| डॉ. रामजय नाईक सहायक प्राध्यापक (नागपुरी भाषा विभाग) जगन्नाथ नगर महाविद्यालय, धुर्वा राँची (झारखण्ड) |
Abstract
गीत, मानव के जीवन में अह्म भूमिका निभाती है। यह लोगों के जीवन में मनोरंजन के साथ-साथ खुशी, उमंग,उल्लास, रीति-रिवाज एवं सुख-दुःख में साथ देने वाला एक गेय रचना है। इसे लोग अपने दैनिक जीवन में कई तरह से प्रयोग में लाते हैं। जिसमें सभी गीतों का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान होता है। उसकी विशेषताउसके गुण-दोष, आकार-प्रकार,गाने के राग-छंद, अलंकार, रस, और उदेश्य आदि होते हैं। इसी प्रकार नागपुरी भाषी क्षेत्र में कुछ ऐसे गीत मिलते हैं जो मनोरंजन के साथ में प्रेरणादायक सिध्द होते हैं। उसमें ज्ञान भरी बातें समाहित रहती हैं। नागपुरी के देश भक्ति गीत-देश भक्ति गीत ऐसे गीत हैं जिनमें राष्ट्रीयता की भावना का रस निहित हो। प्रायः देश पर विकट समस्या आने पर या राष्ट्रीय सुधारों के लिए इन गीतों का प्रयोग किया जाता है। इससे देशवासियों में राष्ट्रीयता की भावना जागृत होती है।“1 इसी प्रकार नागपुरी के वरिष्ठ सांस्कृतिककर्मी मधु मंसुरी हँसमुख कहते हैं कि-”राष्ट्रीयता की भावना, सामाजिक-भावना जिन विषयों में, बोलों में, गीतों में समाहित है उस गीत को देश भक्ति गीत या राष्ट्रीय गीत कहते हैं।“2”देश भक्ति पवित्रसलिला भागीरथी के समान है जिसमें स्नान करने से शरीर ही नहीं, अपितु मनुष्य का मन और अन्तरात्मा भी पवित्र हो जाती है। स्वदेश की रक्षा और उसकी उन्नति के लिए अपना तन-मन-धन देश के चरणों में समर्पित कर देना ही देश भक्ति है व देश प्रेम है। जन्म भूमि के प्रति निष्ठा रखना मनुष्य का नैसर्गिक गुण है। जिसकी धूली में लोट-पोट कर हम बड़े हुए, जिसने हमें रहने के लिए अपने मृदुल अंक में आवास दिया, उसकी सेवा से विमुख होना कृतध्नता है।
Keywords: नागपुरी के देश भक्ति गीत, नागपुरी के शिक्षा संबंधी गीत, नागपुरी के भक्ति गीत, नागपुरी के स्वागत गीत, नागपुरी के प्रेम प्रसंग संबंधी गीत, नागपुरी के सांस्कृतिक गीत, नागपुरी के खेलगीत, नृत्य गीत, मनोरंजन गीत, अन्य गीत।.
