मीराकांत के नाटक में सामाजिक समस्याएँ

डॉ. लोभान वर्मा

Abstract

आज का समाज भले ही आधुनिकता का चोला ओढ़ चुका है लेकिन सत्य यही है कि स्त्री की दुनिया आज भी समाज में नेपथ्य में खड़ी है। मीराकांत ने अपने नाटक के माध्यम से समाज में फैली व्यवस्था का यथार्थ वर्णन किया है जिसमें नेपथ्य राग नाटक में एक विलक्षण प्रतिभा विदुषी खना और वर्तमान की कामकाजी महिला मेधा के माध्यम से स्त्री की प्रतिभा को पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था द्वारा कुचल दिया जाता है। कंधे पर बैठा था शाप नाटक में अभिषप्त नारी जीवन तथा पुरुष का अहंभाव तथा अन्त हाजिर हो नाटक में मानव मूल्य का विघटन किस प्रकार समाज में हावी हो चुका है। आज वर्तमान में मानवीय मूल्य, मर्यादा, संस्कृति नष्ट होती जा रही है।

मुख्य शब्द: स्त्री अस्मिता, पुरुष सत्तात्मक समाज, स्त्री का शोषण, स्त्री की समस्या, लिंग भेद, यौन शोषण।

मानव जीवन का अभिन्न अंग नाटक है। नाटक मानव जीवन का कलागत स्तर पर प्रमुख आधार होता है, उसमें सभी कलाओं की समाहिति होती है। क्योंकि नाटक और लोक जीवन का गहरा संबंध प्राचीन काल से रहा है। नाटक वह विधि है, जिसमें हम भूत, भविष्य और वर्तमान को प्रत्यक्ष गतिविधियों, व्यवहारों तथा समाज का प्रतिबिम्ब प्रदर्शित करता है। नाटक केवल साधन मात्र न होकर जीवन, समाज, देश से जुड़ी हुई सच्चाई का बोध कराता है।

नाटक वह विधा है, जो जीवन और समाज से जुड़ी हुई घटना को लोगों तक प्रेषित करने का माध्यम है। आज नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम ही नहीं है, वह आज की समस्याओं को आधार बनाकर भी खेला जाता है। समाज के यथार्थ को दर्शाना तथा लोक जागरण करना आज के नाटक की महत्वपूर्ण विशेषता है।

‘‘आज का नाटक दर्शक को प्राचीन मान्यतानुसार आनंद प्राप्ति ही नहीं करता वरन् उसे विक्षुब्ध व विचलित करता है। युग के विसंगत परिवेश और उसमें छटपटाते मनुष्य की पीड़ा को स्वर देना नये नाटककार का कर्तव्य बन गया है, जिसकी पूर्ति के लिए कथानक और शिल्प के धरातल पर अनेक प्रयोग हो रहे हैं।’’1

स्वतन्त्रता के बाद हिन्दी नाटक में अनेक राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एव सांस्कृतिक परिवेश में तेजी से वृद्धि हुआ है। स्वतन्त्रता के बाद महिला नाटककार ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जैसे- त्रिपुरारी शर्मा, आशा वर्मा, रामकुमारी चौहान, विमला रैना, मन्नू भण्डारी, मृदुला गर्ग, शांति मेहरोत्रा, मृणाल पाण्डे, कुसुम कुमार व मीराकांत महत्वपूर्ण लेखिका हैं।

मीराकांत लगभग दो दशक से निरंतर साहित्य का सृजन कर रही हैं। इन्होंने अनेक महत्वपूर्ण नाटक लिखी हैं जिन्हें लोगों द्वारा बहुत प्रशंसा मिली। साथ ही इनके द्वारा लिखे गये कई उपन्यास, कहानियाँ और लम्बी कविताएँ भी बहुत चर्चित रही हैं। आज भी ये लेखन कार्य में निरंतर रत हैं।

