं। विकास का विचार और महत्व समकालीन दुनिया में निरंतर लोकप्रिय हों रहा हैं। क्योंकि स्थायी विकास मानव समुदाय के साथ-साथ पर्यावरण के अस्तित्व से जुड़ा हैं। सस्टेनेबल डेवलपमेंट मूलतः दो शब्दों सस्टेनेबल व डेवलपमेंट से मिलकर बना हैं। हिंदी भाषा में सस्टेनेबल के लिए स्थायी, सतत् सम्पूर्ण, निरंतर इत्यादि शब्द प्रचलित होते हैं।

लैंगिक समानता की अवधारणा

लैंगिक समानता क्या हैं? आखिर क्यों यह किसी भी समाज और राष्ट्र के लिए एक आवश्यक तत्व बन गया हैं, बदलते समाज में यह क्यों प्रासंगिक हैं? लैंगिक समानता का अर्थ यह नहीं कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक लिंग का हो, अपितु लैंगिक समानता का सीधा सा अर्थ समाज में महिला तथा पुरुष के समान अधिकार, दायित्व और रोजगार के अवसरों के प्ररिप्रेक्ष्य में हैं। जिस प्रकार तराजू में दोनों तरफ बराबर भार रखने पर वह संतुलित होता हैं। ठीक उसी तरह से किसी भी समाज और राष्ट्र में संतुलन बनाने के लिए जरूरी हैं कि वहां पुरुषों तथा स्त्रियों के मध्य लैंगिक समानता स्थापित की जानी चाहिए। आज आधुनिकता की जीवनशैली को .अपनाने के बावजूद भारतीय समाज लैंगिक समानता के मामले में इतना पिछड़ा हुआ हैं, सही मायनों में देखा जाएं तो लैंगिक समानता का न होना ही समाज में असंतुलन और अपराध को जन्म देता हैं। यह बहुत जरूरी है कि हर क्षेत्र में चाहें वह शिक्षा हो, राजनीति हो, रोजगार हो, अवसर या अधिकार हों, हर क्षेत्र में लैंगिक समानता को ध्यान में रखना चाहिए। जिस तरह एक सिक्के के दोनों पहलुओं की समानता हैं, साईकिल, बाईक के दोनों पहिये की समानता हैं और हमारे शरीर के अंगों आंखों, हाथों, पैरों की समानता हैं, ठीक उसी तरह समाज के लिए भी दोनों पहलुओं स्त्री तथा पुरुष के मध्य लैंगिक समानता होनी चाहिए।

यूनिसेफ (संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी) लैंगिक समानता को इस प्रकार परिभाषित करती है: “महिलाएँ और पुरुष, तथा लड़कियाँ और लड़के, समान अधिकारों, संसाधनों, अवसरों और सुरक्षा का आनंद लेते हैं। इसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि लड़कियाँ और लड़के, या महिलाएँ और पुरुष, एक जैसे हों, या उनके साथ बिल्कुल एक जैसा व्यवहार किया जाए।”[2] [a]

2017 तक, लैंगिक समानता संयुक्त राष्ट्र के सत्रह सतत विकास लक्ष्यों ( एसडीजी 5 ) में से पाँचवाँ लक्ष्य है ; लैंगिक समानता में महिलाओं और पुरुषों के अलावा लिंगों के प्रस्ताव , या लैंगिक द्विआधारी के बाहर लैंगिक पहचान को शामिल नहीं किया गया है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की मानव विकास रिपोर्ट द्वारा लैंगिक असमानता को प्रतिवर्ष मापा जाता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:-

लैंगिक समानता की शुरुआती पैरोकार क्रिस्टीन डी पिज़ान ने अपनी 1405 की किताब द बुक ऑफ़ द सिटी ऑफ़ लेडीज़ में कहा है कि महिलाओं का उत्पीड़न तर्कहीन पूर्वाग्रह पर आधारित है, और समाज में कई प्रगति की ओर इशारा करती हैं जो संभवतः महिलाओं द्वारा बनाई गई हैं।[ 7 ] [ 8 ]