शोध प्रविधि :-
इस शोध पत्र में प्राथमिक एवं द्वितीयक शोध सामाग्री के आधार पर अध्ययन किया गया है। प्राथमिक स्रोत के रूप में वाद्ययंत्र के कलाकारों, ग्रामीण संगतकार, प्रबुद्धजीवी आदि का सहयोग लिया गया है। द्वितीयक शोध सामाग्री के रूप में पुस्तकों के आधार पर अध्ययन किया गया है।
उद्देश्य :-
स्वदेश प्रेम मानव मात्र का एक स्वाभाविक गुण है। मनुष्य तो विचारशील और ज्ञानवान प्राणी है। छोटे-छोटे अज्ञानी, नदान पशु-पक्षी भी अपने जन्म स्थान से अनन्त स्नेह करते हैं। पक्षी दिनभर दाना-पानी की खोज में न जाने कहाँ-कहाँ उड़ते फिरते हैं, परन्तु संध्या होते ही वे दूर-दूर दिशाओं से अपने पंख फड़फड़ाते हुए अपने नीड़ों में लौट आते हैं। नगर से दूर निकल जाने वाली गाय संध्या होते ही अपने खूँटे को याद करके रम्भाने लगती है। खूँटे पर आकर ही उसे पूर्ण शांति और संतोष प्राप्त होता है। इसी प्रकार मनुष्य किसी कारण विदेश में रहता है। परन्तु उसके हृदय से जन्मभूमि की मधुर स्मृति कभी भी समाप्त नहीं होती। स्वदेश दर्शन की लालसा उसे सदैव बाध्य करती रहती है अपने घर लौट आने के लिए। वह अपनी जन्मभूमि को संकटापन्न नहीं देख सकता।
समस्या :-
- विविभन्न विषयों पर आधारित नागपुर गीत मुख्य रूप से इस बात की सहायता प्रदान कर उसे और अधिक विस्तारित करने की आवश्यकता है।
- नागपुरी गीत की परम्परा को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जा रहा है।
- संसाधन और आर्थिक कमजोरी यहाँ के लोगों के साहित्य और अधिक पुष्ट नहीं हो पा रहे है।
- नव युवकों में नागपुरी गीत की परम्परा के प्रति उदासीनता मुख्य कारण है।
समाधान :-
इसके लिए वह लोगों को अपने स्वदश के प्रति जगाने का प्रयास करता है। कलावती ओहदार के मतानुसार-”समाजिकता का वह पक्ष जिसका सम्बन्ध किसी देश या राष्ट्र के प्रति देश और समाज के भावों और अनुभूतियों से होता है, राष्ट्रीयता कहलाता है। राष्ट्रीयता राजनीतिक चेतना की देन है, जो सभ्यता के सम्यक् विकास के पश्चात् ही उत्पन्न होती है। अपने जन्म स्थान और उसके भौगोलिक तथा सांस्कृतिक परिवेश से मनुष्य का जो लगाव होता है, वही जब देश या राष्ट्र की व्यापक सीमा से जुड़ जाता है तो राष्ट्रीयता का रूप ग्रहण कर लेता है। देश के महान वीरों और महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं, स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किए गये प्रयासों, संघर्षों और विदेशी शासकों द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों के विरूध्द आक्राश की जो भावनाएँ लोक-मानस को आन्दोलित करती है, उनकी अभिव्यक्ति अनजाने ही लोकगीतों में हुआ करती है। ऐसे ही लोकगीतों को राष्ट्रीय लोकगीत कहते हैं।“3 एक राष्ट्रीय गीत देख सकते हैं-
