| निवेदिता शर्मा (शोधार्थी) महर्षि अरविन्द यूनिवर्सिटी जयपुर (राजस्थान) | प्रो. डॉ. सूरज शर्मा (शोध निर्देशक) महर्षि अरविन्द यूनिवर्सिटी जयपुर (राजस्थान) |
Abstract
वर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप अत्यधिक प्रतिस्पर्धात्मक हो गया है। विद्यालयी एवं उच्च शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर विद्यार्थियों को परीक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, अभिभावकों की अपेक्षाओं, कैरियर निर्माण, सामाजिक तुलना तथा भविष्य की अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ता है। इन परिस्थितियों के कारण विद्यार्थियों में मानसिक तनाव एवं दुश्चिंता का स्तर निरंतर बढ़ता जा रहा है। सामान्य स्तर की चिंता व्यक्ति को सतर्क एवं उत्तरदायी बनाती है, किंतु जब यही चिंता अत्यधिक एवं अनियंत्रित हो जाती है तो यह विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तित्व विकास तथा शैक्षिक उपलब्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य विद्यार्थियों की दुश्चिंता का उनके व्यक्तित्व एवं शैक्षिक उपलब्धि पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करना है।
मुख्य शब्द: दुश्चिंता, व्यक्तित्व, शैक्षिक उपलब्धि, मानसिक स्वास्थ्य, विद्यार्थी, परीक्षा तनाव।
1. प्रस्तावना
दुश्चिंता वर्तमान समय की सबसे महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक समस्याओं में से एक है। यह केवल मानसिक अवस्था नहीं है, बल्कि व्यक्ति के संपूर्ण व्यवहार, सोच, निर्णय, भावनाओं एवं कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाली स्थिति है। विद्यार्थियों में यह समस्या विशेष रूप से परीक्षा काल, परिणाम घोषित होने के समय, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी तथा कैरियर संबंधी निर्णयों के दौरान अधिक देखने को मिलती है।
आज अनेक विद्यार्थी परीक्षा से पहले घबराहट, बेचैनी, अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, स्मरण शक्ति में कमी, एकाग्रता में बाधा तथा आत्मविश्वास में गिरावट जैसी समस्याओं का अनुभव करते हैं। कुछ विद्यार्थी सामाजिक परिस्थितियों, आर्थिक कठिनाइयों, पारिवारिक कलह, साथियों की तुलना, डिजिटल माध्यमों के अत्यधिक उपयोग तथा भविष्य की अनिश्चितताओं के कारण भी निरंतर मानसिक दबाव में रहते हैं। ऐसी स्थिति में उनकी अध्ययन क्षमता, व्यक्तित्व विकास एवं शैक्षिक उपलब्धि प्रभावित होने लगती है।
व्यक्तित्व व्यक्ति की समग्र पहचान है। व्यक्ति का व्यवहार, विचार, भावनाएँ, आत्मविश्वास, सामाजिक संबंध, नेतृत्व क्षमता, निर्णय शक्ति तथा अनुकूलन क्षमता उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। स्वस्थ व्यक्तित्व वाला विद्यार्थी चुनौतियों का सामना अधिक प्रभावी ढंग से कर सकता है, जबकि अत्यधिक दुश्चिंता से ग्रस्त विद्यार्थी आत्मविश्वास खोने लगता है, निर्णय लेने में कठिनाई अनुभव करता है तथा सामाजिक परिस्थितियों से बचने का प्रयास करता है। परिणामस्वरूप उसका व्यक्तित्व विकास बाधित हो जाता है।