शेकर्स

शेकर्स, एक इंजील समूह, जो लिंगों के पृथक्करण और सख्त ब्रह्मचर्य का पालन करता था, लैंगिक समानता के शुरुआती अभ्यासी थे। 1774 में अमेरिका में प्रवास करने से पहले वे इंग्लैंड के उत्तर-पश्चिम में एक क्वेकर समुदाय से अलग हो गए थे। अमेरिका में, 1788 में शेकर्स के केंद्रीय मंत्रालय के प्रमुख, जोसेफ मीचम को यह रहस्योद्घाटन हुआ कि लिंग समान होने चाहिए। फिर उन्होंने लूसी राइट को अपनी महिला समकक्ष के रूप में मंत्रालय में लाया, और साथ में उन्होंने लिंगों के अधिकारों को संतुलित करने के लिए समाज का पुनर्गठन किया। मीचम और राइट ने नेतृत्व दल की स्थापना की जहां प्रत्येक एल्डर, जो पुरुषों के आध्यात्मिक कल्याण से निपटता था, को एक एल्डरस के साथ भागीदारी दी जाती थी, जो महिलाओं के लिए भी यही करती थी। प्रत्येक डीकन को एक डीकोनेस के साथ भागीदारी दी जाती थी। पुरुषों के पास पुरुषों की देखरेख थी 1796 में मीचम की मृत्यु के बाद, राइट 1821 में अपनी मृत्यु तक शेकर मंत्रालय की प्रमुख बनी रहीं।

शेकर्स ने 200 से ज़्यादा वर्षों तक लैंगिक संतुलन वाले नेतृत्व का यही तरीका अपनाया। उन्होंने अन्य महिला अधिकार समर्थकों के साथ मिलकर काम करके समानता को भी बढ़ावा दिया। 1859 में, शेकर्स के एल्डर फ्रेडरिक इवांस ने अपनी मान्यताओं को ज़ोरदार ढंग से व्यक्त करते हुए लिखा कि शेकर्स “पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्त्री को उस दासता की स्थिति से मुक्त कराया जिसमें अन्य सभी धार्मिक प्रणालियाँ (कम या ज़्यादा) उसे डालती हैं, और उसे पुरुष के साथ वे न्यायसंगत और समान अधिकार दिलाए जो संगठन और क्षमताओं में पुरुष के समान होने के कारण, ईश्वर और प्रकृति दोनों ही माँगते प्रतीत होते हैं”।[9] इवांस और उनकी समकक्ष, एल्ड्रेस एंटोनेट डूलिटल, 1870 के दशक में पूरे उत्तर-पूर्वी अमेरिका में महिला अधिकार समर्थकों के साथ वक्ताओं के मंचों पर शामिल हुए। शेकर्स के एक आगंतुक ने 1875 में लिखा: प्रत्येक लिंग अपने कार्यक्षेत्र में काम करता है, जहाँ महिला का पुरुष के क्रम में उचित अधीनता, आदर और सम्मान होता है, और पुरुष का महिला के क्रम में उचित आदर और सम्मान होता है [जोर दिया गया], ताकि इनमें से किसी भी समुदाय में “महिला अधिकारों” के उत्साही अधिवक्ताओं को अपने आदर्श का व्यावहारिक अहसास मिल सके। [10]

शेकर्स अमेरिकी समाज के हाशिये पर बसे एक कट्टरपंथी धार्मिक संप्रदाय से कहीं बढ़कर थे; उन्होंने लैंगिक समानता को व्यवहार में लाया। यह तर्क दिया जाता है कि उन्होंने यह प्रदर्शित किया कि लैंगिक समानता प्राप्त की जा सकती है और इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है। [11]