मीराकांत ऐसी महिला लेखिकाओं के बीच एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं, मीराकांत  ने अपनी प्रशस्त लेखनी से साहित्य व समाज के रूप को मुकम्मल बनाने का जी-तोड़ कोशिश की है। मीराकांत ने बदलते परिवेश में स्त्री के संघर्षों, अधिकारों, शोषण एवं विद्रोहों का यथार्थ चित्रण करने के साथ-साथ स्त्री अस्मिता से जुड़े गंभीर प्रश्नों पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। मीराकांत ने अपनी रचनाओं में स्त्री संघर्षों, अधिकारों तथा उनसे जुड़ी समस्याओं को नाटकों का महत्वपूर्ण आधार बनाया है।

मीराकांत ने अपने नाटकों में ऐतिहासिक, पौराणिक पात्रों को आधुनिक परिवेश में प्रस्तुत किया है। जनश्रुतियों को अपनी कल्पना से जोड़ते हुए तत्कालीन ज्वलंत समस्याओं पर व्यक्त किया है। एरिक फ्राक ने कहा है कि ‘‘स्त्री की दुनिया में पराधीनताओं के इतने स्तर हैं और वे इतनी नयी-नयी शक्लों में आती रहती हैं कि स्वतंत्रता की कामना करना भी उसे जोखिम भरा लगता है।’’2

कार्यरत नारी की समस्याएँ-

‘नेपथ्यराग’ नाटक में कामकाजी महिलाओं की समस्या को ऐतिहासिक घटना से तुलना करते हुए बताया है। धरती से लेकर आकाश तक नारी ने अपने अस्तित्व का विस्तार किया। वह स्वयं को दृढ़ बनाकर परिस्थितियों का निडर होकर सामना कर रही है। घर ही नहीं, बाहर अपने-अपने कार्य-क्षेत्र में भी अपनी विद्वता, विवके का परिचय दिया है। ‘‘पुरूष प्रधान समाज में स्त्री के सम्मान और आत्मसम्मान को जो चोट पहुंचायी जाती है, वह भी शोषण का ही एक रूप है जिसे स्वाभाविक मानकर बढ़ाया जाता है।’’3

मेधा दफ्तर में अपनी कार्य कुशलता के कारण प्रभारी के रूप में नियुक्त हुई पर पुरूष कर्मचारियों को एक स्त्री के अधिकारों के तहत काम करना पसंद न था। मेधा अपने दफ्तर में तनाव को महसूस करती है। दफ्तर में सामंजस्यपूर्ण वातावरण की स्थापना के लिए वह हर संभव कोशिश करती है पर पुरूष कर्मचारी सदा उसकी बात का विरोध करते थे, उसे किसी भी प्रकार का सहयोग न देते थे।

ऑफिस के तनाव से मेधा परेशान सी रहने लगती है। तब उसकी माँ खना की कहानी सुनाकर उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। खना, मालवगण नायक के नवरत्नों में से एक वराहमिहिर की पुत्र वधु है। खना ने अपने ससुर से ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया, वह निरंतर अध्ययन करती रहती थी और कुछ ही महीनों में ज्योतिष शास्त्र में पारंगत हो गयी। विक्रमादित्य उसकी प्रतिभा से प्रसन्न होकर उसे अपना सभासद बनाना चाहते हैं पर सभी लोग इसका विरोध करते हैं।

‘‘वराहमिहिर- (स्वर में ग्लानि और खना की ओर देखे बिना) उनका कहना है कि यदि सभासद बने तो पहले उसकी जीभ काट ली जाये’’

‘‘खना- (करूणामयी मुस्कान के साथ स्वागत) स्त्री सभासद पिताश्री आप तो व्यर्थ ही चिंतित हैं। श्रावण क्या यह तो आषाढ़ से भी पहले के मेघ हैं। बरसेंगे नहीं। आषाढ़ अभी नहीं आया….. आषाढ़ आने में कई सवंत्सर बीत जायेंगे…. कइ युग…. यह नेपथ्य है…. इसे मंच तक पहुंचने में समय लगेगा…. कल्पांत…. कई युग।’’4