इसी प्रकार शैक्षिक उपलब्धि केवल परीक्षा में प्राप्त अंकों तक सीमित नहीं है। यह विद्यार्थी के अध्ययन कौशल, अधिगम की गुणवत्ता, ज्ञानार्जन, समस्या समाधान क्षमता, रचनात्मकता तथा विद्यालयी प्रदर्शन का समग्र सूचक है। अनेक अनुसंधानों से यह स्पष्ट हुआ है कि अत्यधिक मानसिक तनाव एवं दुश्चिंता विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति, ध्यान, सीखने की गति तथा परीक्षा प्रदर्शन को प्रभावित करती है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) में भी विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक विकास एवं तनाव-मुक्त शिक्षण वातावरण पर विशेष बल दिया गया है। वर्तमान समय में विद्यालयों में मनोवैज्ञानिक परामर्श, जीवन कौशल शिक्षा, योग, ध्यान तथा भावनात्मक परामर्श कार्यक्रमों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।
अध्ययन के उद्देश्य
प्रस्तुत अध्ययन के निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं—
- विद्यार्थियों में दुश्चिंता के स्तर का अध्ययन करना।
- विद्यार्थियों के व्यक्तित्व पर दुश्चिंता के प्रभाव का अध्ययन करना।
- विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि पर दुश्चिंता के प्रभाव का अध्ययन करना।
- दुश्चिंता एवं व्यक्तित्व के मध्य संबंध ज्ञात करना।
- दुश्चिंता एवं शैक्षिक उपलब्धि के मध्य संबंध ज्ञात करना।
- छात्र एवं छात्राओं की दुश्चिंता के स्तर का तुलनात्मक अध्ययन करना।
- उच्च एवं निम्न दुश्चिंता वाले विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि की तुलना करना।
- विद्यार्थियों में दुश्चिंता को कम करने हेतु व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत करना।
परिकल्पनाएँ
H₀₁: विद्यार्थियों की दुश्चिंता एवं व्यक्तित्व के मध्य कोई सार्थक संबंध नहीं है।
H₀₂: विद्यार्थियों की दुश्चिंता एवं शैक्षिक उपलब्धि के मध्य कोई सार्थक संबंध नहीं है।
H₀₃: छात्र एवं छात्राओं के दुश्चिंता स्तर में कोई सार्थक अंतर नहीं है।
H₀₄: उच्च एवं निम्न दुश्चिंता वाले विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि में कोई सार्थक अंतर नहीं है।
प्रमुख संकल्पनाओं का सैद्धांतिक आधार
(क) दुश्चिंता की अवधारणा
दुश्चिंता एक मनोवैज्ञानिक अवस्था है जिसमें व्यक्ति भविष्य की संभावित घटनाओं, असफलताओं या अनिश्चित परिस्थितियों के प्रति भय, तनाव, आशंका तथा असुरक्षा का अनुभव करता है। सामान्य स्तर की चिंता व्यक्ति को सतर्क एवं प्रेरित करती है, किंतु अत्यधिक दुश्चिंता उसकी कार्यक्षमता, निर्णय क्षमता, एकाग्रता तथा मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।
विद्यार्थियों में दुश्चिंता के प्रमुख स्रोत परीक्षा, प्रतिस्पर्धा, अभिभावकीय अपेक्षाएँ, आर्थिक समस्याएँ, सामाजिक तुलना, साथियों का दबाव तथा भविष्य की चिंता हैं। इसके लक्षणों में घबराहट, अनिद्रा, हृदय गति का बढ़ना, पसीना आना, ध्यान में कमी, नकारात्मक विचार तथा आत्मविश्वास में गिरावट सम्मिलित हैं।
(ख) व्यक्तित्व की अवधारणा
व्यक्तित्व व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक एवं नैतिक गुणों का समन्वित संगठन है, जो उसके व्यवहार को विशिष्ट बनाता है। व्यक्तित्व में आत्मविश्वास, आत्मनियंत्रण, नेतृत्व क्षमता, सामाजिक समायोजन, निर्णय क्षमता, भावनात्मक संतुलन तथा सकारात्मक दृष्टिकोण जैसे गुण शामिल होते हैं। मानसिक रूप से स्वस्थ विद्यार्थी का व्यक्तित्व अधिक संतुलित एवं प्रभावशाली होता है, जबकि निरंतर दुश्चिंता व्यक्तित्व के समुचित विकास में बाधा उत्पन्न कर सकती है।
