अरावली पर्वतमाला में अवैध खनन और उसके पर्यावरणीय प्रभावों का समग्र विश्लेषण

वर्षा दीक्षित
शोधार्थी (भूगोल विभाग)
श्री खुशालदास विश्वविद्यालय
हनुमानगढ़ (राजस्थान)
डॉ. जयदेव प्रसाद शर्मा
सह आचार्य (भूगोल विभाग)
श्री खुशालदास विश्वविद्यालय
हनुमानगढ़ (राजस्थान)

Abstract

वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास की अवधारणा अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गई है। प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन ने पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों का प्रभाव अधिक स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है।

अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन भू-आकृतिक संरचनाओं में से एक है, जो उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय संतुलन, जलवायु नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण तथा जैव विविधता संरक्षण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह पर्वत श्रृंखला राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली तथा गुजरात के कुछ भागों तक विस्तृत है। विगत कुछ दशकों में इस क्षेत्र में खनिज संसाधनों के तीव्र दोहन तथा प्रशासनिक कमजोरियों के कारण अवैध खनन गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

अवैध खनन केवल आर्थिक दृष्टि से अनुचित कार्य नहीं है, बल्कि यह पर्यावरणीय विनाश, सामाजिक असमानता तथा प्राकृतिक संसाधनों के असंतुलित उपयोग का गंभीर उदाहरण है। इसके कारण पहाड़ियों का कटाव, वन क्षेत्र में कमी, भूजल स्तर में गिरावट, धूल एवं ध्वनि प्रदूषण, जैव विविधता में ह्रास तथा स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव देखे गए हैं।

इस अध्ययन का उद्देश्य अरावली क्षेत्र में अवैध खनन के कारणों, पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभावों, सरकारी नीतियों तथा संभावित समाधानों का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करना है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यदि समय रहते कठोर नियंत्रण, वैज्ञानिक प्रबंधन तथा जन सहभागिता आधारित योजनाएँ लागू नहीं की गईं, तो भविष्य में यह क्षेत्र गंभीर पारिस्थितिक संकट का सामना करेगा।

अतः इस अध्ययन के निष्कर्ष नीति-निर्माताओं, पर्यावरणविदों एवं स्थानीय प्रशासन के लिए उपयोगी मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। यह शोध न केवल समस्या की गंभीरता को उजागर करता है, बल्कि सतत एवं संतुलित विकास के लिए आवश्यक हस्तक्षेपों की दिशा भी निर्धारित करता है।

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