हामे हेकी हिन्दुस्तानी, एकता कर बोलीला बानी
हिन्दु मुसलिम सिख इसाई, मिल के रहना
जाति धरम भेद लइ के, कभी न लड़ना
मंदिर मस्जिद गुरूद्वारा, गिरजा घर सबक पेयारा
सारधा ले खुला आहे, केखो नखे माना
जाति धरम भेद लइके, कभी न लड़ना
ईद होली दिवाली में, बाड़ा दिन बैसाखी में
भाई-भाई गले मिली, प्रेम के बाटना
जाति धरम भेद लइ के, कभी न लड़ना
इ देसक एके मरम, मानता हे मूल धरम
सुख-दुःखे साथ रहू, नन्द के कहना
जति धरम भेद लइ के, कभी न लड़ना
दूसरा गीत
हेके अन्तिम सलाम, जागु जवान
अधमध नाँव संगे, बनु इन्सान
टुइट-फुइट के जोइड़ करू, नवा निरमान
बनाउ फिन सोना पंछी, मोर हिन्दुस्तान
मुक्ति वतन हामरे, भेली गुलाम
करीया अंगरेज सता, करू छितीछान
तबे आवी देस में, नवाँ तो बिहान
बनाउ फिन सोना पंछी, मोर हिन्दुस्तान
देस खातिर जे देलैं, बड़ी कुरबान
हामरे करी उनकर, बड़ी गुनगान
आजा-आजी, नाना-नानी, सउब के सलाम
बनाउ फिन सोना पंछी, मोर हिन्दुस्तान।
हे देश के नवजवानों तुम जागो और अपनी मातृभूमि के लिए आगे बढ़ो। इस स्वदेश की मिट्टी को अपने हृदय में संजोए रखो। लोग आपस में जो भी बिछड़ गये हैं उसे जोड़ने का काम करो। इतना ही नहीं इस देश के खातीर जो अपने को बलिदान कर दिए उन्हें याद करो। उनके बताए हुए मार्ग पर चलने का हमेशा प्रयास करो, दिए गये ज्ञान के भण्डार को बहुत दूर तक विस्तार करो। अपने इस दश में कोई बाहरी (शत्रु) आए तो उसे खदेड़ भगाओ।
नागपुरी शिक्षा संबंधी गीत-सामाजिक जीवन में आदर्श, विचार स्थापित करने वाला गीत को शिक्षा गीत कहते हैं।“4 शिक्षा व्यक्ति की अंतर्निहित क्षमता तथा उसके व्यक्तित्व काविकसित करने वाली प्रक्रिया है। यही प्रक्रिया उसे समाज में एक युवक की भूमिका निभाने के लिए समाजीकृत करती है तथा समाज काएक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए व्यक्ति को आवश्यक ज्ञान तथा कौशल उपलब्ध कराता है।“5 शिक्षा आज हमारे जीने का आधार भूत अंग है। इसे लोग गीत के माध्यम से भी जोड़ते हैं। एक शिक्षा से युक्त नागपुरी गीत-
”कतइ सहब दादा, पइर के गुमान सान….2
चलू सीखू सिखाउ, सुन्दर गेयान।…2
लुकल रतन हेके, कोइ नी जानैं इके….2
राखहूँसजाय मने, खोलब जड़ खने….2
खुदी-चुनी खाइये पढ़ू, बनू महान भाइ…2
इकर बिना बुझब ना, गाधा के मान….2“6
प्रस्तुत गीत में कहा गया है कि-कोई व्यक्ति एक दूसरे व्यक्ति से कह रहा है, बल्कि अनुरोध कर रहा है कितने दिन एक दूसरे के साथ आपसी उँच-नीच, जाति-धर्म की भावना बना रहेगा। इसलिए सभी व्यक्तियों में शिक्षा को लेकर जगाने का प्रयास करें। सुन्दर-सुन्दर ज्ञान को बांटे। यह ज्ञान सबके पास है, लेकिन कोई नहीं जान पा रहा है। आप इस ज्ञान को कब दुनिया के बीच रखेगें?घर में खाने के लिए कुछ है या नहीं। आप अपने मनोबल को आगे बढ़ाते रहें।