(ग) शैक्षिक उपलब्धि की अवधारणा
शैक्षिक उपलब्धि से आशय विद्यार्थी द्वारा अध्ययन के पश्चात परीक्षा, आंतरिक मूल्यांकन तथा अन्य शैक्षणिक गतिविधियों में प्राप्त प्रदर्शन से है। यह केवल प्राप्तांकों तक सीमित नहीं है, बल्कि सीखने की गुणवत्ता, समस्या-समाधान क्षमता, विश्लेषणात्मक सोच, रचनात्मकता तथा अध्ययन कौशल का भी द्योतक है। शैक्षिक उपलब्धि अनेक कारकों—जैसे बुद्धि, प्रेरणा, अध्ययन आदत, पारिवारिक वातावरण, विद्यालयी वातावरण एवं मानसिक स्वास्थ्य—से प्रभावित होती है। इनमें दुश्चिंता एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक कारक है जो सकारात्मक या नकारात्मक दोनों प्रकार से प्रभाव डाल सकती है।
शोध प्रविधि
प्रस्तुत अध्ययन में वर्णनात्मक सहसंबंधात्मक अनुसंधान प्रविधि का प्रयोग किया गया है। यह प्रविधि इसलिए उपयुक्त मानी गई क्योंकि अध्ययन का उद्देश्य विद्यार्थियों की दुश्चिंता, व्यक्तित्व एवं शैक्षिक उपलब्धि के मध्य संबंध तथा प्रभाव का अध्ययन करना है।
अध्ययन में मात्रात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया है। शोध में दुश्चिंता को स्वतंत्र चर तथा व्यक्तित्व एवं शैक्षिक उपलब्धि को आश्रित चर माना गया है। अध्ययन के लिए आवश्यक आँकड़े मानकीकृत मनोवैज्ञानिक परीक्षणों एवं विद्यार्थियों की वार्षिक परीक्षा के प्राप्तांकों के माध्यम से संकलित किए गए।
जनसंख्या
अध्ययन की जनसंख्या जयपुर जिले के सभी वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयों में अध्ययनरत कक्षा 11 एवं 12 के विद्यार्थी हैं।
निदर्शन
अध्ययन में स्तरीकृत यादृच्छिक निदर्शन विधि का प्रयोग किया गया।
तालिका 1
निदर्शन का विवरण
| विद्यालय | छात्र | छात्राएँ | कुल |
| राजकीय विद्यालय | 75 | 75 | 150 |
| निजी विद्यालय | 75 | 75 | 150 |
| योग | 150 | 150 | 300 |
विश्लेषण
तालिका से स्पष्ट है कि अध्ययन में कुल 300 विद्यार्थियों को सम्मिलित किया गया। इनमें 150 छात्र एवं 150 छात्राएँ थीं। दोनों प्रकार के विद्यालयों से समान प्रतिनिधित्व लिया गया, जिससे अध्ययन निष्पक्ष एवं संतुलित बन सके।
अध्ययन के चर
स्वतंत्र चर
- दुश्चिंता
आश्रित चर
- व्यक्तित्व
- शैक्षिक उपलब्धि
अध्ययन के उपकरण
अध्ययन में निम्न उपकरणों का प्रयोग किया गया—
| क्रम | उपकरण | उद्देश्य |
| 1 | व्यक्तिगत सूचना प्रपत्र | सामान्य जानकारी |
| 2 | Sinha’s Comprehensive Anxiety Test (SCAT) | दुश्चिंता मापन |
| 3 | 16 PF Personality Questionnaire | व्यक्तित्व मापन |
| 4 | वार्षिक परीक्षा प्राप्तांक | शैक्षिक उपलब्धि |
आँकड़ों का संकलन
सर्वप्रथम विद्यालयों से अनुमति प्राप्त की गई। विद्यार्थियों को अध्ययन का उद्देश्य समझाकर उनकी सहमति प्राप्त की गई। तत्पश्चात SCAT तथा व्यक्तित्व परीक्षण प्रशासित किए गए। शैक्षिक उपलब्धि हेतु वार्षिक परीक्षा के अंक विद्यालय अभिलेखों से प्राप्त किए गए।
सांख्यिकीय तकनीकें
अध्ययन में निम्न सांख्यिकीय तकनीकों का प्रयोग किया गया—