लैंगिक समानता में सावित्रीबाई फुले का योगदान:-

देश के सतत् व सर्वांगीण विकास में लैंगिक समानता स्थापित करने में अनेकों महान् महिलाओं व पुरुषों का अग्रणी योगदान रहा हैं जिनमें से एक प्रमुख महान् महिला सावित्रीबाई फुले थी जिनका योगदान देश के सतत् व सर्वांगीण विकास में स्मरणीय, चिरस्थाई, एवं विश्वसनीय रहा हैं जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता हैं। देश की प्रथम शिक्षित महान् महिला सावित्रीबाई फुले ने अपने पति महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर अस्पृश्यता, आधिपत्य, जातिवादी व्यवस्था, समाज विरोधी यथास्थितिवादी ताकतों के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़कर महिलाओं की शिक्षा के लिए क्रांतिकारी अभियान शुरू किया। .जिनकी वजह से ही आज के समाज में महिलाओं को भी शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर प्राप्त हो पाये हैं और देश के विकास में महिलाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित हो पायी हैं वरन् प्राचीनकाल में महिलाओं को इतनी सम्मानजनक स्थिति प्राप्त

नहीं थी। जो आज के युग में महिलाओं को प्राप्त हैं। तथा सावित्रीबाई फुले के प्रयासों से ही आज महिलाओं को चूल्हा चौका से आगे निकलकर पढ़ने का अवसर मिला हैं, उन्हें आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता हैं। सावित्रीबाई फुले देश की प्रथम महिला शिक्षिका थी। उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों की लड़कियों, विशेष रूप से पिछड़े, अनुसूचित जातियों और जनजातियों की लड़कियों को शिक्षा की चोखट तक पहुंचाया। उनके लिए स्कूल खोले और ऐसे समय में लाखों लोगों के जीवन में शिक्षा के रूप में आशा की किरण जगाई, जब स्कूलों में जाना तो दूर की बात थी, जबकि कोसों दूर तक स्कूल ही नहीं थे। वास्तव में यह भारतीय समाज में महिलाओं के समग्र सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। सावित्रीबाई फुले, जो नारी शक्ति की प्रतीक हैं और नारी सशक्तिकरण का विषय अब केन्द्र और राज्य सरकारों का मुख्य केंद्र बन गया हैं। इसका श्रेय भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले को जाता हैं। आज महिला सशक्तिकरण व समाज सुधार का अभियान ओर .अधिक प्रासंगिक हो गया हैं। क्योंकि हम एक नए भारत – “एक भारत, श्रेष्ठ भारत का निर्माण कर रहे हैं, जिसे सावित्रीबाई फुले के दृष्टिकोण को लागू किए बिना पूरा नहीं किया जा सकता हैं। गरीबों में सबसे गरीब लोगों की सेवा करने की उनकी प्रतिबद्धता थी। सावित्रीबाई फुले ने छुआछूत, अस्पृश्यता के कारण, सामाजिक रूप से पिछड़ी वंचित महिलाओं का जीवन स्तर ऊपर उठाने के उद्देश्य से शिक्षा की अलख जगाई। उनके महिला शिक्षा के अभियान को आगे बढ़ाते हुए भारतीय संविधान में भी समानता, न्याय, बंधुत्व और स्वतंत्रता को परिलक्षित किया गया हैं।

सरकारी-गैर सरकारी संगठनों के प्रयास:-

लैंगिक समानता स्थापित करने हेतु सरकारी – गैर सरकारी संगठनों द्वारा किए गए प्रयासों को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता हैं जो निम्न है :-

मताधिकार आंदोलन

व्यापक समाज में, लैंगिक समानता की दिशा में आंदोलन 19वीं सदी के उत्तरार्ध में पश्चिमी संस्कृतियों में मताधिकार आंदोलन के साथ शुरू हुआ, जिसका उद्देश्य महिलाओं को मतदान करने और निर्वाचित पद धारण करने का अधिकार देना था। इस अवधि में महिलाओं के संपत्ति अधिकारों में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए, विशेष रूप से उनकी वैवाहिक स्थिति के संबंध में। (उदाहरण के लिए, विवाहित महिला संपत्ति अधिनियम 1882 देखें।)

प्रारंभिक सोवियत संघ

1927 में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने हुजुम अभियान के दौरान सोवियत मध्य एशिया में लैंगिक समानता लागू की।[12]

