| अज़हरुद्दीन (शोधार्थी) श्री खुशाल दास विश्वविद्यालय हनुमानगढ़ (राजस्थान) | डॉ. सतीश चन्द्र शोध निर्देशक, सहायक आचार्य (भूगोल) श्री खुशाल दास विश्वविद्यालय हनुमानगढ़ (राजस्थान) |
Abstract
औद्योगिक विकास को प्रायः किसी भी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति का आधार माना जाता है। विशेष रूप से औद्योगिकीकरण भारत जैसे विकासशील देश में आर्थिक सुदृढ़ता, क्षेत्रीय विकास, रोजगार सृजन व आय वृद्धि जैसे महत्वपूर्ण पक्षों को बढ़ावा देता है। किन्तु तीव्र औद्योगिक विकास के कारण पर्यावरणीय असंतुलन, वायु एवं जल प्रदूषण, भूमि क्षरण तथा प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में सतत औद्योगिक विकास की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रस्तुत अध्ययन राजस्थान के कोटपूतली–बहरोड़ जिले में सतत औद्योगिक विकास की संभावनाओं का विश्लेषण करते हुए हरित प्रौद्योगिकी के वर्तमान स्तर एवं उसकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन करता है।
दिल्ली–जयपुर औद्योगिक गलियारे पर स्थित यह क्षेत्र विविध औद्योगिक विकास का केंद्र बन चुका है। क्षेत्र में सीमेंट, ऑटोमोबाइल घटक, धातु प्रसंस्करण, रासायनिक एवं लघु-मध्यम उद्योग बड़ी संख्या में संचालित हैं। अध्ययन का उद्देश्य औद्योगिक गतिविधियों से उत्पन्न पर्यावरणीय प्रभावों—विशेषकर वायु प्रदूषण, भू-जल प्रदूषण, भूमि क्षरण एवं ध्वनि प्रदूषण—का परीक्षण करते हुए यह आकलन करना है कि क्षेत्र में हरित प्रौद्योगिकी कितनी प्रभावी रूप से अपनाई जा रही है। शोध में प्राथमिक आँकड़ों के अंतर्गत औद्योगिक इकाइयों का सर्वेक्षण एवं संरचित प्रश्नावली का उपयोग किया गया, जबकि द्वितीयक आँकड़े सरकारी रिपोर्टों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अभिलेखों एवं उपग्रह चित्रों से संकलित किए गए। स्थानिक विश्लेषण हेतु GIS आधारित तकनीकों का भी प्रयोग किया गया।
परिणामों से स्पष्ट होता है कि औद्योगिक विकास ने रोजगार सृजन, निवेश वृद्धि तथा नगरीकरण को प्रोत्साहित किया है, परंतु पर्यावरणीय दबाव भी समानांतर रूप से बढ़ा है। बड़े उद्योगों में अपशिष्ट उपचार संयंत्र (ETP), वर्षा जल संचयन, सौर ऊर्जा उपयोग तथा हरित पट्टी विकास जैसे उपाय अपेक्षाकृत बेहतर पाए गए, जबकि लघु एवं मध्यम उद्योगों में तकनीकी संसाधनों और वित्तीय सीमाओं के कारण हरित प्रौद्योगिकी का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है। अतः यह शोध निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि कोटपूतली–बहरोड़ में औद्योगिक विस्तार को
पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप रूपांतरित कर, हरित प्रौद्योगिकी को संस्थागत स्तर पर सुदृढ़ बनाते हुए एक संतुलित एवं दीर्घकालिक औद्योगिक विकास मॉडल स्थापित किया जा सकता है।
