| डॉ. रामजय नाईक सहायक प्राध्यापक (नागपुरी भाषा विभाग) जगन्नाथ नगर महाविद्यालय, धुर्वा राँची (झारखण्ड) |
Abstract
प्रकृति, जो सदियों से हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे समाज, हमारे अस्तित्व को रेखांकित करता है। हमारे जंगल, नदियाँ, महासागर और मिट्टी हमें वह भोजन प्रदान करते हैं जो हम खाते हैं, जिस हवा में हम सांस लेते हैं, जिस पानी से हम अपनी फसलों की सिंचाई करते हैं। हम अपने स्वस्थ्य, सुख और समृध्दि के लिए कई अन्य वस्तुओं और सेवाओं के लिए भी उन पर निर्भर हैं। प्रकति, हमें जीने की कला सिखाती है, साथ ही जिस प्रकार प्रकृति अपने में परिर्वतनशील होती रहती है, उसी प्रकार हम अपने जीवन में बदलाव करने का प्रयास करते हैं। मौसम के आधार पर शिशिर ऋतु में बुनाई, कटाई और मिसाई वर्षा ऋतु में प्रकृति को श्रृंगारना और बसंत ऋतु, जिसे ऋतुओं के राजा के नाम से जाना जाता है, इसमें तो कहना ही नहीं है इस ऋतु में हम उमंग से झूम उठते हैं और विभिन्न प्रकार के लोकगीतों की सुरूआत होती है। इन लोकगीतों में मुख्य रूप से प्रकृति चित्रण देखने को मिलता है। हमारे झारखण्ड राज्य में 32 प्रकार के जनजातियों का निवास स्थल है। जिनमें कई ऐसे जनजाति समाज हैं जिन्होंने प्रकृति को संरक्षण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। जनजातीय समाज, यह एक ऐसी समाज है जिसका जन्म प्रकृति की गोद में हुई है, जो प्रकृति की रक्षक होते हैं। इनका निवास स्थल जंगलों के आस-पास होती है जो प्रकृति पर निर्भर होते हैं।