युद्धोत्तर युग

अधिक जानकारी: भेदभाव-विरोधी कानून

अधिक जानकारी: महिलाओं के कानूनी अधिकारों की समयरेखा (मतदान के अलावा)

  • द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से , महिला मुक्ति आंदोलन और नारीवाद ने महिलाओं के अधिकारों की मान्यता की दिशा में एक व्यापक आंदोलन चलाया है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों ने लैंगिक समानता को बढ़ावा देने वाले कई सम्मेलनों को अपनाया है। इन सम्मेलनों को सभी देशों द्वारा समान रूप से नहीं अपनाया गया है, और इनमें शामिल हैं:
  • शिक्षा में भेदभाव के विरुद्ध अभिसमय 1960 में अपनाया गया तथा 1962 और 1968 में लागू हुआ।
  • महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर कन्वेंशन (CEDAW) को 1979 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाया गया था। इसे महिलाओं के अधिकारों का एक अंतर्राष्ट्रीय विधेयक बताया गया है , जो 3 सितंबर 1981 को लागू हुआ।
  • वियना घोषणा और कार्ययोजना, एक मानवाधिकार घोषणापत्र है जिसे 25 जून 1993 को ऑस्ट्रिया के वियना में मानवाधिकारों पर विश्व सम्मेलन में सर्वसम्मति से अपनाया गया था। महिलाओं के अधिकारों का उल्लेख अनुच्छेद 18 में किया गया है।[13]
  • महिलाओं के विरुद्ध हिंसा उन्मूलन घोषणापत्र को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1993 में अपनाया गया था।
  • 1994 में, काहिरा में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय जनसंख्या एवं विकास सम्मेलन (ICPD) में बीस वर्षीय काहिरा कार्य योजना को अपनाया गया। इस गैर-बाध्यकारी कार्य योजना में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि सरकारों की ज़िम्मेदारी जनसांख्यिकीय लक्ष्यों के बजाय व्यक्तियों की प्रजनन संबंधी ज़रूरतों को पूरा करना है। इस प्रकार, इसमें परिवार नियोजन , प्रजनन अधिकार सेवाओं और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने तथा महिलाओं के विरुद्ध हिंसा रोकने की रणनीतियों का आह्वान किया गया।
  • इसके अलावा 1994 में, अमेरिका में, महिलाओं के खिलाफ हिंसा की रोकथाम, सजा और उन्मूलन पर अंतर-अमेरिकी कन्वेंशन , जिसे बेलेम डू पारा कन्वेंशन के रूप में जाना जाता है , ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा और भेदभाव को समाप्त करने का आह्वान किया।[14]
  • महिलाओं पर चौथे विश्व सम्मेलन के अंत में , संयुक्त राष्ट्र ने 15 सितंबर 1995 को बीजिंग घोषणा को अपनाया – जो लैंगिक समानता से संबंधित सिद्धांतों के एक समूह को लागू करने के लिए अपनाया गया एक संकल्प था।
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद संकल्प 1325 (यूएनएसआरसी 1325), जिसे 31 अक्टूबर 2000 को अपनाया गया था, सशस्त्र संघर्षों के दौरान और उसके बाद महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों और सुरक्षा से संबंधित है।
  • मापुटो प्रोटोकॉल महिलाओं को व्यापक अधिकारों की गारंटी देता है, जिसमें राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार, पुरुषों के साथ सामाजिक और राजनीतिक समानता, अपने प्रजनन स्वास्थ्य पर नियंत्रण और महिला जननांग विकृति का अंत शामिल है। इसे अफ्रीकी संघ ने मानव और जन अधिकारों पर अफ्रीकी चार्टर के एक प्रोटोकॉल के रूप में अपनाया था और 2005 में लागू हुआ था।
  • यूरोपीय संघ के निर्देश 2002/73/EC – समान व्यवहार, 23 सितंबर 2002 को जारी किया गया, जो रोजगार, व्यावसायिक प्रशिक्षण और पदोन्नति, तथा कार्य स्थितियों तक पहुँच के संबंध में पुरुषों और महिलाओं के लिए समान व्यवहार के सिद्धांत के कार्यान्वयन पर परिषद के निर्देश 76/207/EEC में संशोधन करता है, जिसमें कहा गया है कि: “इस निर्देश के अर्थ में उत्पीड़न और यौन उत्पीड़न को लिंग के आधार पर भेदभाव माना जाएगा और इसलिए निषिद्ध है।”[15]
  • महिलाओं के खिलाफ हिंसा और घरेलू हिंसा को रोकने और मुकाबला करने पर यूरोप परिषद का कन्वेंशन , महिलाओं के खिलाफ हिंसा के क्षेत्र में यूरोप में पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी साधन, [16] 2014 में लागू हुआ।
  • यूरोप परिषद की लैंगिक समानता रणनीति 2014-2017, जिसके पाँच रणनीतिक उद्देश्य हैं: [17]
    • लैंगिक रूढ़िवादिता और लैंगिक भेदभाव का मुकाबला
    • महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की रोकथाम और उसका मुकाबला
    • महिलाओं को न्याय तक समान पहुंच की गारंटी
    • राजनीतिक और सार्वजनिक निर्णय लेने में महिलाओं और पुरुषों की संतुलित भागीदारी प्राप्त करना
    • सभी नीतियों और उपायों में लैंगिक मुख्यधारा को प्राप्त करना