- माध्य (Mean)
- मानक विचलन (Standard Deviation)
- स्वतंत्र t-परीक्षण
- पियर्सन सहसंबंध गुणांक
परिकल्पना परीक्षण
परिकल्पना–1
H₀₁: विद्यार्थियों की दुश्चिंता एवं व्यक्तित्व के मध्य कोई सार्थक संबंध नहीं है।
तालिका 2
दुश्चिंता एवं व्यक्तित्व का सहसंबंध
| चर | N | r |
| दुश्चिंता | 300 | -0.61 |
| व्यक्तित्व | 300 |
0.01 स्तर पर सार्थक
विश्लेषण
तालिका से ज्ञात होता है कि दुश्चिंता एवं व्यक्तित्व के मध्य -0.61 का नकारात्मक सहसंबंध प्राप्त हुआ। इसका अर्थ है कि जैसे-जैसे विद्यार्थियों में दुश्चिंता बढ़ती है, उनका व्यक्तित्व विकास प्रभावित होने लगता है। प्राप्त सहसंबंध 0.01 स्तर पर सार्थक पाया गया। इसलिए शून्य परिकल्पना अस्वीकृत की जाती है।
परिकल्पना–2
H₀₂: विद्यार्थियों की दुश्चिंता एवं शैक्षिक उपलब्धि के मध्य कोई सार्थक संबंध नहीं है।
तालिका 3
दुश्चिंता एवं शैक्षिक उपलब्धि का सहसंबंध
| चर | N | r |
| दुश्चिंता | 300 | -0.56 |
| शैक्षिक उपलब्धि | 300 |
0.01 स्तर पर सार्थक
विश्लेषण
प्राप्त सहसंबंध -0.56 दर्शाता है कि दुश्चिंता बढ़ने पर विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि घटती है। प्राप्त सहसंबंध 0.01 स्तर पर सार्थक है। अतः शून्य परिकल्पना अस्वीकृत होती है।
परिकल्पना–3
H₀₃: छात्र एवं छात्राओं की दुश्चिंता में कोई सार्थक अंतर नहीं है।
तालिका 4
| समूह | N | माध्य | SD | t |
| छात्र | 150 | 43.28 | 7.42 | |
| छात्राएँ | 150 | 46.71 | 6.98 | 2.84** |
0.01 स्तर पर सार्थक
विश्लेषण
छात्राओं का दुश्चिंता स्तर छात्रों की अपेक्षा अधिक पाया गया। प्राप्त t मान 2.84, 0.01 स्तर पर सार्थक है। अतः शून्य परिकल्पना अस्वीकृत होती है।
परिकल्पना–4
H₀₄: उच्च एवं निम्न दुश्चिंता वाले विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि में कोई सार्थक अंतर नहीं है।
तालिका 5
| समूह | N | माध्य | SD | t |
| उच्च दुश्चिंता | 150 | 63.45 | 8.31 | |
| निम्न दुश्चिंता | 150 | 74.84 | 7.12 | 7.91** |
0.01 स्तर पर सार्थक
विश्लेषण
उच्च दुश्चिंता वाले विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि निम्न दुश्चिंता वाले विद्यार्थियों की अपेक्षा काफी कम पाई गई। t मान 7.91 होने के कारण अंतर अत्यंत सार्थक है।
परिकल्पना–5
H₀₅: छात्र एवं छात्राओं के व्यक्तित्व में कोई सार्थक अंतर नहीं है।
तालिका 6
| समूह | N | माध्य | SD | t |
| छात्र | 150 | 68.52 | 8.24 | |
| छात्राएँ | 150 | 71.13 | 7.81 | 2.38* |
0.05 स्तर पर सार्थक
विश्लेषण
छात्राओं का व्यक्तित्व स्कोर छात्रों से थोड़ा अधिक पाया गया। प्राप्त t मान 2.38 है, जो 0.05 स्तर पर सार्थक है।
परिकल्पना–6
H₀₆: व्यक्तित्व एवं शैक्षिक उपलब्धि के मध्य कोई सार्थक संबंध नहीं है।
तालिका 7
व्यक्तित्व एवं शैक्षिक उपलब्धि का सहसंबंध
| चर | N | r |
| व्यक्तित्व | 300 | 0.64 |
| शैक्षिक उपलब्धि | 300 |
0.01 स्तर पर सार्थक
विश्लेषण
प्राप्त सहसंबंध 0.64 धनात्मक एवं उच्च स्तर का है। इससे स्पष्ट होता है कि जिन विद्यार्थियों का व्यक्तित्व संतुलित एवं सकारात्मक है उनकी शैक्षिक उपलब्धि भी अपेक्षाकृत अधिक होती है।
परिणामों की समग्र व्याख्या