खना के इस संवाद में नारी की दीन स्थिति दिखायी पड़ती है। खना के ज्ञान का आलोक फैलने से पहले ही बुझा दिया गया। कहा जाता है कि उसकी जबान काट दी गयी ताकि वह फिर कभी ज्योतिष शास्त्र की गणना न कर सके। आज भी कई खना और मेधा हैं जो अभी भी योग्यताएँ होने पर भी स्त्री होने के कारण शाप सिद्ध हो रही हैं। अतः आज भी नारी अंतरिक्ष तक पहुँचकर भी नेपथ्य में खड़ी हुई-सी प्रतीत होता है। स्त्री हर समय, हर युग में, घर में, बाहर में अपमान एवं तिरस्कार की नजरों से देखा जाता है।

‘कन्धे पर बैठा था शाप’ में अभिषप्त नारी जीवन का यथार्थ वर्णन है। जीवन के उतार-चढ़ाव मे कई परिवर्तन होते रहे हैं। ये परिवर्तन कभी मानव को सुख पहुंचाते हैं, कभी दुःख अनुभव बनकर जीवन भर के लिए साथ रह जाते हैं पर नारी को हर हाल में परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने की कोशिश करनी पड़ती है। नारी की इच्छा-अनिच्छा का कोई महत्व नहीं रहा। वह अपनी आकांक्षाआें, अरमानों का गला अपने ही हाथों से विवश होकर घोंट रही हैं। ‘कन्धे पर बैठा था शाप’ नाटक में लेखिका ने गणिकाओं के जीवन की त्रासद स्थितियों को प्रस्तुत किया है। कामिनी सिंहलद्वीप के नरेश कुमारदास से प्रेम करती है। वह उसकी अर्द्धांगिन बनने का स्वप्न देखती है। उसके प्रेम में राज वैभव व लोभ से बढ़कर, मर्यादित प्रेम की आकांक्षा नजर आती है पर राजम्मा अपने जीवनानुभवों के आधार पर उसे समझाने के प्रयास में कहती है कि-

‘‘राजम्मा- माना सिंहलनरेश कोमल स्वभाव के हैं, कवि हृदय पाया है उन्होंने… औरों से वास्तव में भिन्न भी है पर जानती हूँ… मैंने देखा है…. देहरी के अन्दर और देहरी के बाहर की दूर हाथ भी की नहीं… ये दो संसार हैं…. बिल्कुल भिन्न-भिन्न संसार है। वह औरों की भांति परास्त न होगी और देखो विडंबना…. सब यही सोचती हैं कि उसका प्रेमी औरों जैसा नहीं…. परन्तु भीतर और बाहर की दूरी सबके लिए सदैव उतनी ही रहती है।’’5

प्राचीन समय में गणिकाओं और आज के युग को वेश्याओं की स्थिति में किसी प्रकार का सुधार नजर नहीं आता। कामिनी के हृदय में कुमारदास के प्रति जो अनुराग था, उसे लोभ कहकर नहीं टाला जा सकता। वास्तव मे जिस तरह नारी परम्राओं के घेरे में विवाह बंधन की पवित्रता में बंधकर स्वयं को सुरक्षित महसूस करती है। कामिनी के हृदय में भी नारी की सहज मर्यादित प्रेम की आकांक्षा नजर आती है।

‘‘कामिनी- यह अंशों में बढ़ा वसंत अब सुवास नहीं देता….. इसकी सुगंध मिलने से पहले ही खो जाती है…. मैं संपूर्ण देकर संपूर्ण पाना चाहती हूँ।’’6