नागपुरी के भक्ति गीत-मन जब व्याकुल हो जाता है तब भगवान राम-रहीम, खुदा-अल्लाह, के प्रति खो जाते हैं तो रागात्मक रूप से बोल उठता है। जिस राग, गीत, बोल को भक्ति गीत कहते हैं।“7 मानव चिरकाल से इस एक अनादि सत्ता में विश्वास करता आया है। भक्ति साधन तथा साध्यद्विविध हैं। साधक, साधन में ही जब रस लेने लगता है, उसके फलों की ओर से उदासीन हो जाता है। यही साधन का साध्य बन जाता है। पर प्रत्येक साधन का अपना पृथक फल भी है।“ वे अपने प्रभू के प्रति मानव लीन हो जाता है। वही गीत में ईश्वर का गुनगान करता है।सगुणोपासना एवं साकार ब्रह्म के विभिन्न रूपों के वर्णन से युक्त, भक्ति-भावना से ओत-प्रोत लोकगीतों को भजन कहा जाता है। इन गीतों में राम, कृष्ण तथा अन्य अवतारी पुरूषों के जीवन से सम्बंधित घटना क्रम एवं कथानकों की चर्चा एवं भगवत् प्राप्ति तथा कष्टमुक्ति हेतु निवेदन की प्रधानता होती है।8
जय माँ बन दुर्गा कर, खुला आहे दरबार
आउ माँ कर दरबार, करी बेड़ापार
माँ बन दुर्गा कर, शक्ति आपार
करहुँ सब जय-जयकार, चाहे दुःखी हो लाचार
घड़ी संकट पर, करी बेड़ापार
माँ बन दुर्गा कर, शक्ति आपार
अठारह सौ छे पर, माँ होलयँ चमतकार
रूप सजल आहे, शेर में सवार
माँ बन दुर्गा कर, शक्ति आपार
विश्वनाथ सिंह पहान कर, सपना में बारंबार
राजा जगत सिंह कर, गेलयँ दरबार
माँ बन दुर्गा कर, करलयँ खबर
सिमडेगा जिला कर, बोलबसग नदी पार
बालसाड़ा गाँव पर, मइया के दरबार
गावल जगदीश कर, सुनहु पुकार
नागपुरी के स्वागत गीत-जब हमारे घरों में, समाज में या कोई सुअवसर में हमारे सामने बहुत दूर से कोई खास मेहमान आते हैं, तो उनके मान-सम्मान, एवं प्रतिश्ठा को देखते हुए उनका अच्छे मन से स्वागत करते हैं। साथ ही उन्हीं के लिए कोई गीत गाते हैं। गीत के जरिए हम उनका स्वागत के साथ-साथ श्रध्दा अर्पित करते हैं। इसी प्रकार नागपुरी के वरिष्ठ सांस्कृतिक कर्मी मधु मंसुरी हँसमुख कहते हैं कि-आए हुए अतिथि या कोई भी जिसके महिमा में स्वर के साथ जो बोला जाता है, जो गाया जाता है, उसे स्वागत गीत कहते हैं।“9 नागपुरी में एक स्वागत गीत-
छोटा नागपुरे आइज,
पहुँचलैं पेरेमे बाइझ
जन गन मन के दुलारे,
स्वागत आहे आगत जोहारे
रउरे अवइया सुनी,
धरली हाम लोटा पानी….
मन में उमंग भरी,
दिल में धिरज धरी
फूलक माला डालु गाले हायरे…..
स्वागत आहे आगत जोहारे….।
मोर ठीना कोनो नखे,
मोर फूलक हार ले…2
जीव तरइस गेल,
एको नजइर देखले….2
सोना-चाँदी कहाँ पामू,
मोर दिलक पेयार ले
मुसइक-मुसइक आली मोरे दुआरे…..