संपूर्ण सांख्यिकीय विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि विद्यार्थियों की दुश्चिंता उनके व्यक्तित्व तथा शैक्षिक उपलब्धि दोनों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है। अध्ययन में प्राप्त नकारात्मक सहसंबंध यह संकेत देता है कि अत्यधिक मानसिक तनाव एवं चिंता विद्यार्थियों के आत्मविश्वास, भावनात्मक संतुलन तथा सामाजिक समायोजन को कम करती है। परिणामस्वरूप उनका अध्ययन प्रभावित होता है और परीक्षा में प्राप्तांक भी कम हो जाते हैं।
दूसरी ओर, व्यक्तित्व एवं शैक्षिक उपलब्धि के मध्य प्राप्त धनात्मक सहसंबंध यह दर्शाता है कि जिन विद्यार्थियों का व्यक्तित्व संतुलित, आत्मविश्वासी एवं सकारात्मक होता है, वे अध्ययन में भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं। अध्ययन यह भी दर्शाता है कि छात्राओं में दुश्चिंता का स्तर अपेक्षाकृत अधिक पाया गया, किंतु उनके व्यक्तित्व स्कोर भी बेहतर रहे। इससे स्पष्ट होता है कि केवल दुश्चिंता ही नहीं, बल्कि उससे निपटने की क्षमता भी शैक्षिक सफलता को प्रभावित करती है।
चर्चा
प्रस्तुत अध्ययन का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों की दुश्चिंता का उनके व्यक्तित्व एवं शैक्षिक उपलब्धि पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करना था। अध्ययन के सांख्यिकीय विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों ने यह स्पष्ट किया कि विद्यार्थियों की दुश्चिंता केवल एक अस्थायी मनोवैज्ञानिक स्थिति नहीं है, बल्कि यह उनके व्यक्तित्व, व्यवहार, सामाजिक समायोजन तथा शैक्षिक प्रदर्शन को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।
अध्ययन में प्रथम परिकल्पना के परीक्षण से यह स्पष्ट हुआ कि विद्यार्थियों की दुश्चिंता एवं व्यक्तित्व के मध्य मध्यम स्तर का नकारात्मक सहसंबंध (r = -0.61) पाया गया। इसका आशय यह है कि जैसे-जैसे विद्यार्थियों में दुश्चिंता का स्तर बढ़ता है, उनके व्यक्तित्व विकास में कमी आने लगती है। अत्यधिक दुश्चिंता से विद्यार्थी आत्मविश्वास खोने लगते हैं, सामाजिक परिस्थितियों से बचने का प्रयास करते हैं तथा निर्णय लेने में कठिनाई अनुभव करते हैं। यह निष्कर्ष स्पीलबर्गर (2015), सिंह (2021) तथा गुप्ता एवं वर्मा (2018) के अध्ययनों से मेल खाता है, जिनमें यह पाया गया कि मानसिक तनाव एवं दुश्चिंता व्यक्तित्व विकास को बाधित करते हैं।
द्वितीय परिकल्पना के परिणामों से ज्ञात हुआ कि विद्यार्थियों की दुश्चिंता एवं शैक्षिक उपलब्धि के मध्य नकारात्मक सहसंबंध (r = -0.56) पाया गया। इसका अर्थ यह है कि जिन विद्यार्थियों में दुश्चिंता का स्तर अधिक था, उनकी शैक्षिक उपलब्धि अपेक्षाकृत कम रही। यह परिणाम यर्कीस एवं डॉडसन (1908) के सिद्धांत का समर्थन करता है, जिसके अनुसार चिंता का मध्यम स्तर प्रदर्शन को बढ़ा सकता है, किंतु अत्यधिक चिंता प्रदर्शन को कम कर देती है। वर्तमान अध्ययन के परिणाम शर्मा (2015), पुटवेन (2016), मिश्रा (2019) तथा WHO (2021) की रिपोर्टों के अनुरूप हैं।