कामिनी की बातों को सुनकर कुमारदास अपने श्लोक के अधूरे भाव को पूरा करने पर ही विवाह करने का निर्णय बताते हैं पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था- श्लोक कालिदास द्वारा पूरा होने पर भी उनका विष पेय पीकर अंतिम सांस छोड़ना और मृत्यु के बाद गोद में सो जाना और मित्र कालिदास की चिता में कुमारदास का होम हो जाने में एक तड़प नजर आती है।

सभी को कालिदास के लिए कुमारदास का उसी चिता में जल जाना दिखाई दिया पर कामिनी की आकुल की तड़प जो कुमारदास को पाने की थी, वह नजर न आयी।

‘‘राजम्मा- कालिदास को दिया विष सबको स्मरण रहेगा पर कुमारदास को पाने की तेरी आकुल तड़प कोई न समझ पायेगा।’’7

सदियों से नारी के व्यक्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। समाज में गणिकाएँ श्रृंगारात्मक सौंदर्यात्मक साधन माने जाते थे पर आज गणिकाएँ (वेश्याएँ) ही नहीं राह चलती औरतों पर भी जबरदस्ती अत्याचार किया जा रहा है।

पुरुष का अहंभाव-

पुरुष वर्ग सदा अपने निर्णयों को आदेशों को सब पर लागू करने का अधिकार रखते हैं। परिवार में अपनी पत्नी से या अन्य स्त्री वर्ग से विचार-विमर्श करना उन्हें सुहाता नहीं है। वे अपने एक अहंभाव को ही महत्व देते हैं पर इससे पारस्परिक संबंधों के बीच की दूरियाँ बढ़ने लगती है।

पुरुष नारी को सदा विवेकहीन, शक्तिहीन, बुद्धिहीन के रूप में मानकर उसकी उपेक्षा करता है। ‘कंधे पर बैठा था शाप’ नाटक में पहले विद्योत्तमा का मूढ़पति कालिदास से विवाह कराकर धोखा दिया गया। फिर उसकी ही सत्प्रेरणा से जड़बुद्धि कालिदास कवि कालिदास के उच्च शिखर तक पहुंचकर भी उसे पत्नी का मान न देकर दोबारा छला गया।

‘‘कालिदास : जिस स्त्री ने मेरे जीवन को कीर्ति के इस शिखर तक पहुंचाया उसे गुरू के अतिरिक्त किसी अन्य रूप में अंगीकार करना मेरे लिए पाप होगा।

विद्योत्तमा : तो यह एक पति का निर्णय है….. स्वामी का! तो पतिदेव बतायेंगे कि आपकी यह परित्यक्ता पत्नी अब अपने जीवन का क्या करे? आप स्वयं अपना जीवन कैसे बताना चाहते हैं और निर्णय आप ले चुके हैं…. पत्नी के बारे में विचार किये बिना…. (व्यंग्य से) निर्णय- हाँ निर्णय! पुरुष का एकता निर्णय… सदा की भांति एक पक्षीय।’’8

पति-पत्नी के संबंधों में आज पारस्परिक समानता साझेदारी के स्थान विशेषाधिकार प्राप्त करना ही लक्ष्य बन चुका है। विद्योत्तमा की भांति कई स्त्रियाँ अपनी इच्छाओं को पुरुष वर्ग के एक पक्षीय निर्णयों के समक्ष टूटता हुआ सा पाती है। आज की नारी जितना भी स्वयं को सक्षम साबित करने का प्रयास करती है, पर सदा से ही उसे बुद्धि और दे हके स्तर पर चुनाव करने की स्वतंत्रता नहीं दी जाती है।

नारी को केवल पुस्तकीय एवं भाषण के दौरान सबला कहा जाता है पर वास्तव में विद्योत्तमा जैसी प्रज्ञावान नारी को कभी पूर्ण होने का अवसर ही नहीं दिया जाता है। इस तरह आज के युग पुरुष का अहंभाव एवं एकपक्षीय फैसलों से पति-पत्नी के बीच समानता के मूल्यों का उपहास हो रहा है।