स्वागत आहे आगत जोहारे….।
हामरे सोभाग आहे,
रउरे से मिलेले…2
निरमल निरंजन देहु रउरे दरसने
जन गन मन के दुलारे
स्वागत आहे आगत जोहारे…..।
प्रस्तुत गीत में कहा गया है कि हमारे घरों में, समाज में या कोई अवसर में बाहर से जो मेहमान आते हैं उनके प्रति श्रध्दा अर्पित करते हैं। हम स्नेह, प्यार, और उमंग से उनका स्वागत करते हैं। इसी तरह गीत में एक व्यक्ति कह रहा है आपके आने को सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हो उठा और अपने हाथों में लोटा-पानी पकड़ा। इतना ही नहीं आपके लिए फूलों की माला गले में पहनाने के लिए तैयार रखा। इसी प्रकार आगे की कड़ी में वह कहता है मेरे पास सोना-चाँदी कुछ नहीं, केवल आपके स्वागत के लिए फूलों की माला है। आप मेरे घर हँसते हुए आये हैं और खुशी मन से मैं आपका स्वागत कर रहा हूँ।
नागपुरी के सांस्कृतिक गीत-सांस्कृतिक गीत वह गीत होता है जिसमें समाज, देश, शिक्षा, मान-मर्यादा,सम्मान और अपने पूर्वजों का दिया हुआ पारंपरिक रीति-रिवाज भी समाहित हो। उस गीत में अपने देश समाज और शिक्षा तथा रहन-सहन तथा अपनी संस्कृति की झलक दिखाई पड़े, सांस्कृतिक गीत कहलाता है। मधु मंसुरी हँसमुख के मतानुसार-”हमारा क्या है? बोलना, चलना, पूजा-पाठ करना, सभी संस्कृति है। परंपरागत सामाजिक कार्य, पर्व-त्योहार, सामान्य जीवन में सभी संस्कृति है। इसे रूप आदर्श में बचाये रखना, उसे गीत के जरिए गाना, सांस्कृतिक गीत कहलाता है। एक गीत-
गाँव छोड़ब नहीं, जंगल छोड़ब नहीं
माँय माटी छोड़ब नहीं, लड़ाई छोड़ब नहीं।
बांध बनाले गाँव डुबाले कारखाना बनाले
जंगल काटी खद्यान कोड़े संचूरी बनाले,
जल जंगल जमीन छोड़ी हामिन कहाँ-कहाँ जाब
विकास के भगवान बताए कइसे जान बचाब।
जमुना सुखी नर्मदा सुखी सुखी सुवरनरेखा
गंगा बनी गंदी नाली संख काली रेखा,
तुम पियोगे पेपसी कोला डिसलरी कर पानी
हम कइसे आपन पियास बुझाब पीके कचरा पानी।
पूरवज रहैं का मुरूख जे जंगल के बचालयँ
धरती राखलैं हरा-भरा नदी मधु बहाए,
तोर हवस में जइल गेल धरती लूइट गेल हरियाली
मछरी मरलक चरयँ उड़लक जाने कोन दिसा।“10
नागपुरी प्रेम प्रसंग गीत-किसी भी प्राणी में बाल्यवस्था, जवानी और बुढ़ापा आता है। जिसमें युवा काल या कोई और काल का समय रहता है, खास करके युवा काल 18-21वर्ष का। विशेष महत्व है विवाह आरंभ करने का। सभी प्राणियों में, पशु-पक्षियों में, यह काल देखने को मिलता है। वे आपस में प्रेम से संबंधित कुछ बातें करते हैं, कुछ गाते हैं और कुछ कार्य करते हैं। इसी क्रम में वे गीत गाते हैं जिसे प्रेम प्रसंग गीत के नाम से जाना जाता है।“11 कलावती ओहदार के अनुसार-प्रेम वह उत्कृष्ट अवस्था है जहाँ अपने पराये, मान-अपमान, जाति, धर्म आदि का अस्तित्व ही नहीं रह जाता है। मानव मन विविध भावों का काश है। प्रेम का भाव इनमें प्रमुख है। प्रेम ‘प्रिय’ शब्द का भाव वाचक रूप है। जिसका अर्थ तृप्ति है। प्रेम शब्द से हृदय के तृप्ति रूप आनन्द का बोध होता है। ब्याकरण के अनुसार भी इस शब्द की व्युत्पति इसी अर्थ की द्योतिका है।