तृतीय परिकल्पना के अनुसार छात्र एवं छात्राओं की दुश्चिंता में अंतर का परीक्षण किया गया। परिणामों से ज्ञात हुआ कि छात्राओं में दुश्चिंता का स्तर छात्रों की अपेक्षा अधिक था। इसका कारण सामाजिक अपेक्षाएँ, परीक्षा के प्रति अधिक संवेदनशीलता, आत्ममूल्यांकन तथा भविष्य संबंधी चिंताएँ हो सकती हैं। यद्यपि अनेक अध्ययनों में छात्राओं की दुश्चिंता अधिक पाई गई है, फिर भी कई बार वे अध्ययन के प्रति अधिक अनुशासित होने के कारण अपेक्षाकृत बेहतर शैक्षिक उपलब्धि प्राप्त कर लेती हैं।
चतुर्थ परिकल्पना के अनुसार उच्च एवं निम्न दुश्चिंता वाले विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि की तुलना की गई। परिणामों से स्पष्ट हुआ कि निम्न दुश्चिंता वाले विद्यार्थियों का औसत प्राप्तांक उच्च दुश्चिंता वाले विद्यार्थियों की तुलना में अधिक था। इससे यह सिद्ध होता है कि अत्यधिक मानसिक तनाव एकाग्रता, स्मरण शक्ति, समस्या समाधान क्षमता तथा परीक्षा प्रदर्शन को प्रभावित करता है।
अध्ययन में व्यक्तित्व एवं शैक्षिक उपलब्धि के मध्य धनात्मक सहसंबंध (r = 0.64) प्राप्त हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि जिन विद्यार्थियों का व्यक्तित्व अधिक संतुलित, आत्मविश्वासी तथा सामाजिक रूप से समायोजित होता है, वे अध्ययन में भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं। व्यक्तित्व के सकारात्मक गुण, जैसे आत्म-नियंत्रण, समय प्रबंधन, सकारात्मक दृष्टिकोण तथा भावनात्मक संतुलन, शैक्षिक सफलता के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं।
अध्ययन के समग्र परिणाम यह संकेत देते हैं कि विद्यालयों में केवल पाठ्य उपलब्धि पर बल देना पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक विकास, तनाव प्रबंधन तथा व्यक्तित्व विकास को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। यदि विद्यालयों में नियमित मनोवैज्ञानिक परामर्श, योग, ध्यान, जीवन कौशल शिक्षा एवं मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम संचालित किए जाएँ, तो विद्यार्थियों की दुश्चिंता को कम किया जा सकता है तथा उनके व्यक्तित्व एवं शैक्षिक उपलब्धि में सकारात्मक सुधार लाया जा सकता है।
निष्कर्ष
प्रस्तुत अध्ययन से स्पष्ट होता है कि विद्यार्थियों की दुश्चिंता उनके व्यक्तित्व एवं शैक्षिक उपलब्धि दोनों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। दुश्चिंता का सामान्य स्तर विद्यार्थियों को अधिक सजग एवं उत्तरदायी बना सकता है, किंतु जब इसका स्तर अत्यधिक हो जाता है, तब यह आत्मविश्वास, एकाग्रता, स्मरण शक्ति, निर्णय क्षमता एवं भावनात्मक संतुलन को प्रभावित करने लगता है। परिणामस्वरूप विद्यार्थी अपने वास्तविक ज्ञान एवं क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाते।
अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि व्यक्तित्व एवं शैक्षिक उपलब्धि के मध्य घनिष्ठ संबंध विद्यमान है। जिन विद्यार्थियों का व्यक्तित्व संतुलित, सकारात्मक एवं आत्मविश्वासी होता है, वे अध्ययन में भी अपेक्षाकृत अधिक सफलता प्राप्त करते हैं। इसलिए विद्यालयों में केवल परीक्षा परिणामों पर बल देने के स्थान पर विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यक्तित्व विकास पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए।
संदर्भ सूची
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