मूल्यहीन विघटन-

आज के वैज्ञानिक युग में मनुष्य ग्रह-ग्रहांतारों तक पहुँचकर नवीन आविष्कार कर रहा है पर उसकी सोच में स्त्री आज भी देह की भूख मिटाने वाली वस्तु मात्र ही है। इसी तथ्य पर आधारित ‘अंत हाजिर हो’ नाटक है।

इस नाटक में बदलते रिश्तों की मान्यताओं को उजागर कर दिया है। पितृ देवो भवः अर्थात् पिता हमारे लिए देवतुल्य है। हमें संस्कार की सीख देते हैं। हमारे भीतर सदाचारिता के बीज बोते हैं और हमारा मार्गदर्शन देते हैं परन्तु इस नाटक में छोटी के पापा काम-पिशाच के रूप में दिखायी देते हैं। छोटी के पापा प्रोफेसर होते हुए भी जानवरों की तरह अपनी काम वासना को तृप्त करने के लिए बेटियों को शिकार बनाते हैं। ‘‘अनुदीदी पलंग पर अधलेटी सी थी… और पापा उसके ऊपर लेटे हुए थे।’’9

मूल्य, मानव के विकासशील जीवन का लक्ष्य और उपलब्धि है। इसके संबंध में अज्ञेय का कहना है कि ‘‘अनुभव की भित्ति पर बुद्धि द्वारा प्रतिष्ठित तत्व को प्रतिमान मानते हैं तो मुक्तिबोध भावना से सिक्त आलोचना के सूक्ष्म में मूल्य का अस्तित्व पाते हैं।’’10

इस तरह मानवीय रिश्ते खोखले होते जा रहे हैं। समाज में नैतिकता का गला घोंटा जा रहा है। इसी नाटक में वृद्धा की पोती और बहू एक ही व्यक्ति से नाजायज संबंध रखते हैं।

‘‘वृद्धा : उसने तो ऐसी मोहिनी फेरी की बैचारी बच्ची की बुद्धि भ्रष्ट हो गयी। दोनों मां-बेटी उसी से…. वो दिन और आज का दिन सलोनी के दिमाग से वो निकले ही न है।’’11

निष्कर्ष-

लेखिका ने समाज में हो रही नारी शोषण, स्त्री की संवेदना, पुरूष प्रधान समाज, मूल्य विघटन, जीवन का असंतुलन तथा समाज में कार्यरत नारी की समस्याएँ, युवा वर्ग में व्याप्त असंतोष की भावना, सामाजिक विसंगतियाँ, भ्रष्ट नीतियों का खुलकर विरोध किया है तथा समाज के विभिन्न स्थितियों को बड़ी कलात्मकता के साथ उजागर किया है। केवल प्रयास ही नहीं किया बल्कि उसका समाधान भी सरल व सहज रूप में प्रस्तुत किया है।

संदर्भ सूची

  1. डॉ. रीता कुमार, स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटक, मोहन-राकेश के विशेष सन्दर्भ में, पृ. 154-155
  2. डॉ. मीनाक्षी व्यास, नारी चेतना और सामाजिक विधान, पृ. 10
  3. वृंदा करात, जीवन है तो लड़ना होगा, पृ. 14
  4. मीराकांत नेपथ्यराग, पृ. 61-62
  5. मीराकांत, कंधे पर बैठा था शाप, पृ. 25
  6. वही, पृ. 28
  7. वही, पृ. 60
  8. वही, पृ. 54-55
  9. मीराकांत, अंत हाजिर हो, पृ. 398-399
  10. डॉ. बालचंद्र, साठोत्तरी हिन्दी नाटक परम्परा और प्रयोग, पृ. 101
  11. मीराकांत, अंत हाजिर हो, पृ. 370
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