मनवीय सम्बन्धों का सार प्रेम भावना के रूप में ही अभिव्यक्त होता है। प्रेम का आधार रति-भाव, जो श्रंगार रस का स्थायी भाव है किन्तु श्रंगार में वह व्यापकता और उदात्तता नहीं है जो प्रेम में है। यद्यपि प्रेम वात्सल्य भाव, सख्य भाव और श्रध्दा भाव को भी अपने भीतर समाहित कर लेता है किन्तु उसका मुख्यार्थ दाम्पत्य-प्रेम ही है।“12 एक प्रेम प्रसंग गीतदृष्टव्य है-
”फूल गुलाब तरी,
तोर कोमल काया गोरी।
धम धम धमकेला, सेंठ लगाए
मोएँ तो मातल रहों, देले तोएँ जगाए।
सुन्दर सुरति तोर……2
मन मोही लेलक मोर।
छम-छम छमकले, चलले गझाए
मोएँ तो मातल रहों, देले तोएँ जगाए।
कइर दे तोए वादागोरी
बांधी लेमू पेरेमक डोरी
झम-झम झमकले, गहना सजाए
मोएँ तो मातल रहों, देले तोएँ जगाए।
जब से देखलों तोके….2
नींद नहीं परल मोके
आजाद के तोर बीना, कोनो नी सुहाए
मोएँ तो मातल रहों, देले तोएँ जगाए।“13
गीत में कहा गया है कि झारखण्ड में लोगों के प्रति इतना गहरा प्रेम है कहा नहीं जा सकता है। यहाँ मनुष्य से लेकर छोटे-छोटे प्राणियों के बीच प्रेम, श्रध्दा, एक दूसरे के साथ अच्छी भावना देखने को मिलता है। वहीं एक लड़का और लड़की के साथ गहरा प्रेम है जैसे भगवान श्री कृष्ण और राधा के बीच है। लड़का अपनी प्रेमिका से कहता है तेरा रूप गुलाब फूल की तरह है। तुम्हारा कोमल शरीर और चाँद के जैसा मुख है। जब हम गहरी नींद में सोये हुए रहते हैं तो तेरा आने की आहट से जग जाता हूँ। तेरा सुन्दर रूप को देखकर मैं मोहीत हो गया हूँ। तेरे पाँव के पायल, हाथ के कंगन और माथे पर गजरा के फूल से तुम दिखने में परी लग रही हो। मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ। तुम एक वादा करो कि मुसे शादी करोगी। तेरे साथ मैं जीवन बिताना चाहता हूँ। तेरे बिना अपने में जीने में असमर्थ हूँ। मुझे जीवन जीने के लिए तुम्हारा हाथ एवं साथ चाहिए।
नृत्य गीत-जो गीत नाचने के समय गाये जाते हैं वह नृत्य गीत कहलाता है। डॉ. कलावती ओहदार के अनुसार- नृत्य के साथ गाये जाने वाले लोकगीतों को नृत्य गीत कहते हैं। ये भी दो प्रकार के होता है-पुरूषों के नृत्य गीत और स्त्रियों के नृत्य गीत। वनवासी, आदिम जातियों एवं सदानों में प्रायः स्त्री और पुरूषों का सम्मिलित सामूहिक नृत्य प्रचलित है जिसमें नृत्य के साथ गीत भी गाया जाता है। नागपुरी भाषा-भाषी क्षेत्रों में पुरूषों के सामूहिक नृत्य प्रचलित हैं। नृत्य के साथ गाया जाता है। ये गीत परम्परागत लय और ताल में बंधे होते हैं। स्त्रियाँ एक साथ मिलकर हाथ में हाथ डालकर वृत्ताकार, कदमों की विभिन्नताओं में नृत्य करती हुई गाती हैं, पुरूष वाद्ययंत्र बजाते हैं। वाद्ययंत्र में मुख्यतः मांदर एवं करताल के साथ बाँसुरी भी रहती है। इसका उदाहरण निम्नलिखित हैः-
हो…………हो ………………रे गोइया, लाइन देवब पिया
झबु लागल नाक के नथिया रे गोइया,
लइन देवब पिया
कंगना पछुवा चूरी बाँही के ठढ़िया, रे गोइया
बाँही के ठढ़िया…………….