इस तरह के कानून और सकारात्मक कार्रवाई नीतियाँ सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव लाने में महत्वपूर्ण रही हैं। 2015 में प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा 38 देशों के नागरिकों पर किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि उन 38 देशों में से 37 में बहुसंख्यकों ने कहा कि लैंगिक समानता कम से कम “कुछ हद तक महत्वपूर्ण” है, और 65% वैश्विक औसत का मानना ​​है कि महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार मिलना “बहुत महत्वपूर्ण” है।[18] कई देशों में अब अधिकांश व्यवसाय पुरुषों और महिलाओं के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं।[i]

इसी तरह, पुरुष भी उन व्यवसायों में तेज़ी से काम कर रहे हैं जिन्हें पिछली पीढ़ियों में महिलाओं का काम माना जाता था , जैसे नर्सिंग , सफ़ाई और बच्चों की देखभाल। घरेलू परिस्थितियों में, पालन-पोषण या बच्चों के पालन-पोषण की भूमिका आमतौर पर साझा की जाती है या इसे पूरी तरह से महिलाओं की भूमिका नहीं माना जाता, ताकि महिलाएं बच्चे के जन्म के बाद भी अपना करियर बनाने के लिए स्वतंत्र हो सकें। अधिक जानकारी के लिए, साझा कमाई/साझा पालन-पोषण विवाह देखें।

सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन की एक और अभिव्यक्ति विवाह के बाद महिला द्वारा अपने पति का उपनाम स्वचालित रूप से न लेना है।[19]

लैंगिक समानता से जुड़ा एक बेहद विवादास्पद मुद्दा धार्मिक रूप से उन्मुख समाजों में महिलाओं की भूमिका है।[ii] [iii] कुछ ईसाई या मुसलमान पूरकवाद में विश्वास करते हैं , एक ऐसा दृष्टिकोण जो मानता है कि पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाएँ अलग-अलग लेकिन पूरक हैं। यह दृष्टिकोण लैंगिक समानता के विचारों और लक्ष्यों के विपरीत हो सकता है।

इसके अलावा, निम्न धार्मिकता वाले गैर-पश्चिमी देश भी हैं जहाँ लैंगिक समानता को लेकर विवाद बना हुआ है। चीन में, पुरुष संतान के प्रति सांस्कृतिक प्राथमिकता के कारण जनसंख्या में महिलाओं की संख्या में कमी आई है। जापान में नारीवादी आंदोलन ने कई प्रगति की है जिसके परिणामस्वरूप लैंगिक समानता ब्यूरो की स्थापना हुई है, लेकिन जापान अभी भी अन्य औद्योगिक देशों की तुलना में लैंगिक समानता के मामले में पिछड़ा हुआ है। दूसरी ओर, केन्या जैसे विकासशील देशों के पास आधिकारिक राष्ट्रीय आँकड़े नहीं हैं और उन्हें अपने विश्लेषण के लिए आमतौर पर अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा वित्त पोषित कुछ लैंगिक-विभाजित आँकड़ों पर निर्भर रहना पड़ता है।[20]

