| Om Prakash Assistant professor (VSY) Govt. College, Sojat Pali (Rajasthan) |
Abstract
किसी भी समुदाय के लिए भूमि एक प्राथमिक संसाधन है जो सीमित है। अतः उस भूमि के अधिकतम एवं बेहतर उपयोग तथा उस पर नियन्त्रण के लिए नियोजन महत्वपूर्ण है, ताकि समुदाय के लिए उपलब्ध भूमि का अधिकतम उपयोग हो सके। आर्थिक गतिविधियों एवं भू-उपयोग का सामंजस्य वैज्ञानिक तरीके से करने के लिए नियोजन प्रक्रिया की आवश्यकता है। भौतिक नियोजन या नगर एवं प्रादेशिक नियोजन एक ऐसी पद्धति है, जो कि किसी भी नगर के भावी आकार, स्वरूप, प्रतिरूप, विकास की दिशा आदि के संबंध में महत्वपूर्ण निर्णय करने का कार्य करता है, और इन निर्णयों के क्रियान्वयन हेतु समुचित तन्त्र की रचना करती है। एक बार यदि प्रत्येक नगर के संबंध में ऐसे वृहद् निर्णय लिये जाते हैं तो दिन प्रतिदिन के मामलों पर उचित समाधान हेतु इस संपूर्ण ढांचे के सन्दर्भ में विचार कर ऐसे प्रत्येक हल का क्रियान्वयन, नगर को अपने अंतिम उद्देश्यों की प्राप्ति की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ाता है क्योंकि इस प्रकार की व्यवस्था के अन्तर्गत पृथक से न तो कोई निर्णय लिया जा सकता है और न ही किसी कार्यक्रम को एकाकी रूप से क्रियान्वित किया जा सकता है।
