भारत में भूस्वामित्व एवं जोताकार का कृषि विकास पर प्रभाव

दीपिका स्वर्णकार
 सहायक प्रोफेसर (भूगोल)
राजीव गांधी शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय
अंबिकापुर (छत्तीसगढ़)
डॉ. अनिल कुमार सिन्हा
प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष (भूगोल विभाग)
राजीव गांधी शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय
अंबिकापुर (छत्तीसगढ़)

Abstract

भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। देश की बड़ी आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। कृषि उत्पादन को प्रभावित करने वाले अनेक कारकों में भूमि स्वामित्व की संरचना तथा जोत का आकार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। भारत में ऐतिहासिक, सामाजिक एवं आर्थिक कारणों से भूमि का वितरण असमान रहा है तथा समय के साथ जोतों का विखंडन बढ़ता गया है। इसके परिणामस्वरूप छोटे एवं सीमांत किसानों की संख्या में वृद्धि हुई है, जिससे कृषि उत्पादन, निवेश, तकनीकी उपयोग तथा उत्पादकता प्रभावित होती है। खेतों का आकार और जोत-विखण्डन क्रिया भी कृषीय व फसल-प्रारूपों और प्रति इकाई उपज मात्रा को उतना ही प्रभावित करते हैं जितना कि भू-स्वामित्व और भूमि-धारण व्यवस्था। घनी आबादी वाले विकासशील देशों में खेतों की जोत का आकार प्रायः बहुत छोटा होता है। किसान द्वारा उठाए गए जोखिम की मात्रा खेतों व जोत के आकार पर निर्भर है। फार्म का आकार जितना अधिक बड़ा होता है काश्तकार की जोखिम वहन करने की क्षमता भी उतनी ही अधिक होती है। खेतों में यदि जोत का आकार छोटा है, काष्तकार उसमें फसल उत्पादन के सीमित साधन-सामग्री काम में लेता है और जोखिम भी कम वहन करता है। जोत आकार का सीधा संबंध प्रयोग में लायी कृषि तकनीक उपकरणों और कृषि-विशिष्टकरण (Specialization) से है। आकार के अनुसार ही काश्तकार अपने खेतों में प्रयोग करने के उपकरण सामग्री जैसे ट्रेक्टर, हारवेस्ट थ्रेसर आदि का चयन करता है। यही नहीं कृषि का विस्तार और फसलों का विषेष चयन, विषिष्ट श्रम मात्रा आदि महत्वपूर्ण निर्णय जोत के आकार पर निर्भर है।

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