लैंगिक समानता की धारणा, और किसी निश्चित देश में इसकी उपलब्धि की डिग्री, बहुत जटिल है क्योंकि ऐसे देश हैं जिनका जीवन के कुछ क्षेत्रों में लैंगिक समानता के उच्च स्तर का इतिहास है, लेकिन अन्य क्षेत्रों में नहीं।[iv] [v] वास्तव में, लैंगिक समानता के स्तर के आधार पर देशों को वर्गीकृत करते समय सावधानी बरतने की आवश्यकता है।[21] माला हटन और एस लॉरेल वेल्डन के अनुसार “लिंग नीति एक मुद्दा नहीं बल्कि कई हैं” और[22]

जब कोस्टा रिका में मातृत्व अवकाश संयुक्त राज्य अमेरिका से बेहतर है, तथा लैटिन अमेरिकी देश नॉर्डिक देशों की तुलना में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा से निपटने के लिए नीतियां अपनाने में अधिक तत्पर हैं, तो कम से कम इस संभावना पर विचार करना चाहिए कि राज्यों को समूहीकृत करने के नए तरीकों से लैंगिक राजनीति के अध्ययन को बढ़ावा मिलेगा।

लैंगिक समानता से जुड़ी सभी मान्यताओं को आम तौर पर नहीं अपनाया गया है। उदाहरण के लिए, सार्वजनिक रूप से खुले स्तन रखने का अधिकार, यानी टॉपफ्रीडम , अक्सर केवल पुरुषों पर लागू होता है और एक मामूली मुद्दा बना हुआ है। सार्वजनिक स्थानों पर स्तनपान अब ज़्यादा स्वीकार्य हो गया है, खासकर रेस्टोरेंट जैसी अर्ध-निजी जगहों पर।[23]

संयुक्त राष्ट्र

मुख्य लेख: संयुक्त राष्ट्र में लैंगिक समानता के लिए विशेष उपाय

इसका दृष्टिकोण यह है कि पुरुषों और महिलाओं के साथ सामाजिक , आर्थिक और समाज के अन्य सभी पहलुओं में समान व्यवहार किया जाना चाहिए और उनके लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।[vi] लैंगिक समानता संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के उद्देश्यों में से एक है।[24] विश्व निकायों ने मानवाधिकारों, विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों और आर्थिक विकास के संदर्भ में लैंगिक समानता को परिभाषित किया है।[25] [26] संयुक्त राष्ट्र की सहस्राब्दी विकास लक्ष्य रिपोर्ट में कहा गया है कि उनका लक्ष्य “लैंगिक समानता और महिलाओं का सशक्तीकरण हासिल करना” है। विकासशील देशों में आर्थिक संघर्षों के बावजूद, संयुक्त राष्ट्र अभी भी लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है, साथ ही अपने सभी देशों में एक स्थायी रहने का माहौल बनाने में मदद कर रहा है। उनके लक्ष्यों में कुछ पूर्णकालिक नौकरियों में काम करने वाली महिलाओं को समान नौकरी वाले पुरुषों के बराबर वेतन देना भी शामिल है।

शोध परिकल्पना प्रस्तुत शोध पत्र के अध्ययन हेतु कई परिकल्पनाएं परिलक्षित हैं जिनमें से संक्षिप्त क्रमश निम्न हैं:-

  1. सावित्रीबाई फुले जी ने लैंगिक समानता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं।
  2. सतत् विकास हेतु लैंगिक समानता में सावित्रीबाई फुले जी का योगदान वतर्मान समय में प्रासंगिक एवं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
  3. देश के विकास में सावित्रीबाई फुले जी के योगदान का अद्भूत, अस्मरणीय, चिरस्थाई, एवं सकारात्मक प्रभाव दृष्टिगत होता हैं।