मनोरंजन गीत- ऐसे गीत जिसे केवल मन बहलाने या मनोरंजन के लिए गाये जाते हैं। जब मनुष्य के पास कोई काम नहीं रहता है तो वह कुछ गुनगुनाता है, अर्थात खाली समय में गाये जाने वाले गीत को मनोरंजन गीत कहते हैं।कलावती ओहदार लिखते हैं- जो गीत विशुद्ध रूप से अवकाश के समय के आनन्द और विनोद की दृष्टि से गाये जाते हैं उन्हें मनोरंजन गीत की श्रेणी में रखा जा सकता है।
निष्कर्ष :-
ऐसे गीतों को गाने क उद्देश्य न तो किसी भौगोलिक या धार्मिक कार्य का सम्पादन होता है और न ऋतु सम्बन्धी परिपाटी का पालन अथवा श्रम का परिहार करना ही होता है। जिस प्रकार हास्य एवं रूदन मन की भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति होते हैं उसी तरह जब कोई व्यक्ति अथवा व्यक्तियों का समूह निरूद्देश्य भाव से सहज रूप से कुछ गाने लगता है और गायन से स्वयं उसको तथा सुनने वालों को अनायास उत्फुल्लता का अनुभव होने लगता है तो ऐसे गीतों को मनोरंजन गीत कहा जाता है। ढेरों के चरवाहे, दिन भर काम करके थके हुए श्रमिक अपनी फुरसत के समय का उपयोग करने तथा अपनी मानसिक तुष्टि के लिए उसी प्रकार के गीत गाते हैं। प्रायः गाँव के लोग एक जगह एकत्र होकर निर्गुण, पावस, उदासी, अँगनई, डमकच, गोलवारी, भादर आदि गीतों का गान करते हैं। स्त्रियाँ भी मेला तथा बाजार जाने समय, विवाह आदि के समय मांगलिक गीत गाने के पश्चात् केवल मनोरंजन के लिए झूमर आदि गाती हैं। ऐसे सभी गीत मनोरंजन गीत की श्रेणी में आते हैं।
References
- ई-नेट
- पदमश्री मधु मंसुरी हॅंसमुख, वरिष्ट नागपुरी सांस्कृतिक कर्मी, ग्राम, पोस्ट, सिमलिया, रातु, पृष्ठ 22
- डॉ. आर. एन. गौड़, राजहंस हिन्दी निबन्ध, पृष्ठ 173
- कलावती ओहदार, नागपुरी लोकगीत साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन, पृष्ठ 53-54
- मधु मंसुरी हसमुख, वरिष्ट नागपुरी सांस्कृतिक कर्मी, ग्राम, पोस्ट, सिमलिया, रातु
- ई-नेट, https://hi.m.wikipedia.org
- सुरेन्द्र नाईक, (32), ग्राम$पोस्ट उमेडण्डा, थाना-बुढ़मू, जिला-रॉंची, झारखंड, पृष्ठ 5
- मधु मंसुरी हसमुख, वरिष्ट नागपुरी सांस्कृतिककर्मी, ग्राम, पोस्ट, सिमलिया, रातु
- कलावती ओहदार,नागपुरी लोकगीत साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन, पृष्ठ 214
- पद्मश्री मधु मंसुरी हॅंसमुख, वरिष्ट नागपुरी सांस्कृतिक कर्मी, ग्राम, पोस्ट, सिमलिया, रातु, पृष्ठ 25
- मधु मंसुरी हॅंसमुख, वरिष्ट नागपुरी सांस्कृतिककर्मी, ग्राम, पोस्ट, सिमलिया, रातु, पृष्ठ 10
- मधु मंसुरी हॅंसमुख, वरिष्ट नागपुरी सांस्कृतिककर्मी, ग्राम, पोस्ट, सिमलिया, रातु, पृष्ठ 55
- कलावती ओहदार,नागपुरी लोकगीत साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन, पृष्ठ 33
- आजाद अंसारी, नागपुरी लोक गायक, साक्षात्कार द्वारा