शोध की विधि एवं आंकड़ों का संग्रह

प्रस्तुत शोध पत्र में गुणात्मक एवं ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति का उपयोग किया गया हैं। जिसमें प्राथमिक और द्वितीयक स्त्रोतों का महत्वपूर्ण विश्लेषण शामिल हैं। प्राथमिक स्त्रोतों मे सावित्रीबाई फुले के स्वयं के लेख, पत्र और भाषण इत्यादि शामिल हैं। जबकि द्वितीयक स्त्रोतों में लेखकों द्वारा सतत् विकास हेतु लैंगिक समानता में सावित्रीबाई फुले जी के योगदान और महत्वपूर्ण कार्यों पर आधारित विद्वतापूर्ण लेखों, पुस्तकों, शोध पत्रों, समाचार पत्रों, पत्रिकाओ, फोटो और इंटरनेट वेबसाइटों इत्यादि के माध्यमों से प्राप्त प्रासंगिक साहित्य शामिल हैं।

निष्कर्ष एवं सुझाव

उपरोक्त वर्णित विवरण से स्पष्ट हैं कि जिस प्रकार हमारे देश के विकास में सावित्रीबाई फुले ने अपने प्रयासों, आदर्शो, सिंद्धांतों, योजनाबद्ध तरीको से देश के सर्वागीण विकास में अपना अमूल्य योगदान दिया हैं उसी तरह हम सब भी मिलकर सरकार द्वारा चलायी जा रहीं हजारों अनेको नीतियों, समितियों, आयोगों, योजनाओं, एवं कार्यक्रमों जैसे 1986 राष्ट्रीय शिक्षा नीति, राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण नीति 2011, विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग 1948-49, राष्ट्रीय स्त्रीशिक्षा समिति 1958, महिला समाऑख्या, बेटी बचाओं बेटी पढाओं योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, विधवा पेंशन योजना इत्यादि में अपना योगदान

देकर समाज में फैली हुई अनेकों सामाजिक .कुरीतियों जैसे- लैंगिक असमानता, दहेज प्रथा, कन्या भूर्ण हत्या, महिलाओं सहित घटित अनेकों अकृत्य घटनाओं, शोषणों इत्यादि कों समाप्त कर समाज के हर एक वर्ग को जागरूक कर उन्हें पहले से भी ज्यादा जागरूक और सतर्क कर तथा साथ ही अभी भी सरकार द्वारा सतत् विकास हेतु लैंगिक समानता के स्तर को ऊंचा उठाने हेतु कई योजनाएं लागू की जा रहीं हैं किन्तु फिर भी भारत इस मामले में पिछड़ा हूँआ हैं। अब आवश्यकता है समाज के बुनियादी ढांचे को बदलकर दकियानूसी सोच को खत्म करने की। ताकि महिलाओं को भी पुरुषो के समान उचित अधिकार, सम्मान व समान अवसर मिल सकें। क्योंकि महिला ही इस श्रष्टि का आधार हैं। साथ ही जिस तरह स्त्री और पुरुष दोनों एक दूसरे के पूरक व सहयोगी होते हैं, एक के बिना दुसरे का अस्तित्व ही नहीं हैं। ठीक उसी तरह एक अकेला राष्ट्र, देश, समाज, परिवार, इंसान अकेले, कुछ नहीं कर सकता हैं। अत: हम सभी को मिलकर इस देश के सतत् सर्वंगीण विकास में अपनी अहम् भागीदारी सुनिश्चित कर और जनजागृति कर इस देश को पहले से भी ज्यादा सशक्त, सुदृढ बनाने में अपनी अहम् भूमिका निभानी चाहिए। ताकि हमारा देश पहले से भी ज्यादा सशक्त, सुदृढ, शक्तिशाली और विकसित बन सकें। इसलिए महिलाओं को हर एक क्षेत्र में सशक्त व शक्तिशाली बनाकर ही हमारे देश का विकसित भारत का सपना साकार हो सकता है। और हमारा देश प्रगति एवं उत्कर्ष की नई उंचाईयों को छू सकता हैं।

सन्दर्भ ग्रंथ सूची

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